महाराष्ट्र में अंगूर के बागों का रजिस्ट्रेशन 28% घटा, भारत से एक्सपोर्ट और सप्लाई दोनों पर संकट

महाराष्ट्र में अंगूर के बागों का रजिस्ट्रेशन 28% घटा, भारत से एक्सपोर्ट और सप्लाई दोनों पर संकट

महाराष्ट्र में अंगूर के बागों के रजिस्ट्रेशन में 28 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है, जिससे इस साल भारत से अंगूर के एक्सपोर्ट और लोकल सप्लाई दोनों घटने की आशंका है. एक्सपर्ट्स मई-जून की भारी बारिश को इसकी बड़ी वजह बता रहे हैं, जबकि नासिक जैसे प्रमुख अंगूर हब में उत्पादन और एक्सपोर्ट पर सबसे ज्यादा असर पड़ने की संभावना है.

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महाराष्ट्र में अंगूर के बागों का रजिस्ट्रेशन 28% घटा, भारत से एक्सपोर्ट और सप्लाई दोनों पर संकटअंगूर के एक्सपोर्ट में गिरावट

महाराष्ट्र के नासिक जिले में अंगूर के बाग आमतौर पर इस वक्त तक हरियाली और उम्मीद से भरे रहते हैं. लेकिन इस साल तस्वीर बदली हुई है. कई बागों में लताएं तो हैं, मगर उन पर फल कम हैं. जहां गुच्छे बनने चाहिए थे, वहां खाली टहनियां दिख रही हैं. यही वजह है कि इस बार अंगूर एक्सपोर्ट के लिए बागों का रजिस्ट्रेशन बुरी तरह गिर गया है.

एपीडा के नियमों के मुताबिक, जिन किसानों को अंगूर विदेश भेजने होते हैं, उन्हें पहले अपने बाग का रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है. यह प्रक्रिया जिले के कृषि कार्यालयों के जरिए होती है. लेकिन इस सीजन में किसानों का भरोसा ही टूट गया है. आंकड़े बताते हैं कि महाराष्ट्र में अब तक सिर्फ 30,747 किसानों ने 19,400 हेक्टेयर बागों का रजिस्ट्रेशन कराया है, जबकि पिछले साल यही संख्या 42 हजार किसानों और करीब 26,879 हेक्टेयर की थी. यानी रजिस्ट्रेशन में करीब 28 फीसदी की गिरावट.

नासिक सबसे बड़ा एक्सपोर्ट हब

नासिक, जो महाराष्ट्र का सबसे बड़ा अंगूर एक्सपोर्ट हब माना जाता है, वहां हालात और भी खराब हैं. पिछले साल जहां 18,496 हेक्टेयर बाग एक्सपोर्ट के लिए दर्ज थे, इस बार यह आंकड़ा घटकर 12,790 हेक्टेयर रह गया है. नासिक के अलावा अहिल्यानगर, पुणे, सांगली, धाराशिव, सोलापुर और सातारा जैसे जिलों में भी किसानों ने रजिस्ट्रेशन कराने से दूरी बना ली है.

जुन्नर के अंगूर किसान प्रकाश वाघ कहते हैं, “मई की बारिश ने सब बर्बाद कर दिया. एक्सपोर्ट लायक अंगूर ही नहीं बचे. जब क्वालिटी नहीं है, तो रजिस्ट्रेशन कराने का क्या मतलब?” उनके मुताबिक, इसका असर सीधे बाजार पर दिखेगा. “लोकल और विदेशी दोनों मार्केट में अंगूर महंगे होंगे. अभी जो थोड़ा बहुत एक्सपोर्ट हो भी रहा है, उसका रेट अच्छा नहीं मिल रहा क्योंकि फल की क्वालिटी बेहतर नहीं है.”

मई-जून की बारिश ने किया बर्बाद

जुन्नर के ही एक और किसान गुलाबराव नेहरकर बताते हैं कि पिछले साल मई से जून के बीच हुई लगातार बारिश ने पौधों से उनकी ताकत छीन ली. “सूरज की रोशनी नहीं मिली, फोटोसिंथेसिस नहीं हो पाया. फूल कम आए, फल और भी कम बने. जब अंगूर ही नहीं हैं, तो किसान रजिस्ट्रेशन क्यों कराएंगे?” वे कहते हैं.

मौसम की मार अभी थमी नहीं है. गुलाबराव बताते हैं कि रात में तापमान गिरने और कोहरे की वजह से पत्तियों पर ओस जम जाती है, जबकि दिन में तेज गर्मी से अंगूर के दाने फट रहे हैं. “ऐसे फटे हुए फल न तो एक्सपोर्ट में चलते हैं और न ही लोकल बाजार में अच्छे दाम दिला पाते हैं.”

आने वाले महीनों में घटेगी सप्लाई

इस हालात का असर बाजार में दिखने लगा है. किसान कहते हैं कि इस सीजन में एक्सपोर्ट से ज्यादा फायदा लोकल मार्केट में मिल रहा है, जहां कुछ जगहों पर अंगूर 120 से 150 रुपये किलो तक बिक रहे हैं. लेकिन जानकारों की मानें तो यह राहत अस्थायी है. बागों के रजिस्ट्रेशन में भारी गिरावट का मतलब है कि आने वाले महीनों में सप्लाई और घटेगी.

एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि इस साल अंगूर के उत्पादन में 50 फीसदी तक और एक्सपोर्ट में करीब 40 फीसदी की गिरावट आ सकती है. इसका सबसे बड़ा झटका नासिक को लगेगा, जिसकी महाराष्ट्र के कुल अंगूर एक्सपोर्ट में हिस्सेदारी करीब 75 फीसदी तक मानी जाती है. खेतों में पसरा सन्नाटा और किसानों की चिंता साफ इशारा कर रही है कि इस बार अंगूर का सीजन न तो किसानों के लिए आसान होगा और न ही भारत के एक्सपोर्ट आंकड़ों के लिए.

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