सरसों उत्पादन में वृद्धि का अनुमानसॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) ने इस साल सरसों उत्पादन में सुधार का अनुमान दिया है. रेपसीड-सरसों रबी मौसम की एक प्रमुख तिलहन फसल है जो देश के कई राज्यों में बड़े पैमाने पर बोई जाती है. इस अनुमान के अनुसार, रबी 2025-26 के दौरान पूरे भारत में रेपसीड-सरसों का रकबा बढ़कर 93.91 लाख हेक्टेयर (lh) हो गया है, जबकि 2024-25 में यह 92.15 लाख हेक्टेयर था.
रबी 2025-26 मौसम में कुल उत्पादन 119.4 लाख टन (lt) रहने का अनुमान है, जबकि पिछले मौसम में यह 115.2 lt था. इस तरह इसमें 3.64 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है. अनुकूल मौसम की स्थिति और बेहतर खेती की वजह से औसत उपज बढ़कर 1,271 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई है, जो रबी 2024-25 में 1,250 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी.
एक मीडिया बयान में कहा गया है कि उत्पादन में यह वृद्धि मुख्य रूप से बुवाई के रकबे में बढ़ोतरी और साथ ही प्रमुख उत्पादक राज्यों में उपज में मामूली सुधार के कारण हुई है.
सरसों उत्पादन में राजस्थान देश में सबसे आगे बना हुआ है, जहां उत्पादन 53.9 lt (2024-25 में 52 lt) रहने का अनुमान है. उत्तर प्रदेश में उत्पादन बढ़कर 18.1 lt (15.6 lt) हो गया है. मध्य प्रदेश में उत्पादन में मामूली गिरावट देखी गई और यह 13.9 lt (14.7 lt) पर आ गया. हरियाणा ने लगातार वृद्धि दिखाई है, जहां उत्पादन 12.7 lt (12.3 lt) तक पहुंच गया है.
अन्य राज्यों में, पश्चिम बंगाल और गुजरात ने भी अच्छी वृद्धि दर्ज की है, जहां उत्पादन क्रमशः 7.4 lt (6.8 lt) और 5.9 lt (5.4 lt) रहने का अनुमान है. हालांकि, असम में उपज कम रहने का अनुमान है, जिसके कारण उत्पादन घटकर 2.1 lt (2.5 lt) रह गया है, जबकि बिहार में उत्पादन काफी हद तक स्थिर रहा और 0.9 lt पर बना रहा.
SEA के प्रेसिडेंट संजीव अस्थाना ने कहा कि कहा, "SEA-Agriwatch सरसों फसल सर्वेक्षण के नतीजे भारत के तिलहन क्षेत्र की मजबूती की पुष्टि करते हैं. सरसों की अच्छी फसल घरेलू खाद्य तेल की उपलब्धता को बेहतर बनाने और आयात पर निर्भरता कम करने में अहम भूमिका निभाएगी."
SEA रेप-सरसों संवर्धन परिषद के चेयरमैन विजय डाटा ने कहा: "कुल मिलाकर, रबी 2025-26 की सरसों की फसल एक सकारात्मक तस्वीर पेश करती है, जिससे भारत में तिलहन की उपलब्धता की स्थिति मजबूत होती है. हालांकि, पैदावार और बुवाई के रकबे में क्षेत्रीय अंतर अभी भी उत्पादन को प्रभावित कर रहे हैं."
SEA के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर बी.वी. मेहता ने कहा कि ये अनुमान अभी शुरुआती हैं और बदलते कृषि हालात, रियल-टाइम रिमोट सेंसिंग इनपुट के आधार पर इनमें बदलाव किया जा सकता है. जैसे-जैसे मौसम आगे बढ़ेगा, बुवाई के रकबे और कटाई की अपडेट रिपोर्ट साझा की जाएंगी. उन्होंने बताया कि एसोसिएशन पैदावार और उत्पादन के अपने अनुमानों की पुष्टि के लिए अप्रैल-मई के दौरान अपना तीसरा और अंतिम फील्ड सर्वेक्षण करेगा.
बयान में कहा गया है कि ये अनुमान सरसों उगाने वाले 75 प्रमुख जिलों में किए गए फील्ड सर्वेक्षण के दो दौर पर आधारित हैं. इन सर्वेक्षणों में 1,611 किसानों (पहले दौर में 1,208 और दूसरे दौर में 403) को शामिल किया गया. सर्वे से बुवाई के रकबे, फसल की स्थिति, मिट्टी की नमी और पैदावार की उम्मीदों से जुड़े डेटा मिले, जिसने उत्पादन के अंतिम अनुमानों का आधार तैयार किया.
मार्च 2026 में हुई बेमौसम बारिश का राजस्थान में न के बराबर प्रभाव पड़ा, जहां कटाई का काम पूरा हो चुका है. पश्चिम बंगाल में इसका प्रभाव बहुत कम रहा. हरियाणा और उत्तर प्रदेश में कुछ इलाकों में मध्यम स्तर का नुकसान हुआ, जबकि असम में खड़ी फसल के बड़े हिस्से के सीधे संपर्क में आने के कारण इसका प्रभाव सबसे अधिक (6-9 प्रतिशत) रहा. बुवाई और वानस्पतिक चरणों के दौरान मिट्टी में नमी की स्थिति आम तौर पर अनुकूल थी, हालांकि मौसम के अंत में अत्यधिक नमी के कारण कुछ जगहों पर नुकसान हुआ (विशेष रूप से असम में), जबकि गुजरात और राजस्थान में नमी का स्तर कुछ कम रहा.
तापमान की स्थितियां काफी हद तक फसल के अनुकूल थीं. उत्तर भारत में मौसम ठंडा होने से फसल के विकास में मदद मिली, जबकि गुजरात में तापमान अधिक होने से फसल जल्दी पक गई. हालांकि फसल में दाने आने के दौरान कुछ तनाव भी देखने को मिला.
बयान में कहा गया है कि सरसों के मौसम की शुरुआत अक्टूबर की शुरुआत में मिट्टी में नमी की अनुकूल स्थितियों के साथ हुई, जिससे प्रमुख राज्यों में बुवाई में मदद मिली. हालांकि, अक्टूबर के अंत और नवंबर की शुरुआत में रुक-रुककर हुई भारी बारिश ने कई क्षेत्रों में खेतों के काम में बाधा डाली, जिसके कारण बुवाई में देरी हुई, अंकुरण असमान रहा और कुछ जगहों पर दोबारा बुवाई करनी पड़ी.
पौधे बढ़ने (नवंबर-दिसंबर) के दौरान, शुष्क और स्थिर मौसम ने फसल की रिकवरी और विकास में मदद की, हालांकि वर्षा-आधारित क्षेत्रों में मिट्टी में नमी कम हो गई, जिससे फसल की बढ़वार में असमानता देखने को मिली.
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