कार्बाइड और नेचुरली पके आमों में फर्कभारत में गर्मी का मौसम सिर्फ धूप और लू का नाम नहीं है, बल्कि यह 'फलों के राजा' आम के आने का जश्न भी है. मई के आखिरी हफ्ते से लेकर अगस्त तक उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों की मंडियां आम की खुशबू से महक उठती हैं. एक आम खरीदार चाहता है कि उसे रसीला, मीठा और खूबसूरत रंग वाला आम मिले, वहीं किसान और व्यापारी चाहते हैं कि उन्हें फसल की अच्छी कीमत मिले. आजकल बाजारों में जल्दी मुनाफा कमाने के चक्कर में आम को कैल्शियम कार्बाइड से पकाया जाता है, जो एक बेहद खतरनाक केमिकल है. इसे लोग आम भाषा में 'कार्बाइड' कहते हैं. इसमें आर्सेनिक और फास्फोरस जैसे जहरीले तत्व होते हैं. केमिकल शरीर के नाड़ी तंत्र पर बुरा असर डालता है. इससे सिरदर्द, चक्कर आना, याददाश्त कमजोर होना और यहां तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा रहता है. ग्राहकों को चाहिए कि वे बहुत ज्यादा चमकदार और गहरे पीले आमों से बचें. कार्बाइड से पका आम बाहर से पीला दिखता है, लेकिन अंदर से कच्चा और बेस्वाद होता है. सरकार ने 'फूड एडल्ट्रेशन रूल' के तहत इस पर पूरी तरह बैन लगा रखा है.
असली और प्राकृतिक तौर पर पके हुए आम की सबसे बड़ी पहचान उसकी सोंधी और मीठी खुशबू है, जबकि रसायनों से पकाए गए आम में अक्सर कोई खुशबू नहीं होती या फिर रसायनों जैसी अजीब महक आती है. देखने में प्राकृतिक आम का रंग थोड़ा असमान होता है, जिसमें कहीं-कहीं हरे धब्बे नजर आ सकते हैं, लेकिन केमिकल वाला आम एकदम चमकदार और एकसमान पीला दिखाई देता है. छूने पर असली आम पूरी तरह से नरम और अंदर तक रसदार होता है, जबकि मिलावटी आम बाहर से तो पीला दिखता है पर काटने पर अंदर से सख्त और सफेद निकल सकता है. एक आसान तरीका यह भी है कि आम को पानी में डालकर देखें. अगर वह डूब जाए तो वह प्राकृतिक है और अगर वह ऊपर तैरता रहे तो समझें कि उसे दवाओं से पकाया गया है. सेहत और स्वाद के लिए हमेशा इन छोटी-छोटी बातों का ख्याल रखना बेहद जरूरी है.
आम को कब पेड़ से तोड़ना चाहिए, यह जानना बेहद जरूरी है. डॉ. राजेंद्र प्रसाद यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ डॉ एस. के. सिंह के मुताबिक, अगर किसान कच्चे फल तोड़ लेते हैं, तो उनमें न तो मिठास आती है और न ही वह खास खुशबू आएगी. आम तौर पर फल लगने के 120 से 140 दिन बाद आम तुड़ाई के काबिल हो जाता है. इसकी पहचान के कुछ आसान तरीके हैं, जैसे फल के डंठल के पास का हिस्सा ऊपर उठ जाता है और डंठल के पास हल्का गड्ढा बन जाता है. गहरे हरे रंग पर हल्का पीलापन दिखने लगता है और फल के ऊपर एक सफेद मोमी परत जम जाती है. जब बाग में एकाध फल खुद-ब-खुद पककर गिरने लगें, तो समझ लीजिए कि अब पकने को तैयार है.
डॉ एस. के. सिंह के अनुसार आम की तुड़ाई महज एक काम नहीं, बल्कि एक हुनर है. अक्सर लोग डंडे से मारकर या पेड़ हिलाकर आम गिराते हैं, जिससे फल में अंदरूनी चोट लग जाती है और वह काला पड़ जाता है. हमेशा सुबह या शाम के वक्त ही तुड़ाई करनी चाहिए क्योंकि उस समय फल का तापमान कम होता है. 'मैंगो हार्वेस्टर' का इस्तेमाल करना सबसे बेहतर है ताकि फल जमीन पर न गिरे. तुड़ाई के बाद फल को सीधे धूप में न रखें, बल्कि किसी सायेदार जगह पर क्रेट्स में रखें. एक खास बात यह है कि आम को डंठल के साथ तोड़ें और उसे उल्टा रखें ताकि उसका 'दूध' बाहर निकल जाए. अगर यह लेटेक्स फल की त्वचा पर लग जाए, तो वहां दाग पड़ जाते हैं, जिससे बाजार में कीमत गिर जाती है.
फल तोड़ने के बाद उसे बीमारियों से बचाना एक बड़ी चुनौती है. आम में अक्सर 'एंथ्रेक्नोज' जैसी फफूंद लग जाती है, जिससे वह सड़ने लगता है. इससे बचने का सबसे कारगर वैज्ञानिक तरीका है गर्म पानी का उपचार. इसमें पानी को लगभग 48° सेल्सियस तक गर्म किया जाता है और फलों को 15-20 मिनट के लिए इसमें डुबोया जाता है. ध्यान रहे कि तापमान 50°C से ऊपर न जाए. इस प्रक्रिया से फलों की 'शेल्फ लाइफ बढ़ जाती है और उनमें चमक आती है. एक्सपोर्ट होने वाले आमों के लिए यह प्रक्रिया जरूरी मानी जाती है.
आज की तारीख में दुनिया भर में आम पकाने के लिए एथिलीन गैस को सबसे बेहतर माना गया है. असल में फल पकते समय प्राकृतिक रूप से भी यही गैस छोड़ते हैं. व्यापारिक स्तर पर इसके लिए 'राइपेनिंग चैंबर' का इस्तेमाल होता है. यह एक बड़ा कमरा होता है जहां तापमान और गैस के दबाव को कंट्रोल किया जाता है. यहां रखे फल 3 से 4 दिन में बिल्कुल नेचुरल तरीके से समान रूप से पक जाते हैं. छोटे किसानों के लिए एथिलीन के छोटे पैकेट भी बाजार में उपलब्ध हैं, जिन्हें आम के बक्से में रखकर सुरक्षित तरीके से फल पकाया जा सकता है. इससे आम का स्वाद, रंग और खुशबू बरकरार रहती है और सेहत को भी कोई खतरा नहीं होता है.
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