गन्ने की पेड़ी देगी मुख्य फसल से ज्यादा मुनाफागन्ने की खेती में 'पेड़ी' मुख्य फसल की कटाई के बाद जमीन में बचे ठूंठों से दोबारा फसल लेने की विधि है. यह तकनीक भारतीय किसानों के लिए वरदान है क्योंकि इसमें न तो खेत की तैयारी का खर्चा होता है और न ही नए बीज की जरूरत पड़ती है. पेड़ी की फसल मुख्य फसल की तुलना में लगभग 25-30 फीसदी सस्ती होती है और यह जल्दी पककर तैयार हो जाती है. इसके अलावा, पेड़ी के गन्ने में रस की गुणवत्ता और चीनी की मात्रा भी बेहतर पाई जाती है. सही तरीकों और प्रबंधन का पालन करके पेड़ी से मुख्य फसल से अधिक पैदावार ली जा सकती है.
पेड़ी की सफलता पूरी तरह से गन्ने की किस्म पर निर्भर करती है. इसलिए जो विशेषज्ञ अनुमोदित हो उसी किस्म को पेड़ी के रूप में लेना चाहिए.
गन्ने की खेती के विशेषज्ञों के अनुसार, पेड़ी के लिए मुख्य फसल की कटाई के समय धारदार औजारों का प्रयोग करना चाहिए ताकि ठूंठ जमीन की सतह के बराबर कटें. इससे जमीन के नीचे की कलिकाओं को फूटने में आसानी होती है और जड़ें गहराई तक जाती हैं, जिससे पौधा मजबूत होता है. कटाई के तुरंत बाद 'स्टबल शेविंग' यानी ठूंठों की छंटाई एक बेहद जरूरी प्रक्रिया है. इससे पुरानी और बेकार कलिकाएं हट जाती हैं और नई स्वस्थ कलिकाओं का विकास होता है.
अक्सर देखा गया है कि कटाई के दौरान मजदूरों या मशीनों की आवाजाही से खेत में कुछ जगह खाली रह जाती हैं. इन खाली जगहों को भरने के लिए 'पॉलीबैग' में तैयार किए गए 35-40 दिन पुराने पौधों का उपयोग करना चाहिए. विशेषज्ञो के अनुसार ठूंठ छंटाई के साथ-साथ खाली जगहों को सही समय पर भर दिया जाए, तो पेड़ी की उपज में जबरदस्त बढ़ोत्तरी होती है.
पेड़ी की फसल को मुख्य फसल की तुलना में थोड़े अधिक नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है. वैज्ञानिक अनुशंसा के अनुसार, प्रति एकड़ 3 बैग यूरिया, 5 बैग सुपर फास्फेट और 1.50 बैग पोटाश का उपयोग करना चाहिए. इसके साथ ही 'एज़ोस्पिरीलम' और 'फास्फोबैक्टर' जैसे जैव-उर्वरकों का प्रयोग मिट्टी की सेहत सुधारने में मदद करता है. सिंचाई के लिए अगर संभव हो तो ड्रिप विधि अपनानी चाहिए, अन्यथा 'एकांतर कूड़' विधि से पानी देना चाहिए. इससे पानी की बचत होती है और जड़ों को पर्याप्त नमी मिलती रहती है.
गन्ने की सूखी पत्तियों को खेत में जलाना नहीं चाहिए. इन पत्तियों को कतारों के बीच बिछाने से मिट्टी की नमी बनी रहती है और खरपतवार कम उगते हैं. यह मल्चिंग बाद में सड़कर खाद बन जाती है, जो मिट्टी को नाइट्रोजन और पोटाश प्रदान करती है. खरपतवार नियंत्रण के लिए पेड़ी शुरू होने के 1, 4 और 7 सप्ताह बाद निराई-गुड़ाई करनी चाहिए. अगर मजदूरों की कमी हो, तो एट्राजीन 2.0 किग्रा प्रति 800 ग्राम प्रति एकड़ का छिड़काव वैज्ञानिक सलाह के अनुसार किया जा सकता है. मल्चिंग से 'अगेती तना छेदक' कीट का हमला भी कम होता है.
पेड़ी की कतारों के बीच खाली जगह का उपयोग दलहन फसल मूंग, उड़द या सब्जियों जैसे फ्रेंच बीन की खेती के लिए किया जा सकता है. इससे न केवल अतिरिक्त आय होती है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ती है. श्रम की समस्या को दूर करने के लिए ICAR-IISR द्वारा विकसित 'आर.एम.डी. मशीन का उपयोग किया जा सकता है, जो ठूंठ छंटाई, खाद डालने और मिट्टी चढ़ाने का काम एक साथ कर देती है. अंत में, ध्यान रहे कि पेड़ी की फसल मुख्य फसल से एक महीना पहले कटाई के लिए तैयार हो जाती है.
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