
एनिमल एक्सपर्ट की मानें तो गाय-भैंस की बहुत सारी बीमारियों की वजह मक्खी-मच्छर होते हैं. यहां तक की जूनोटिक बीमारियों की वजह भी मक्खी-मच्छर ही होते हैं. गायों की सबसे बड़ी और जानलेवा बीमारी लंपी भी मक्खी-मच्छर की वजह से ही होती है. सालभर में कुछ वक्त ऐसा होता है जब पशुओं के बाड़े में मक्खी-मच्छर का प्रकोप ज्यादा होता है. इन्हें कंट्रोल करने के लिए पशुपालक हर संभव उपाय करते हैं. बाड़े में कुछ दवाईयों का इस्तेमाल भी करते हैं. पशुओं पर भी दवाईयों का स्प्रे किया जाता है. लेकिन कई बार अनजाने में और बिना एक्सपर्ट की सलाह के पशुओं पर ऐसी दवाई का छिड़काव भी कर देते हैं जो बाद में उन्हें नुकसान पहुंचाती हैं.
इसीलिए पशुपालकों को ये सलाह दी जाती है कि मक्खी-मच्छर से निपटने के लिए हमेशा एक्सपर्ट के बताए टिप्स का ही पालन करें. अभी तक परजीवी रोग (पैरासाइटिक डिसीज) का इलाज दवाईयों से हो जाता था. लेकिन अब परजीवी विरोधी प्रतिरोध (एंटीपैरासिटिक रेसिस्टेंस) के चलते पशुओं के डाक्टर भी परेशान हो उठे हैं. लेकिन जब तक इसका कोई नहीं समाधान नहीं आता है तब तक कुछ उपाय अपनाकर इससे बचा जा सकता है.
दवाओं का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल (ओवरयूज). एंटीपैरासिटिक दवाओं का ज्यादा इस्तेमाल और उस पर कंट्रोल ना होना परजीवियों में प्रतिरोधकता बढ़ने की एक बड़ी वजह है. सही तरह से दवाई ना लेना, पशुओं को सही तरीके से दवाई ना देना, डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाई का पूरा कोर्स ना करना भी एक वजह है. पर्यावरणीय और जैविक कारण भी हैं. परजीवियों की प्राकृतिक चयन प्रक्रिया और उनके जीन में होने वाले बदलाव भी प्रतिरोधकता का कारण बन रहे हैं.
डाक्टर के अलावा किसी और की सुझाई गई परजीवी विरोधी दवाई पशुओं को ना खिलाएं.
लगातार एक जैसी दवाई पशुओं को ना खिलाएं.
कभी भी पशुओं को खुद से कोई दवाई ना दें.
पशुओं में सामूहिक कृमिनाशन न करें.
खुद के अनुभव के आधार पर स्टोर से दवाई खरीदकर पशुओं को ना खिलाएं.
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