मुर्गी का घर पूरब से पश्च‍िम द‍िशा की ओर लंबाई में क्यों होना चाह‍िए, वैज्ञान‍िकों ने द‍िए ट‍िप्स 

मुर्गी का घर पूरब से पश्च‍िम द‍िशा की ओर लंबाई में क्यों होना चाह‍िए, वैज्ञान‍िकों ने द‍िए ट‍िप्स 

मुर्गी घर का फर्श कंक्रीट का बना होना चाहिए, जिससे साफ-सफाई, सोडा से धुलाई, विद्युतीकरण (पयूमिगेशन) आसान हो सके. इसके अलावा कंक्रीट के फर्श में चूहे अपना घर नहीं बना पाते. मुर्गी घर का जमीन से कम से कम तीन फीट ऊंचे पर फर्श होना चाहिए. मुर्गी घर के आसपास पेड़-पौधे नहीं होने चाहिए.

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मुर्गी का घर पूरब से पश्च‍िम द‍िशा की ओर लंबाई में क्यों होना चाह‍िए, वैज्ञान‍िकों ने द‍िए ट‍िप्स  जानिए मुर्गी का घर कैसा होना चाहिए

मुर्गी फार्म खोलने में फायदा है तो एक बड़ी चुनौती भी है. यह चुनौती मुर्ग‍ियों में रोग लगने और उनके बीमार होने की है. अगर ऐसा होता है तो बड़ा नुकसान हो जाता है. इसल‍िए इनकी जैव सुरक्षा बहुत महत्वपूर्ण है. इसल‍िए भारतीय कृष‍ि अनुसंधान पर‍िषद (आईसीएआर) ने अच्छे तरीके से मुर्गी पालन के ल‍िए कुछ ट‍िप्स द‍िए हैं. ज‍िसमें बताया गया है क‍ि मुर्गी घर का लम्बवत यानी पूर्व से पश्चिम दिशा में होना चाहिए. इससे सूर्य के प्रकाश से गर्मी कम से कम पड़ेगी. दो मुर्गी घरों के बीच कम से कम 15 मीटर की दूरी होनी चाहिए. इसी तरह दो मुर्गी फार्मों के बीच कम से कम 1 से 2 क‍िलोमीटर की दूरी होनी चाहिए. हैचरी इकाई एवं मुर्गी घर के बीच कम से कम 500 फीट की दूरी होनी चाहिए. 

आईसीएआर के वैज्ञान‍िक विक्रमजीत सिंह, सुनील कुमार यादव, अशोक चौधरी, अक्षय घिंटाला और सुरेश चंद कांटवा ने अपने एक लेख में बताया है क‍ि जैव सुरक्षा, रोग पैदा करने वाले कीटाणुओं को मुर्गी फार्म में प्रवेश को रोकने तथा एक फार्म से दूसरे फार्म में फैलने से बचाने के लिए अपनाये गए उपायों का दूसरा नाम है. इसका उद्देश्य हानिकारक एवं संक्रमित करने वाले कीटाणुओं की संख्या को कम करना और मुर्गियों में संक्रमण को पनपने से रोकना है. पोल्ट्री की दुनिया में जैव सुरक्षा का महत्व बहुत अधिक है. यह पक्षियों को घातक रोग लगने से बचाते हैं. ये उपाय सुनिश्चित करते हैं कि किसान अपनी आय और रोजी-रोटी के स्रोत को न खोएं. 

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 मुर्गियों में रोगों के फैलने के माध्यम

मुर्गियों में अधिकतर रोग एक फार्म से दूसरे फार्म तक संदूषित व्यक्तियों, उपकरणों एवं वाहनों से फैलते हैं. 

हवा के धूल कणों से मुख्य तौर पर श्वासन संबंधित रोग फैलते हैं. 

हैचरी से भी रोग फैलने की आशंका रहती है. जैसे-एस्परजिलोसिस, फंगस का संक्रमण, स्टैफाइलोकोकस जनित बम्बल फीट रोग इत्यादि. 

चूहों, वन्यजीवों, घुमक्कड़ पक्षियों द्वारा भी संक्रामक रोग फैलते हैं. 

बाहृय परजीवी जैसे-मक्खी, मच्छर इत्यादि रोग फैलाने का कार्य करते हैं. 

संदूषित दाना, दाने के बैग, वाहन एवं मुर्गी फार्म का विछावन जैसे-मेडीहस्क, लकड़ी का बुरादा इत्यादि रोग फैलाने के माध्यम हैं. 

संक्रामक रोगों से युक्त हुई मुर्गियां कई रोगों के वाहक का कार्य करती हैं. 

बीमारी से बचाने के ल‍िए क्या करें 

जैव सुरक्षा के उपाय मुर्गी फार्म की संरचना से जुड़े होते हैं. मुर्गी फार्म में जगह का चयन एवं मुर्गी घर निर्माण के लिए निम्न बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए. 

मुर्गी घर का लम्बवत पूर्व से पश्चिम दिशा में होना चाहिए. इससे सूर्य के प्रकाश से गर्मी कम से कम पड़े. 

दो मुर्गी घरों के बीच कम से कम 15 मीटर की दूरी होनी चाहिए. 

दो मुर्गी फार्मों के बीच कम से कम 1 से 2 किमी की दूरी होनी चाहिए. 

हैचरी इकाई एवं मुर्गी घर के बीच कम से कम 500 फीट की दूरी होनी चाहिए. 

जमीन से तीन फुट ऊंचा हो मुर्गी का घर 

मुर्गी घर का फर्श कंक्रीट का बना होना चाहिए, जिससे साफ-सफाई, सोडा से धुलाई, विद्युतीकरण (पयूमिगेशन) आसान हो सके. इसके अलावा कंक्रीट के फर्श में चूहे अपना घर नहीं बना पाते. मुर्गी घर का जमीन से कम से कम तीन फीट ऊंचे पर फर्श होना चाहिए. ज‍िससे क‍ि बाहृय परजीवी एवं बारिश का पानी अंदर न आ सके. मुर्गी घर के आसपास पेड़-पौधे नहीं होने चाहिए.  क्योंकि ये वन्य पक्षी को आश्रय देते हैं एवं मुर्गियों के लिए रोगवाहक का कार्य करते हैं. मुर्गी फार्म के प्रवेश द्वार एवं प्रत्येक मुर्गी घर के प्रवेश द्वार पर फुटबाथ (कीटाणुनाशक घोल) अवश्य होना चाहिए. इससे फार्म में प्रवेश करने वाले के पैरों के संक्रमण से मुर्गियों में संक्रमण न फैले.

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