जानिए शकरकंद की खेती के बारे में शकरकंद एक कंद वर्गीय सब्जी फसल है, इसकी खेती आलू की खेती की तरह ही की जाती है.यह पूरे साल भर बाजार में देखने को मिल जाती हैं. लेकिन यह विशेष रूप से सर्दियों के मौसम में इसकी खेती ज्यादा होती है. इसकी खेती ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल व महाराष्ट्र जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर की जाती है. भारत में उगने वाले शकरकंद का स्वाद आज पूरी दुनिया को भा रहा है.
वर्तमान समय में भारत से शकरकंद का निर्यात बड़े पैमाने पर किया जा रहा है. घरेलू बाज़ार में इसकी हमेशा मांग भी बनी रहती है ऐसे में किसानों के लिए शकरकंद की खेती फायदे का सौदा साबित हो सकती है. इसकी खेती सितंबर महीने में भी की जा सकती हैं.खरीफ सीजन शुरू हो चुका है ऐसे में किसान सही तरीके से शकरकंद की खेती कर अच्छा उत्पादन और मुनाफा दोनों ले सकते हैं.
शकरकंद की खेती बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त है. कठोर, पथरीली और जल भराव वाली जमीनों पर इसकी खेती करना काफी नुकसानदायक साबित हो सकता है. ध्यान रखें जिस भी भूमि पर शकरकंद की खेती की जा रही है उसका पीएच मान 5.8 से 6.8 के बीच होना चाहिए.
शकरकंद के पौधों की सिंचाई की गई रोपाई के आधार पर की जाती है. यदि इसके पौधों की रोपाई गर्मी के मौसम में की गई है, तो पौध रोपाई के तुरंत बाद उन्हें पानी देना चाहिए. इस दौरान इसके पौधों की सिंचाई सप्ताह में एक बार की जाती है. इससे खेत में पर्याप्त मात्रा में नमी बनी रहती है, और कंदो का विकास अच्छे से होता है. यदि पौधों की रोपाई बारिश के मौसम में की गई है, तो उन्हें अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है. इसके
एस टी 14, पीली प्रजाति की शंकरकंद, लाल प्रजाति की शकरकंद, भू-कृष्ण, एस टी 13, सफेद प्रजाति की शकरकंद, श्री अरूण, भू सोना और सफेद प्रजाति की शकरकंद आदि प्रमुख है। जिसे आप मौसम और भूमि के अनुसार चुनाव कर खेती कर सकते है। इसके अलावा श्री रतना, सीओ- 1, 2, श्री वर्धिनी, श्री नंदिनी, भुवन संकर, श्री वरुण, जवाहर शकरकंद- 145, वर्षा, पूसा सुहावनी, पूसा रेड, राजेंद्र शकरकंद, अशवनी और कलमेघ भी शकरकंद की कई उन्नत किस्मे है.
शकरकंद को उबालकर और भूनकर ऐसे ही खाया जाता है, इसके अलावा इसे सब्जी बनाकर भी खाते है | आलू की अपेक्षा शकरकंद में स्टार्च और मिठास अधिक मात्रा में पाई जाती है | शकरकंद में पर्याप्त मात्रा में विटामिन पाया जाता है, जिस वजह से शकरकंद का सेवन करने से बीमारियों के लिए भी यह लाभदायक होती है.
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शकरकंद की खेती किसानों के लिए मुनाफेदार साबित होती है. इसकी फसल रोपाई या बुवाई के 125 से 130 दिनों में ही तैयार हो जाती है. इसके पौधों पर लगी पत्तियां पीले रंग की दिखाई देने लगें, उस दौरान इसके कंदो की खुदाई कर लेना चाहिए. कृषि विशेषज्ञों मानों तो किसान प्रति हेक्टेयर भूमि से लगभग 25 टन शकरकंद का उत्पादन हासिल कर सकते हैं. बाजार में आप इस उपज को 10 रुपए प्रति किलो की दर से बेचेंगे तो आप आसानी से दो लाख रुपए का मुनाफा कमा सकते हैं.
इसकी खेती तीनों मौसमों में की जा सकती है, लेकिन बरसात में इसकी खेती करना सबसे लाभदायक है. इस मौसम में शकरकंद के पौधे अच्छी तरह से विकास करते हैं. पौधों की वृद्धि के लिए 25 से 34 डिग्री तक का तापमान सबसे बेहतर है.
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