सरसों की खेतीसरसों रबी फसल की एक प्रमुख तिलहन फसल है. इस फसल का भारत की अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण स्थान है. सरसों की खेती किसानों के लिए काफी लोकप्रिय खेती है. इस फसल की खेती कम सिंचाई और कम लागत में आसानी से हो जाती है. वहीं, रबी सीजन आते ही अगेती सरसों की खेती शुरू हो जाती है. अगेती सरसों की किस्म की बुआई के लिए अक्टूबर के शुरुआत से अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े तक की जाती है. ऐसे में आइए जानते हैं भारत की पांच मशहूर सरसों की किस्मों के बारे में जिसकी खेती बेहतर पैदावार देती है और किसान इसकी खेती कर अच्छा मुनाफा भी कमा सकते हैं.
आरएच 725 किस्म: सरसों की ये किस्म 136 से 143 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इसकी फलियां लंबी होती हैं और फलियों में दानों की संख्या 17 से 18 तक होती है. दानों का आकार मोटा होता है. इसके अतिरिक्त इसकी फलियों वाली शाखाएं लंबी होती हैं और उनमें फुटाव भी ज्यादा होती है.
राज विजय सरसों-2: सरसों की ये किस्म मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के इलाकों के लिए उपयुक्त है. फसल 120 से 130 दिनों में तैयार हो जाती है. इस किस्म की अक्टूबर में बुवाई करने पर 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पैदावार मिलती है. इसमें तेल की मात्रा 37 से 40 प्रतिशत तक होती है.
RH-761 किस्म: सरसों के इस किस्म की खासियत कम सिंचाई की जरूरत वाली है. वहीं ये पाले के प्रति सहनशील होती है. इस किस्म में किसानों को 25-27 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन मिलता है. इसमें 45 से 55 दिन में फूल आने लगते हैं. इस फसल को तैयार होने में 136 से 145 दिन का समय लगता है.
पूसा बोल्ड किस्म: ये किस्म राजस्थान, गुजरात, दिल्ली और महाराष्ट्र के इलाकों में ज़्यादा उगाई जाती है. इस किस्म की फसल 130 से 140 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है. इस किस्म की उत्पादन क्षमता 18 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है. इसमें तेल की मात्रा लगभग 42 प्रतिशत तक होती है.
आर एच 30 किस्म: सरसों की ये किस्म हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी राजस्थान क्षेत्रों के लिए सबसे बेहतर होती है. ये किस्म सिंचित और असिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है. ये किस्म 130 से 135 दिनों में पककर तैयार हो जाती है. अगर 15 से 20 अक्टूबर तक इस किस्म की बुवाई कर दी जाए तो उपज 16 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मिल सकती है. इसमें तेल की मात्रा लगभग 39 प्रतिशत तक होती है.
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