डीएसआर तकनीक से धान की खेती फायदे का सौदा हैआज के दौर में पानी और मजदूरों की भारी किल्लत को देखते हुए धान की सीधी बुआई (DSR) तकनीक बेहद जरूरी हो गई है. पारंपरिक तरीके से धान लगाने में बहुत मेहनत, समय और पानी खर्च होता है. इस साल अल-नीनो के प्रभाव और कम बारिश की आशंका को देखते हुए डीएसआर तकनीक से खेती करना किसानों के लिए और भी ज्यादा फायदेमंद साबित होगा. यह तकनीक पारंपरिक मशक्कत को कम कर सिंचाई के पानी की भारी बचत करती है. इस तकनीक से बुआई करने के मुख्य रूप से दो तरीके हैं- सूखा-डीएसआरऔर गीला-डीएसआआर. सूखा-डीएसआर में बिना लेव किए सूखे बीजों को ड्रिल मशीन की मदद से सीधे कतारों में बोया जाता है. वहीं, गीला-डीएसआर में पहले से अंकुरित बीजों को लेव किए हुए खेत में ड्रम सीडर मशीन के जरिए कतारों में बोते हैं. यह विधि कम लागत में धान उगाने का सबसे आधुनिक रास्ता है.
डीएसआर तकनीक की कामयाबी के लिए सही समय पर बुआई करना बहुत लाजमी है. मॉनसूनी बारिश का पूरा फायदा उठाने के लिए मॉनसून आने से करीब 10-15 दिन पहले ही इसकी बुआई कर देनी चाहिए. वैज्ञानिकों के मुताबिक, धान की सीधी बुआई का सबसे बेहतरीन वक्त मई के आख़िर से लेकर जून के तीसरे हफ्ते तक का माना जाता है. जहां तक खेत की बात है, डीएसआर तकनीक को अमूमन हर तरह की मिट्टी में आसानी से अपनाया जा सकता है. फिर भी, मध्यम बनावट वाली मिट्टी इस खेती के लिए सबसे ज़्यादा मुनासिब और मुफीद मानी जाती है.
अगर आप पारंपरिक तरीके से खेत तैयार कर रहे हैं, तो मिट्टी अच्छी तरह भुरभुरी होनी चाहिए ताकि बीज का मिट्टी से सही संपर्क बन सके. वहीं, शून्य जुताई वाले खेतों में बुआई से पहले वाले प्रीइमरजेंस खरपतवारनाशी का छिड़काव करके पुरानी घास को पूरी तरह साफ़ कर लेना चाहिए.
खेत से बढ़िया पैदावार हासिल करने के लिए सही किस्म का चुनाव और सही मात्रा में बीज डालना बहुत ज़रूरी है. धान की डीएसआर तकनीक में औसतन 6 से 8 किलोग्राम प्रति एकड़ बीज की ज़रूरत होती है, जिन्हें मिट्टी में 2-3 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए. किस्मों का चुनाव पानी की उपलब्धता और खेत की मिट्टी के हिसाब से किया जाता है. इसके तहत सिंचित स्थिति में हल्की रेतीली दोमट मिट्टी के लिए मध्यम अवधि में पकने वाली किस्में (100 से 135 दिन) चुननी चाहिए, जबकि भारी बनावट वाली मिट्टी के लिए मध्यम से लेकर देर से पकने वाली धान की किस्मों (135 से 165) दिन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए.
डीएएसआर में उर्वरकों की खुराक पारंपरिक रोपाई के समान ही होती है, बस इसमें 5-6 किलो प्रति एकड़ अतिरिक्त नाइट्रोजन की आवश्यकता पड़ती है. हाइब्रिड किस्मों के लिए प्रति एकड़ 24-30 किलो नाइट्रोजन, 12 किलो फॉस्फोरस और 10 किलो जिंक सल्फेट का प्रयोग करें. बुआई के समय फॉस्फोरस, पोटाश और जिंक की पूरी मात्रा के साथ नाइट्रोजन की पहली किश्त ड्रिल मशीन से जड़ों के पास दें. शेष नाइट्रोजन को तीन भागों में बांटकर कल्ले फूटते समय, सक्रिय बढ़वार और बालियां निकलते समय दें. जल प्रबंधन में ध्यान रखें कि बीज जमने तक खेत में पानी न भरें, केवल पर्याप्त नमी बनाए रखें. महत्वपूर्ण विकास चरणों जैसे फूल खिलने और दाने भरने पर जीवनरक्षक सिंचाई देना न भूलें.
धान की डीएसआर तकनीक अपनाना किसानों के लिए आर्थिक और पर्यावरणीय दृष्टि से एक क्रांतिकारी बदलाव है, जो नर्सरी तैयार करने से लेकर रोपाई तक के पारंपरिक श्रम-साध्य झंझटों को पूरी तरह समाप्त कर देती है. यह विधि मानव श्रम और डीजल की खपत में 40 से 60 प्रतिशत तक की भारी कटौती करती है, जिससे प्रति हेक्टेयर लगभग 5,000 से 6,000 रुपये की सीधी आर्थिक बचत होती है.
इसके अतिरिक्त, खेत में पडलिंग न करने से पानी की 60 प्रतिशत तक बचत होती है और मिट्टी की प्राकृतिक संरचना सुरक्षित रहती है, जबकि फसल के 7-10 दिन जल्दी पकने से अगली फसल की बुआई के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह तकनीक मीथेन गैस के उत्सर्जन को कम करके ग्लोबल वार्मिंग जैसी वैश्विक चुनौतियों से लड़ने में भी एक सक्रिय और प्रभावी भूमिका निभाती है.
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