कश्मीरी चेरीकश्मीर की मशहूर चेरी इस बार मौसम की मार झेल रही है. किसानों और उद्योग से जुड़े लोगों के मुताबिक, इस सीजन में चेरी का उत्पादन करीब 50 फीसदी तक घट गया है, जिससे बागवान काफी परेशान हैं. किसानों का कहना है कि चेरी के पेड़ों पर फूल आने और फल बनने के समय मौसम ने बड़ा खेल कर दिया. पहले सामान्य से ज्यादा गर्मी पड़ी और उसके बाद बीच-बीच में लगातार बारिश होती रही. मौसम के इस उतार-चढ़ाव का सीधा असर चेरी की फसल पर पड़ा है. किसानों का कहना है कि अगर मौसम इसी तरह बदलता रहा तो आने वाले समय में चेरी की खेती करना और मुश्किल हो सकता है. वहीं कम उत्पादन की वजह से बाजार में चेरी की कीमतों में भी असर देखने को मिल सकता है.
उत्पादन कम होने के बावजूद चेरी किसानों के लिए थोड़ी राहत की बात यह है कि बाजार में चेरी के दाम फिलहाल ज्यादा नहीं गिरे हैं. इससे बाग मालिकों को कुछ हद तक कम नुकसान होने का खतरा दिख रहा है. इस बीच, कश्मीर वैली फ्रूट ग्रोअर्स कम डीलर्स एसोसिएशन के चेयरमैन बशीर अहमद बशीर ने बताया कि इस सीजन में चेरी उत्पादन में करीब 45 से 50 फीसदी तक की गिरावट आई है.
उन्होंने कहा कि अप्रैल और मई के पहले हफ्ते में मौसम लगातार बदलता रहा. कभी ज्यादा गर्मी पड़ी तो कभी बारिश हुई, जिसका सीधा असर चेरी की फसल पर पड़ा. खराब मौसम की वजह से फूल और फल दोनों प्रभावित हुए, जिससे इस साल उत्पादन काफी कम हो गया है. उन्होंने बताया कि बाजार में चेरी की मांग अच्छी बनी हुई है, इसलिए कीमतों में ज्यादा गिरावट नहीं आई. इसका फायदा किसानों को मिला और कम उत्पादन होने के बावजूद उन्हें बहुत बड़े आर्थिक नुकसान का सामना नहीं करना पड़ा.
किसानों के मुताबिक, इस समय बाजार में इटैलियन और बुल्गारियन जैसी विदेशी चेरी की किस्मों को अच्छे दाम मिल रहे हैं. ये चेरी करीब 200 से 300 रुपये प्रति किलो तक बिक रही हैं. शोपियां के चेरी किसान रियाज़ अहमद ने बताया कि अगर आने वाले दिनों में मौसम खराब रहा, तो किसानों की कमाई पर और ज्यादा असर पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि अभी सिर्फ शुरुआती किस्मों की ही तुड़ाई शुरू हुई है. वहीं, कई दूसरी किस्में खासकर ऊंचाई वाले इलाकों में अभी पकनी बाकी है. ऐसे में लगातार हो रही बारिश उनकी क्वालिटी खराब कर सकती है, जिससे किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है.
भारत में होने वाले कुल चेरी उत्पादन का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा कश्मीर से आता है. यहां हर साल करीब 12,000 से 14,000 मीट्रिक टन चेरी का उत्पादन होता है. कश्मीर की चेरी अपने स्वाद और क्वालिटी के लिए देशभर में मशहूर मानी जाती है. घाटी में मीठी और खट्टी, दोनों तरह की चेरी उगाई जाती हैं. पहले यहां मिश्री, मखमली और डबल चेरी जैसी पारंपरिक देसी किस्में ज्यादा लोकप्रिय थीं. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में किसानों का रुझान विदेशी किस्मों की तरफ बढ़ा है. अब कई किसान कोर्डिया, रेजिना और स्टेला जैसी किस्में उगा रहे हैं, क्योंकि इन्हें बदलते मौसम के हिसाब से ज्यादा बेहतर और टिकाऊ माना जा रहा है.
भारत अपनी जरूरत पूरी करने के लिए चिली, अफगानिस्तान, अमेरिका, तुर्की और कनाडा जैसे देशों से भी चेरी आयात करता है. इनमें चिली सबसे बड़ा सप्लायर बनकर उभरा है. साल 2024 के व्यापारिक आंकड़ों के मुताबिक, चिली ने भारत को करीब 4.8 मिलियन डॉलर की चेरी निर्यात की, जो दूसरे देशों के मुकाबले काफी ज्यादा है. वहीं, कश्मीर की चेरी अब विदेशों तक भी पहुंचने लगी है. पिछले साल पहली बार कश्मीर की प्रीमियम चेरी को सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के लुलु सुपरमार्केट में भेजा गया. यह खाड़ी देशों के बाजारों में कश्मीर की चेरी का पहला बड़ा व्यावसायिक निर्यात था.
हालांकि चेरी उगाने वाले किसानों को कटाई के बाद सबसे बड़ी समस्या फलों के जल्दी खराब होने की रहती है, क्योंकि चेरी की शेल्फ लाइफ काफी कम होती है. लेकिन अब पार्सल ट्रेनों की शुरुआत से किसानों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है. इससे फलों को देश के बड़े बाजारों तक जल्दी और सुरक्षित पहुंचाया जा सकेगा. रेलवे अधिकारियों के मुताबिक, इस सीजन में मुंबई तक 640 टन से ज्यादा चेरी भेजने की योजना बनाई गई है.
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