जानिए लोबिया की खीती के बारे में इन दिनों पशुपालन मुश्किल दौर से गुजर रहा है. इसकी वजह पशु आहार तथा चारे की कम आपूर्ति और ज्यादा लागत है. हरक और सूखे दोनों तरह के चारे का संकट है. प्राकृतिक चरागाह और मैदान अतिक्रमण की वजह से खत्म से हो गए हैं. ऐसे में अब चारा फसलों की खेती किसानों के लिए बहुत जरूरी हो गई है. लोबिया, ग्वार, बरसीम जैसी फसलें पशुओं के चारे के तौर पर काम आती हैं. अजोला भी एक बड़ा विकल्प बनकर उभर रहा है. लेकिन, आज हम बात करेंगे लोबिया की. जो एक तेज बढ़ने वाली दलहनी चारा है. यह न सिर्फ चारे के रूप में इस्तेमाल होती है बल्कि खरपतवार को नष्ट करके मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ाती है. इस फसल को खरीफ और जायद दोनों सीजन में उगाया जा सकता है.
लोबिया एक सूखा सहन करने वाली फसल है. इसका कई इस्तेमाल होता है. जिसमें चारा, सब्जी और हरी खाद शामिल है. लोबिया का दाना मानव आहार के लिए बहुत पौष्टिक है और पशुधन चारे का सस्ता स्रोत है. इसके दाने में 22-24 फीसदी प्रोटीन, 55-56 फीसदी कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम और आयरन होता है. इसमें लाइसिन और लियूसिन जैसे मानव शरीर के लिए जरूरी अमिनो एसिड भी पाए जाते हैं. दुधारू पशुओं के लिए यह काफी अच्छा माना जाता है. इसलिए चारे के रूप में इसकी खेती करिए.
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार लोबिया सामान्य तौर पर हल्की एवं अच्छे जल निकास वाली मिट्टी में बेहतर उपज देती है. खेत तैयार करने के लिए हैरो या कल्टीवेटर से दो जुताइयां करने से अंकुरण जल्दी और अच्छा होता है. बुआई का समय भी जान लेते हैं. गर्मियों की फसल के लिए बुआई का उपयुक्त समय मार्च होता है. जबकि खरीफ मौसम में लोबिया की बुआई बारिश होने के पश्चात जुलाई में करनी चाहिए.
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लोबिया चारे की फसल की बुआई 25 से 30 सेंटीमीटर की दूरी पर पंक्तियों में हल के पीछे तथा सीडड्रिल से करनी चाहिए. दलहनी फसल होने के कारण यह वातावरण के नाइट्रोजन से अपनी नाइट्रोजन की जरूरत को पूरा कर लेती है. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार 20 किलोग्राम नाइट्रोजन तथा 60 किलोग्राम फॉस्फोरस प्रति हेक्टेयर बुआई के समय देना चाहिए. सल्फर की कमी वाली भूमि में (10 पीपीएम से कम) 20 से 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के प्रयोग से फसल की उपज में सुधार आता है.
गर्मियों की फसल में 8 से 10 दिनों के अंतराल पर कुल 6-7 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है. जबकि खरीफ मौसम में आमतौर पर सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती. लेकिन लंबे अंतराल तक बारिश न होने की सूरत में आप 10 से 12 दिनों के अंतराल पर सिंचाई कर दें तो अच्छा रहेगा.
किसी भी फसल में खरपतवार नियंत्रण बहुत जरूरी है. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार 20 से 25 दिनों की अवस्था पर खुरपी अथवा वीडर कम मल्चर से एक निराई-गुड़ाई कर खरपतवार पर नियंत्रण किया जा सकता है. इमाजेथापर (0.1 किलोग्राम क्रियाशील तत्व) को 500 लीटर पानी में घोलकर बुवाई के 20-25 दिनों बाद छिड़काव करके खरपतवार को नियंत्रित किया जा सकता है.
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