Sugarcane energy: चीनी ही नहीं, अब उर्जा भी देगा गन्ना, विदेशी तेल का खेल बिगाड़ेगा भारत का एनर्जी केन

Sugarcane energy: चीनी ही नहीं, अब उर्जा भी देगा गन्ना, विदेशी तेल का खेल बिगाड़ेगा भारत का एनर्जी केन

आज जिस तरह इजराइल, ईरान और अमेरिका के दरमियान तनाव और जंग के हालात बने हुए हैं, उसने पूरी दुनिया की ऊर्जा सप्लाई की कमर तोड़ दी है. इस अस्थिरता की वजह से कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिसका सीधा असर हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था और देश की लोगों की जेब पर पड़ रहा है। अगर यह विवाद) लंबा खिंचा, तो आने वाले वक्त में ईंधन का बड़ा संकट पैदा हो सकता है। ऐसे नाजुक दौर में यह बेहद जरूरी है कि हम गैरों की मेहरबानी पर निर्भर रहने के बजाय अपनी सरजमीं संसाधनों पर भरोसा करें। खुशकिस्मती से, भारत एक खेतिहर देश है और यहाँ का गन्ना अब सिर्फ चीनी तक सीमीत नहीं है, बल्कि 'एनर्जी केन' के तौर पर मुल्क को आत्मनिर्भर बनाने की कुव्वत रखता है.गन्ने को केवल मीठे रस का जरिया न मानकर उसे देश की वास्तविक 'ऊर्जा शक्ति' के रूप में स्थापित किया जा सके.

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चीनी ही नहीं, अब उर्जा भी देगा गन्ना, विदेशी तेल का खेल बिगाड़ेगा भारत का एनर्जी केनगन्ने से मिलेगा ऊर्जा संकट का समाधान

आज की दुनिया जिस तरह इजराइल, ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव और युद्ध की विभीषिका से जूझ रही है, उसका सीधा और गहरा असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ा है. इस भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और ईंधन की किल्लत न केवल दुनिया भर में, बल्कि हमारे देश भारत में भी एक गंभीर चिंता का विषय बन गई है. यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो भविष्य में ऊर्जा का यह संकट और भी भयावह रूप ले सकता है, जो हमारी अर्थव्यवस्था की रफ्तार को रोक सकता है. ऐसे चुनौतीपूर्ण और अनिश्चित समय में यह बेहद जरूरी हो गया है कि हम अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बाहरी देशों की मेहरबानी पर निर्भर रहने के बजाय अपने घरेलू संसाधनों का रुख करें.

भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां की मिट्टी में वह ताकत है जो हमें ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना सकती है. आज के दौर में गन्ना सिर्फ चीनी उत्पादन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सबसे बेहतर, किफायती और टिकाऊ ऊर्जा स्रोत बनकर उभर रहा है. हमारे कृषि वैज्ञानिकों को अब इस दिशा में और भी तीव्रता से काम करना होगा ताकि गन्ने को केवल मीठे रस का जरिया न मानकर उसे देश की वास्तविक 'ऊर्जा शक्ति' के रूप में स्थापित किया जा सके.

गन्ना कैसे मीठा के साथ है उर्जा की शक्ति?

दुनिया भर में दशकों से गन्ने को पारंपरिक रूप से केवल चीनी और गुड़ बनाने के उद्देश्य से ही उगाया जाता रहा है. पुराने मानकों के अनुसार, गन्ने में फाइबर की मात्रा लगभग 13% से 15% के बीच होती थी. उस दौर में यदि किसी गन्ने की किस्म में फाइबर 15% से अधिक पाया जाता था, तो उसे 'घटिया' या 'बेकार' मानकर रिजेक्ट कर दिया जाता था, क्योंकि उसमें रस की मात्रा कम होती थी और चीनी मिलों को उससे मुनाफा नहीं मिलता था. लेकिन बदलती तकनीक और ऊर्जा की बढ़ती मांग ने इस नजरिए को पूरी तरह बदल दिया है.

आज गन्ना सिर्फ एक खाद्य फसल नहीं, बल्कि बिजली, एथेनॉल, बायो-सीएनजी, कागज और यहां तक कि भविष्य के ईंधन 'हाइड्रोजन' को बनाने का एक बहुमुखी कच्चा माल बन चुका है. इसी वैचारिक बदलाव ने "एनर्जी केन" के क्रांतिकारी कॉन्सेप्ट को जन्म दिया है. सबसे पहले 1980 के दशक में मशहूर वैज्ञानिक अलेक्जेंडर ने दुनिया का ध्यान इस ओर खींचा कि गन्ने के हर हिस्से—चाहे वह तना हो, पत्तियां हों या पेराई के बाद बची खोई—का उपयोग ऊर्जा उत्पादन के लिए किया जा सकता है. यही वह मोड़ था जहां से गन्ने ने एक औद्योगिक ईंधन का रूप लेना शुरू किया.

गन्ना बनेगा गेम चेंजर, जानिए क्या है एनर्जी केन

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, एनर्जी केन गन्ने की वह विशेष किस्म है जिसे चीनी के दाने बनाने के लिए नहीं, बल्कि भारी मात्रा में बायोमास और सीधे ऊर्जा उत्पादन के लिए वैज्ञानिक तरीके से तैयार किया जाता है. जहां हमारा सामान्य गन्ना पानी और मिठास से भरपूर होता है, वहीं एनर्जी केन के तने बहुत अधिक घने, ऊंचे और पतले होते हैं और इनकी जड़ें जमीन में काफी गहराई तक जाती हैं, जो इन्हें कठोर परिस्थितियों में टिके रहने की शक्ति देती हैं.

वैज्ञानिकों ने इसे मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित किया है. पहली श्रेणी साधारण गन्ने की है, जिसमें 75% पानी और कम रेशा होता है. दूसरी श्रेणी 'टाइप-I एनर्जी केन' की है, जिसमें रस की मिठास 15% से अधिक और रेशा 20% से ज्यादा होता है; इसके रस से सीधे एथेनॉल बनाया जाता है और कचरे से बिजली पैदा होती है. तीसरी और सबसे अहम श्रेणी 'टाइप-II एनर्जी केन' की है, जिसमें रेशों की मात्रा 25% से भी अधिक होती है, लेकिन मिठास कम होती है. इस किस्म को मिल में पेरने के बजाय पूरा का पूरा काटकर सीधे बड़े बॉयलरों में जलाया जाता है ताकि बहुत बड़े पैमाने पर बिजली का उत्पादन किया जा सके.

खेतों में तैयार हो रही है भारत की नई 'ऊर्जा शक्ति'

एनर्जी केन की एक नई और सक्षम किस्म को विकसित करना कोई रातों-रात होने वाला चमत्कार नहीं है. इसके लिए वैज्ञानिकों को प्रयोगशालाओं और खेतों में लगभग 7 से 9 साल तक कठिन परिश्रम करना पड़ता है. इसकी वैज्ञानिक प्रक्रिया दुनिया भर से गन्ने की विभिन्न जंगली और घरेलू प्रजातियों, जैसे कि 'सैकरम स्पोंटेनियम, के संग्रह से शुरू हुई थीै. भारत में तमिलनाडु के कोयंबटूर स्थित 'ICAR-गन्ना प्रजनन संस्थान' (ICAR-SBI) इस शोध के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अग्रणी भूमिका निभा रहा है. यहां के वैज्ञानिक अलग-अलग प्रजातियों के बीच 'हाइब्रिडाइजेशन' यानी संकरण की प्रक्रिया अपनाते हैं ताकि एक ऐसी संकर फसल तैयार हो सके जो खराब मौसम, सूखे और कम पानी में भी तेजी से बढ़ सके.

इस लंबी चयन प्रक्रिया के दौरान केवल उन्हीं पौधों को आगे बढ़ाया जाता है जिनकी पैदावार प्रति एकड़ सर्वाधिक हो, जिनमें कीटों और बीमारियों से लड़ने की स्वाभाविक क्षमता हो और जिनका बायोमास वजन में काफी भारी हो. यह तकनीक न केवल विज्ञान का कमाल है, बल्कि भारत की बंजर जमीन को हरा-भरा और उपजाऊ बनाने का एक ठोस ब्लूप्रिंट भी है.

खेतों में उगेगा भविष्य का ईंधन

भारत में एनर्जी केन पर वास्तविक और व्यवस्थित शोध कार्य साल 2009 में ICAR-SBI, कोयंबटूर में शुरू हुआ था और आज इसके परिणाम बेहद उत्साहजनक हैं. यहां के काबिल वैज्ञानिकों ने अब तक एनर्जी केन की लगभग 21 विशेष किस्में विकसित कर ली हैं, जिनमें 'SBIEC 11001' और 'SBIEC 11002' प्रमुख हैं. इन किस्मों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें सामान्य उपजाऊ खेतों में उगाने की जरूरत नहीं है, जहां पहले से ही खाद्य फसलें उग रही हैं. वैज्ञानिकों ने इन्हें विशेष रूप से उन इलाकों के लिए तैयार किया है जहां पानी की भारी किल्लत है, जहां की जमीन खारी या दलदली है, या जहां जलभराव के कारण अन्य फसलें दम तोड़ देती हैं.

परीक्षणों के दौरान 'SBIEC 11001' जैसी किस्मों ने प्रति हेक्टेयर 279 टन तक की बंपर पैदावार देकर सबको चौंका दिया है. इन नई किस्मों के व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए अब निजी कंपनियों को भी लाइसेंस दिए जा रहे हैं, ताकि रिसर्च लैब की यह सफलता सीधे किसानों के खेतों और फैक्टरियों तक पहुंच सके. यह कदम न केवल बेकार पड़ी भूमि का सदुपयोग करेगा बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा को एक नया आयाम भी प्रदान करेगा.

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