बंजर जमीन पर उगा दिए ‘सोने’ जैसे आम!महाराष्ट्र का बीड जिला अक्सर सूखे के लिए जाना जाता है. हालांकि, अंबाजोगाई तालुका के पठान मांडवा गांव के एक किसान ने अपनी बंजर जमीन को अपनी कड़ी मेहनत और सरकारी योजनाओं के प्रभावी उपयोग से एक असली ‘जन्नत’ में बदल दिया है. किसान लक्ष्मण जोगदंड ने अपनी पथरीली ज़मीन पर आमों की खेती इस तरह से की है कि अब वह सालाना ₹1.5 लाख तक कमा रहे हैं.
लक्ष्मण जोगदंड के पास आठ एकड़ ज़मीन है. लेकिन पहाड़ी इलाका होने के कारण वहां पारंपरिक फसलें उगाना बेहद मुश्किल था. लगभग दस साल पहले उन्होंने अंबाजोगाई कृषि विभाग के माध्यम से ‘फल बागान योजना’ में हिस्सा लिया. उन्होंने अपनी ज़मीन के एक एकड़ हिस्से पर आम के 50 पौधे लगाए, जिनमें से 40 अब पूरी तरह से बड़े हो चुके हैं और उन पर फल आ रहे हैं.
पौधों की सिंचाई के लिए उन्होंने NREGA (MGNREGA) योजना के तहत अपने खेत में एक कुआँ खुदवाया. आज यही कुआं उनके पूरे बागान के लिए जीवनरेखा का काम कर रहा है.
जोगदंड के आम के बाग की सबसे खास बात यह है कि यहां सिर्फ एक ही तरह के आम नहीं उगते. उनके पास लगभग 40 अलग-अलग किस्मों के पेड़ हैं, जिनमें हापुस, रत्ना, केसर, दशहरी और खास तौर पर अचार बनाने वाले आम शामिल हैं.
वे किसी भी तरह के रासायनिक खाद या कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं करते. खेती का पूरा काम जैविक तरीकों से किया जाता है. इसी जैविक तरीके और खुद बाज़ार जाकर ग्राहकों को सीधे आम बेचने की वजह से उन्हें व्यापारियों के मुकाबले कहीं ज्यादा अच्छी कीमतें मिलती हैं.
लक्ष्मण जोगदंड बताते हैं, “शुरुआती पांच सालों तक तो कोई आमदनी ही नहीं हुई, लेकिन जैसे ही पेड़ बड़े हुए, अब हमारी सालाना बिक्री 1 से 1.5 लाख रुपये तक हो जाती है.”
इस खेती की एक खास बात यह है कि इसमें न तो महंगे कीटनाशकों के छिड़काव की ज़रूरत पड़ती है और न ही बहुत ज्यादा शारीरिक मेहनत की. बस समय पर पानी देने से ही भरपूर फसल मिल जाती है. पिछले पांच सालों में उन्होंने 5 लाख रुपये कमाए हैं और इस साल उन्हें और भी ज्यादा मुनाफ़े की उम्मीद है.
सूखा प्रभावित बीड ज़िले के दूसरे किसानों के लिए लक्ष्मण जोगदंड की सफलता की कहानी एक बेहतरीन मिसाल है. उन्होंने यह साबित कर दिया है कि अगर सरकारी योजनाओं का सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और खेती के आधुनिक व जैविक तरीकों को अपनाया जाए, तो खेती को सचमुच एक मुनाफ़े वाला काम बनाया जा सकता है.
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