Paddy disease : धान के बौनेपन को यूरिया की कमी न समझें, ऐसे बचाएं अपनी फसल

Paddy disease : धान के बौनेपन को यूरिया की कमी न समझें, ऐसे बचाएं अपनी फसल

धान की फसल में तीन चार साल से एक नई और गंभीर आफत आ गई है,जिससे पौधे बहुत छोटे यानी बौने रह जाते हैं। इस बीमारी के कारण पौधों की बढ़त पूरी तरह रुक जाती है और फसल में बालियां तक नहीं निकल पातीं. किसान इसे खाद या पोषक तत्वों की कमी समझ बैठते हैं, लेकिन असल में यह एक खतरनाक वायरस का हमला है. इस वजह से पैदावार में 30 से 80 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आ रही है, जिससे किसानों की पूरी मेहनत बर्बाद हो रही है.

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Paddy  disease : धान के बौनेपन को यूरिया की कमी न समझें, ऐसे बचाएं अपनी  फसलधान में बौनापन बीमारी

आजकल धान की फसल में पौधों का छोटा या बौना रह जाना किसानों के लिए एक बहुत बड़ी फिक्र का सबब बन गया है. दिन-रात मेहनत करने वाले किसान जब अपनी फसल की बढ़वार को रुका हुआ देखते हैं, तो उनकी परेशानी बढ़ना लाज़िमी है. पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और उत्तर भारत के कई इलाकों में यह  नई मुश्किल पिछले तीन सालो से तेज़ी से दस्तक दे रही है.पूसा समस्तीपुर के डॉ. राजेंद्र प्रसाद एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में प्लांट प्रोटेक्शन विभाग के हेड, डॉ. एस.के.सिंह का कहना है कि  जब कृषि विशेषज्ञो की एक खास टीम ने इसकी गहराई से जांच की, तो एक चौंकाने वाली हकीकत सामने आई। पता चला कि यह कोई आम बीमारी या सिर्फ मौसम की मार नहीं है, बल्कि इसके पीछे 'सदर्न राइस ब्लैक-स्ट्रीक्ड ड्वार्फ वायरस'(SRBSDV) नाम का एक बेहद खतरनाक वायरस है.

यह वायरस धान के पौधों की ग्रोथ को पूरी तरह से रोक देता है, जिससे पैदावार में भारी नुकसान होता है. हालांकि, अभी कुछ राज्यों में यह बीमारी नहीं दिखी है, लेकिन अक्लमंदी इसी में है कि हम वक़्त रहते इससे खबरदार रहें और अपनी फसल को महफूज़ रखने की तैयारी पहले से कर लें.

कैसे समझें कि फसल में वायरस है?

डॉ. एस.के. सिंह के मुताबिक़.किसी भी बीमारी का पक्का इलाज तभी मुमकिन है, जब उसकी पहचान सही वक़्त पर हो जाए। इस वायरस का असर होते ही पौधे अपनी आम ऊंचाई से काफी छोटे यानी बौने रह जाते हैं और उनकी बढ़वार पूरी तरह थम जाती है. अक्सर देखने में आता है कि पौधों में कल्ले (tillers) तो बहुत ज़्यादा निकलते हैं, लेकिन वो अंदर से बेहद कमज़ोर होते हैं. इसकी एक और बड़ी पहचान यह है कि पौधों की पत्तियां गहरे हरे रंग की, मोटी और बिल्कुल सीधी खड़ी नज़र आती हैं. इसके अलावा, पौधों की जड़ों का विकास भी रुक जाता है.

सबसे बड़ी दिक्कत तो यह है कि बहुत से पौधों में बालियां या तो निकलती ही नहीं, या फिर इतनी छोटी आती हैं कि दानों का भराव ठीक से नहीं हो पाता. खेत में अगर आप गौर से देखें, तो ये बीमार पौधे अक्सर एक जगह गुच्छों  में दिखाई देते हैं, जिसका सीधा असर हमारी मेहनत और मुनाफे पर पड़ता है.

बीमारी की फैलने का असली वजह 

प्लांट प्रोटेक्शन हेड  के अनुसार.अक्सर इस बौनेपन को किसान यूरिया, जिंक या किसी और ज़रूरी खाद की कमी समझ लेते हैं. इसी गलतफहमी में वो खेत में बेतहाशा खाद और दवाइयां डालने लगते हैं, जिसका कोई फायदा नहीं होता. असल हकीकत यह है कि इस बीमारी को फैलाने का सबसे बड़ा दुश्मन 'सफेद पीठ वाला प्लांट हॉपर' नाम का एक रस चूसने वाला कीड़ा है. जब मौसम में अचानक बदलाव होता है, नमी बढ़ती है, या बेमौसम की बरसात के साथ गर्मी पड़ती है, तो इन कीड़ों की तादाद बहुत तेज़ी से बढ़ने लगती है. खेत में खरपतवार का हद से ज़्यादा होना,

लगातार एक ही तरह की फसल बोना और असंतुलित खाद का इस्तेमाल भी इस वायरस को फैलने का पूरा मौका देता है. अगर शुरुआती दौर में ही इस कीड़े और वायरस को नहीं रोका गया, तो पैदावार में 30 से 80 फीसद तक का भारी नुकसान हो सकता है और लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है.

अपनी फसल को सुरक्षित कैसे रखें?

फसल को इस खतरनाक वायरस से बचाने के लिए सबसे ज़रूरी कदम है खेत की साफ-सफाई। मेड़ों पर और खेत के आसपास उगने वाली फालतू घास को फौरन हटा दें, क्योंकि यहीं छिपकर ये कीड़े अपनी तादाद बढ़ाते हैं. रोपाई के बाद अगर आपको कोई भी पौधा अजीब या बौना लगे, तो उसे जड़ समेत उखाड़कर खेत से दूर फेंक दें या ज़मीन में गाड़ दें. हर हफ्ते अपने खेत का मुआयना ज़रूर करें; कुछ पौधों को हल्का सा झुकाकर थपथपाएं, अगर पानी में सफेद रंग के छोटे कीड़े गिरते दिखें, तो फौरन अलर्ट हो जाएं. अगर कीड़ों का हमला ज़्यादा लगे, तो डॉ एस, के सिंह  कहा कि 'ट्राइफ्लूमेजोपाइरिम 10 SC' दवा 235 मिली प्रति हेक्टेयर या 'डाइनोटेफ्यूरान 20 SG' दवा 200 ग्राम प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करें. हमेशा ध्यान रखें कि स्प्रे का फव्वारा पौधों की जड़ों की तरफ हो, क्योंकि ये खतरनाक कीड़े अक्सर वहीं छिपे रहते हैं.

 क्या करें और क्या  ना करें

डॉ. एस.के. सिंह ने बताया कि आखिर में, यह समझना बहुत ज़रूरी है कि सिर्फ बीमार पौधों को उखाड़ फेंकना ही काफी नहीं है, बल्कि बीमारी फैलाने वाले कीड़े का पक्का इलाज करना भी उतना ही ज़रूरी है. हमेशा अपने खेत की कड़ी निगरानी करें. खेत में ज़रूरत से ज़्यादा यूरिया का इस्तेमाल हरगिज़ न करें, क्योंकि इससे पौधे नरम हो जाते हैं और बीमारी लगने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है. मिट्टी की जांच के हिसाब से ही पोटाश और जिंक जैसी खाद का एक संतुलित तरीके से इस्तेमाल करें, जिससे पौधों में अंदरूनी ताकत आए। बिना वजह और बार-बार कीटनाशक दवाइयों का छिड़काव करने से बचें, ताकि कीड़ों में दवा के खिलाफ ताकत पैदा न हो. अगर आप इन आसान, वैज्ञानिक और असरदार बातों का खयाल रखेंगे, तो आपकी धान की फसल इस नई आफत से पूरी तरह सुरक्षित होगी और आपको एक शानदार पैदावार का तोहफा मिलेगा.


 

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