El Nino और कम बारिश में भी होगी अच्छी कमाई, अपनाएं बाजरा-मूंग खेती का नया मॉडल

El Nino और कम बारिश में भी होगी अच्छी कमाई, अपनाएं बाजरा-मूंग खेती का नया मॉडल

बदलते मौसम और सूखे के बढ़ते खतरे को देखते हुए कृषि विशेषज्ञ किसानों को कम पानी वाली फसलों और इंटरक्रॉपिंग अपनाने की सलाह दे रहे हैं. धान जैसी ज्यादा पानी लेने वाली फसल के बजाय बाजरा, ज्वार, मूंग और अरहर जैसे विकल्प अधिक सुरक्षित माने जा रहे हैं. खासतौर पर ‘बाजरा के साथ मूंग’ या ‘अरहर के साथ सोयाबीन’ जैसी मिश्रित खेती जोखिम को कम करने और आय स्थिर रखने में मदद करती है. ICAR के अनुसार, सही अनुपात में की गई सहफसली खेती न केवल उत्पादन बढ़ाती है बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी सुधारती है, जिससे सूखे जैसी परिस्थितियों में भी किसानों को बेहतर लाभ मिल सकता है.

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El Nino और कम बारिश में भी होगी अच्छी कमाई, अपनाएं बाजरा-मूंग खेती का नया मॉडलबाजरा-मूंग की मिश्रित खेती से फायदा

बदलते मौसम और सूखे के इस कड़े इम्तिहान में किसानों को फसलों के चुनाव में बहुत समझदारी दिखानी होगी. कृषि वैज्ञानिकों की साफ सलाह है कि पूरी जमीन पर सिर्फ धान जैसी पानी पीने वाली फसल लगाने की भूल कतई न करें. इसकी जगह कम अवधि वाली धान की फसल लगाएं और ऐसी फसलें चुनें जो कम पानी में और कम दिनों में जल्दी तैयार हो सकती हैं.  मोटे अनाज जैसे बाजरा और ज्वार कम बारिश वाले इलाकों के लिए सबसे सुरक्षित और मजबूत विकल्प हैं, जबकि मूंग और उड़द जैसी दालें बहुत ही कम समय में पककर तैयार हो जाती हैं. इसके अलावा, अरहर की खेती इस मौसम में सबसे बेहतरीन मानी जाती है क्योंकि इसकी जड़ें जमीन में काफी गहराई तक जाती हैं, जिससे यह सूखे के थपेड़ों को आसानी से बर्दाश्त कर लेती है और किसानों को मुनाफा देती है.

सूखे जैसे हालात से निपटने के लिए किसानों को खेतों में बीज डालने की जल्दबाजी से बचना चाहिए. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक आपके इलाके में कम से कम 75 से 100 मिलीमीटर अच्छी बारिश न हो जाए और मिट्टी के भीतर गहराई तक सही नमी न बन जाए, तब तक बुवाई शुरू न करें. इस नाजुक वक्त में नुकसान के खतरे को आधा करने का सबसे अचूक नुस्खा है अंतरवर्तीय खेती (Intercropping) यानी मिक्स फार्मिंग अपनाना. 

अपने खेत में 'अरहर के साथ सोयाबीन' या 'बाजरा के साथ मूंग' जैसी फसलों को कतारों में मिलाकर लगाएं. इस मिला-जुला कर खेती करने की तरकीब से जोखिम पूरी तरह बंट जाता है. अगर अल-नीनो के कहर से मुख्य फसल पर आंच भी आ जाए, तो दूसरी कम पानी वाली फसल सुरक्षित बची रहती है और संकट के दौर में भी किसान की आजीविका और आमदनी को टूटने नहीं देती.

मूंग और बाजरे की मिक्स फार्मिंग

भारत के कम बारिश वाले इलाकों में बाजरा (Pennisetum glaucum) और मूंग (Vigna radiata) की मिली जुली खेती (intercropping) एक बहुत फायदेमंद, टिकाऊ और सूखे को झेलने वाली तकनीक है. अनाज और नाइट्रोजन बनाने वाली दलहनी फसल को एक साथ उगाने से किसान मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बढ़ाते हैं और जमीन का सही इस्तेमाल करते हैं. साथ ही अकेले फसल उगाने की तुलना में ज्यादा मुनाफा कमाते हैं.

ICAR की रिसर्च से पता चलता है कि 4:2 का सिस्टम (बाजरे की 4 कतारों के साथ मूंग की 2 कतारें) सबसे ज्यादा 'पर्लमिलेट इक्विवेलेंट यील्ड' (15.79 क्विंटल/हेक्टेयर) देता है. इलाके की पसंद के हिसाब से 2:1 का अनुपात भी बहुत असरदार होता है.

बुवाई का समय: मॉनसून की शुरुआत (जून से जुलाई) में बुवाई करना सबसे अच्छा होता है.
दूरी: बाजरे की कतारों के बीच लगभग 45 से 60 cm की दूरी रखें ताकि मूंग की कतारें आसानी से आ सकें.
खाद: ज्यादा नाइट्रोजन न डालें क्योंकि इससे मूंग की बढ़त रुक सकती है. आम तौर पर, एक संतुलित मात्रा (जैसे, 40 kg N और 20-30 kg P₂O₅/हेक्टेयर) अच्छी रहती है, क्योंकि मूंग में हवा से नाइट्रोजन सोखने की प्राकृतिक क्षमता होती है.
किस्में: दोनों फसलों की ऐसी किस्में चुनें जो सूखे को झेल सकें और एक ही समय पर पकें, ताकि बढ़ने के आखिरी दौर में छाया के लिए आपस में मुकाबला न हो.

इस सिस्टम के फायदे

ज्यादा मुनाफा: स्टडीज से पता चलता है कि इस सहफसली खेती से लागत की तुलना में मुनाफा काफी बढ़ जाता है.
नाइट्रोजन फिक्सेशन: मूंग हवा से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में जमा करती है, जिससे अगली मुख्य फसल के लिए बाहर से खाद डालने की जरूरत कम हो जाती है.
जोखिम कम करना: चूंकि बाजरा सूखे के लंबे दौर को भी झेल सकता है, इसलिए यह एक 'बीमा फसल' की तरह काम करता है. अगर बेमौसम बारिश से कम समय में तैयार होने वाली मूंग की फसल खराब हो जाए, तो भी बाजरा काम आता है.

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