इस साल सितंबर से दिसंबर तक नहीं रुलाएगा प्याज, किसानों को भी अच्छी मिलेगी कीमत

इस साल सितंबर से दिसंबर तक नहीं रुलाएगा प्याज, किसानों को भी अच्छी मिलेगी कीमत

मॉनसून की धीमी चाल और कम बारिश की वजह से गन्ना और केले के बेल्ट में खरीफ प्याज की खेती अधिक हुई है. इससे ऑफ सीजन में प्याज के दाम बढ़ने के आसार कम हो गए हैं. सितंबर से लेकर दिसंबर और जनवरी तक प्याज के दाम बढ़ते हैं. इस बार सप्लाई अधिक रहेगी जिससे रेट कम रहेंगे.

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इस साल सितंबर से दिसंबर तक नहीं रुलाएगा प्याज, किसानों को भी अच्छी मिलेगी कीमतखरीफ प्याज का उत्पादन बढ़ने के आसार

प्याज की खेती करने वाले किसानों और उसे खरीद कर इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ताओं, दोनों के लिए अच्छी खबर है. इस साल सितंबर से दिसंबर की अवधि में प्याज के दाम आसमान पर नहीं चढ़ेंगे. ऐसा हर साल होता है जब इस अवधि में बाजार में प्याज की सप्लाई बहुत कम हो जाती है. जिसका सीधा असर प्याज के दाम पर पड़ता है. मजबूरी में उपभोक्ताओं को 100 रुपये किलो तक प्याज खरीदना पड़ता है. इस बार दाम बढ़ने के आसार नहीं हैं क्योंकि खरीफ प्याज की खेती बड़े पैमाने पर की जा रही है.

जून से लेकर जुलाई के बीच खरीफ प्याज की नर्सरी बोई जाती है. फिर एक महीने बाद उसकी बुवाई होती है. महाराष्ट्र में बहुत बड़े रकबे में खरीफ प्याज की खेती होती है. गन्ना और केले की भी बड़ी मात्रा में खेती होती है, लेकिन इन दोनों फसलों के लिए अधिक पानी की जरूरत है. इस बार मॉनसून की चाल धीमी है और बारिश भी कम है. पानी की कमी के कारण किसानों ने इन दोनों फसलों की बुवाई कम कर दी है और उसकी जगह प्याज का रकबा बढ़ाया है. रकबा बढ़ने से खरीफ प्याज का उत्पादन बढ़ने की प्रबल संभावना है.

तीन सीजन में प्याज की खेती

देश में आमतौर पर दो सीजन-रबी और खरीफ में प्याज की खेती होती है. मगर कुछ राज्य हैं जहां लेट खरीफ में भी प्याज बुवाई होती है. तीनों सीजन में खेती करने वाले राज्य दक्षिण भारत के हैं. उत्तर भारत में रबी और खरीफ, दो सीजन में ही प्याज की बुवाई होती है. बुवाई का आंकड़ा देखें तो प्याज के कुल उत्पादन का 60 फीसद हिस्सा रबी में तो 40 फीसद खरीफ और लेट खरीफ से मिलता है.

महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और राजस्थान खरीफ प्याज उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्य हैं. रबी प्याज की कटाई आमतौर पर अप्रैल-मई में की जाती है, जबकि खरीफ और उत्तर खरीफ प्याज की कटाई क्रमशः अक्टूबर-नवंबर और जनवरी-फरवरी में की जाती है. रबी सीजन के उत्पादन का अधिकांश भाग घरेलू खपत के लिए अक्टूबर तक स्टोर किया जाता है. अक्टूबर से दिसंबर के महीनों के दौरान प्याज की सप्लाई में भारी कमी रहती है. इसलिए, खरीफ प्याज न केवल उपभोक्ताओं की मांग को पूरा करने में बल्कि प्याज के बाजार मूल्य को काबू करने में भी बड़ी भूमिका निभाता है.

बारिश ने बदला बुवाई का पैटर्न

मॉनसूनी बारिश का पैटर्न देखें तो खरीफ प्याज के उत्पादन का अंदाजा लगाया जा सकता है. कृषि क्षेत्र के वरिष्ठ पत्रकार संदीप भुजबल बताते हैं, गन्ना और केले के बेल्ट में इस बार बारिश कम रही है जिसमें महाराष्ट्र का नाम प्रमुख है. गुजरात, कर्नाटक और राजस्थान में भी बारिश देर से हुई है या कम हुई है. इस वजह से किसानों ने उन फसलों से मुंह मोड़ा है जिसमें पानी की अधिक जरूरत होती है. अधिक पानी सोखने वाली फसलों में गन्ना और केला प्रमुख है. किसानों ने इस फसलों की जगह खरीफ प्याज की खेती को प्राथमिकता दी है. इसलिए, जिस सीजन में प्याज की सप्लाई कम होती है और मार्केट में दाम बढ़ते हैं, उस सीजन में इस बार सप्लाई अच्छी बनी रहेगी. लिहाजा, प्याज के दाम बेतहाशा बढ़ने के आसार कम हैं.

सप्लाई दुरुस्त, रेट रहेगा स्थिर

सप्लाई दुरुस्त रहने ही वजह एक और है. रबी प्याज के स्टोरेज को लेकर किसानों में चिंता रहती है. किसानों को लगता है कि सही ढंग से प्याज स्टोर नहीं किया तो उपज खराब हो जाएगी. इस डर में किसान उसे कम दाम पर बेच देते हैं. इस बार किसानों ने ऐसा नहीं किया क्योंकि महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भंडारण की अच्छी व्वस्था हो गई है. किसानों ने कम दाम पर प्याज बेचने की जगह उसे स्टोर कर दिया था जिसे अब निकाला जा रहा है. अभी किसानों को 27-28 रुपये किलो तक रेट मिल रहे हैं. यहां तक कि किसान सरकारी एजेंसियां नेफेड और एनसीसीएफ को उपज नहीं बेच रहे हैं क्योंकि रेट बहुत अच्छे नहीं हैं.

कुल मिलाकर. रबी प्याज के रेट को देखते हुए महाराष्ट्र और राजस्थान के किसानों ने खरीफ प्याज की खेती बढ़ाई है. इससे आने वाले समय में उत्पादन बढ़ने और किसानों को बढ़िया रेट मिलने की संभावना अधिक है. साथ ही, सितंबर से लेकर दिसंबर, जनवरी में प्याज के बढ़े रेट से भी छुटकारा मिलेगा.

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