संकट में भारत का कपासपूरे देश में खरीफ की बुवाई चल रही है, लेकिन धीमी गति से. बुवाई में इस धीमेपन की वजह है मॉनसूनी बारिश की भारी कमी. अप्रैल-मई के महीने में भीषण गर्मी के बाद जून का महीना पूरी तरह सूखा चला गया. जून महीने में बारिश एक बूंद नहीं हुई. इसका नतीजा है कि खरीफ बुवाई का ताजा आंकड़ा बताता है कि अभी तक इसमें 23 परसेंट की गिरावट है. इसमें सबसे बड़ा झटका कपास और सोयाबीन को लगा है. कृषि मंत्रालय के आंकड़े से पता चलता है कि कपास में तकरीबन 16 फीसद तो सोयाबीन में 13 फीसद की गिरावट है.
हरियाणा जैसे कपास प्रधान राज्य में बुवाई में तेज गिरावट देखी जा रही है. हरियाणा के कई जिलों में किसान कपास की खेती से हटकर दूसरी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के वर्षों में बार-बार कीटों के हमले और फसल के नुकसान के कारण कपास की खेती में कमी आई है, जिससे कई किसान धान जैसी दूसरी फसलों की ओर मुड़ने को मजबूर हुए हैं. अधिकारियों ने कहा कि इस चलन से कुछ इलाकों में सिंचाई के संसाधनों पर भी दबाव बढ़ा है.
कृषि विभाग, हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय और सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर कॉटन रिसर्च मिलकर Bt कॉटन बीजों के फ़ील्ड ट्रायल कर रहे हैं, ताकि पैदावार, कीटों से लड़ने की क्षमता और कीटनाशकों की जरूरत का पता लगाया जा सके. अधिकारियों ने बताया कि हरियाणा में अभी कॉटन की 46 किस्मों को मंजूरी मिली हुई है. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, राज्य में कॉटन की बुआई के लिए 15 अप्रैल से 25 मई का समय सबसे सही माना जाता है.
हरियाणा के पड़ोसी राज्य पंजाब में भी कुछ ऐसा ही हाल है. पंजाब 2026-27 सीजन के लिए तय किए गए लक्ष्य के मुकाबले सिर्फ 32% हिस्से में ही कपास की बुवाई कर पाया है. 15 मई तक - जिसे बुवाई का सबसे सही समय माना जाता है - राज्य के 1.25 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले सिर्फ 40,402 हेक्टेयर में ही फसल बोई गई. हालांकि बुवाई आम तौर पर 31 मई तक चलती है और जून के पहले हफ्ते तक भी खिंच सकती है, लेकिन कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि देर से बोई गई कपास पर कीड़ों के हमले का खतरा ज्यादा होता है. मौजूदा हालात को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि इस साल राज्य का लक्ष्य पूरा होने की संभावना कम है.
पंजाब कृषि विभाग के डायरेक्टर गुरजीत सिंह बराड़ ने TOI को बताया कि गेहूं की कटाई में देरी की वजह से ऐसा हुआ. 2024-25 सीजन के दौरान कपास की बुवाई पहली बार 1 लाख हेक्टेयर से नीचे गिरकर 99,700 हेक्टेयर रह गई थी, लेकिन अगले सीजन में इसमें थोड़ी रिकवरी हुई और यह 1.19 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई.
कपास बुवाई में दूसरा बड़ा राज्य महाराष्ट्र है जहां इस बार खेती ठीक हुई है. विशेषज्ञों का मानना है कि महाराष्ट्र में तमाम चुनौतियों के बीच कपास की खेती में तेजी दर्ज की जाएगी. कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कपास की कीमतों में तेजी से हुई बढ़ोतरी के कारण, महाराष्ट्र में 2026-27 के खरीफ सीजन में कपास की खेती के रकबे में 10-15 प्रतिशत की वृद्धि होने की उम्मीद है.
शुरुआती रुझानों से पता चलता है कि किसान, खासकर विदर्भ और मराठवाड़ा में, राज्य की एक अन्य प्रमुख खरीफ फसल सोयाबीन के बजाय कपास की खेती के लिए ज्यादा जमीन का इस्तेमाल कर रहे हैं. कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि बाजार में ज्यादा मांग और बेहतर कीमत मिलने की वजह से किसान फिर से कपास की खेती की ओर लौट रहे हैं.
कपास की तरह सोयाबीन की बुवाई में भी गिरावट है. यह गिरावट दिनों दिन बड़ी होती जा रही है क्योंकि जिन राज्यों में इसकी खेती होती है, वहां अभी तक मॉनसून की चाल या तो धीमी है या रुकी हुई है. मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों में सोयाबीन की बुवाई 15 दिन पीछे है. इसकी वजह बारिश की कमी और अल नीनो का प्रभाव है. विशेषज्ञों का कहना है कि बुवाई जितनी पीछे जाएगी, आगे चल कर सोयाबीन के तेल के दाम तेजी से बढ़ेंगे क्योंकि देरी की वजह से उत्पादन गिरेगा जो दाम बढ़ाने का कारण बनेगा.
सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SOPA) के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डीएन पाठक ने 'इकोनॉमिक टाइम्स' से कहा, "सोयाबीन उगाने वाले राज्यों में अभी बुवाई के लिए बारिश नहीं हुई है. जल्द से जल्द बारिश होनी चाहिए, और उससे भी जरूरी है कि बारिश का बंटवारा सही हो ताकि पैदावार पर असर न पड़े." SOPA के मुताबिक, देश में खरीफ सीजन 2025 में 11.02 मीट्रिक टन सोयाबीन का उत्पादन हुआ था. इस बार उत्पादन पर खास नजर रहेगी क्योंकि अल नीनो और भीषण गर्मी का प्रभाव खेती पर देखा जा रहा है.
कुल मिलाकर, कपास और सोयाबीन की बुवाई में गिरावट का असर केवल किसानों पर नहीं बल्कि उपभोक्ताओं और व्याापरियों, सब पर पड़ेगा. खेती में गिरावट का बड़ा प्रभाव उत्पादन में कमी के रूप में दिखेगा जिससे महंगाई बढ़ेगी.
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