सोयाबीन की बुवाई में गिरावट दर्जभारत में सोयाबीन के दिन अच्छे नहीं चल रहे हैं. यह बात सोयाबीन की बुवाई के संदर्भ में कही जा रही है. केंद्रीय कृषि मंत्रालय का ताजा आंकड़ा बताता है कि देशभर में सोयाबीन बुवाई पिछले साल के मुकाबले गिरावट में है. 19 जून तक इसमें 1.20 लाख हेक्टेयर की कमी है. यह गिरावट ऐसे समय में देखी जा रही है जब सरकार खाद्य तेलों में देश को आत्मनिर्भर बनाने का अभियान चला रही है. इसके लिए तिलहन मिशन भी जारी है. ऐसे में सोयाबीन की बुवाई में गिरावट केवल सरकार के लिए नहीं बल्कि किसानों के लिए भी चिंता की बात है. इस चिंता को अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) की एक हालिया रिपोर्ट ने और पुख्ता कर दिया है. रिपोर्ट बताती है कि पूरी दुनिया में इस बार सोयाबीन की खेती महंगी होगी क्योंकि उसके सभी इनपुट्स महंगे हो चले हैं. खेती की लागत बढ़ने का संकेत देने वाली यह रिपोर्ट किसानों को और अधिक परेशान कर सकती है.
दरअसल, USDA ने 18 जून को एक डेटा जारी किया, जिससे पता चलता है कि इस साल सोयाबीन उगाने की लागत 4% से अधिक बढ़कर 684 डॉलर (7885 रुपये) प्रति एकड़ होने की उम्मीद है. 2027 में प्रति-एकड़ लागत में और 3% की बढ़ोतरी होने का अनुमान है. रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल बीज और केमिकल की लागत में थोड़ी कमी आने की उम्मीद है, लेकिन अन्य ऑपरेटिंग लागतों में बढ़ोतरी होने की संभावना है. USDA का अनुमान है कि इस साल फर्टिलाइज़र की लागत 16% बढ़ेगी, जबकि तेल, ल्यूब और बिजली की लागत में प्रति एकड़ लगभग 28% की बढ़ोतरी का अनुमान है. ये सभी फैक्टर सोयाबीन की खेती को महंगा बनाएंगे.
रिपोर्ट से एक ही सवाल पैदा होता है कि सोयाबीन की महंगी खेती से क्या होगा? तकनीकी रूप से देखें तो बहुत कुछ होगा जिसका असर दूर तक देखा जाएगा. सबसे पहले तो वैसे किसान सोयाबीन की खेती से दूर जाएंगे जिनके पास खर्च करने के लिए बहुत संसाधन नहीं है. ऐसे किसान मंहगी लागत के डर से सोयाबीन को छोड़कर किसी दूसरी फसल की ओर शिफ्ट होंगे. देश के कई जिलों में ऐसा ट्रेंड देखा जा रहा है, तभी सोयाबीन की बुवाई में गिरावट दर्ज की गई है.
खेती में इस गिरावट को अल नीनो से और बल मिला है. अल नीनो नहीं होता तो खेती के लिए मौसम अनुकूल होता और सिंचाई की समस्या खड़ी नहीं होती. मिट्टी की नमी कम होने से भी किसान सोयाबीन की खेती से कतरा रहे हैं. किसानों में भविष्य को लेकर चिंता है कि आगे मॉनसून की टेढ़ी चाल रही तो उनकी फसल मारी जाएगी. पानी की कमी से पूरी फसल सूख जाएगी. इस डर ने सोयाबीन किसानों को सकते में डाल दिया है.
अब सवाल है कि जब सोयाबीन की खेती घटेगी, तो भारत जैसे देश पर क्या असर होगा. असर बहुत बड़ा हो सकता है क्योंकि भारत सोया तेल में दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार है जिसका इस्तेमाल खाद्य तेलों में होता है. यह सोया तेल सोयाबीन से ही बनता है. इसके अलावा, भारत में बड़े पैमाने पर सोयाबीन का आयात होता है जो मुख्य तौर पर अफ्रीकी देशों से आता है. अफ्रीकी देशों में नॉन जीएम सोयाबीन की उपज होती है जबकि अमेरिका जैसे सोयाबीन प्रधान देशों में यह फसल मुख्य तौर पर जीएम होती है. इसलिए भारत आयात नहीं करता. सोयाबीन का आयात तेल के अलावा पोल्ट्री फीड और सोयामील जैसे प्रोडक्ट के लिए किया जाता है.
इससे समझना आसान है कि सोयाबीन की खेती कम होने से आयात बढ़ेगा जिससे तेलों के दाम बढ़ेंगे. खेती घटने से सोयाबीन की देसी सप्लाई कम होगी जिससे मार्केट में अस्थिरता का दौर बढ़ेगा. हालांकि उन किसानों के लिए यह अच्छा मौका होगा जो तमाम परेशानियों के बावजूद सोयाबीन उगाएंगे. इन किसानों को उनकी उपज का बढ़िया रेट मिलेगा जैसा कि अभी देखने में आ रहा है. अभी मार्केट में सोयाबीन की बहुत मांग है, जबकि सप्लाई अच्छी नहीं है. इससे रेट में भारी इजाफा है. किसानों को सरकारी रेट से भी अधिक भाव मिल रहे हैं.
कुल मिलाकर, अगर खेती में गिरावट का ट्रेंड यूं ही जारी रहा और USDA की रिपोर्ट के मुताबिक खेती की लागत महंगी रही तो सोयाबीन के दिन अच्छे आने वाले नहीं हैं.
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