केंद्रीय मंत्री बोले- दूध के लिए एमएसपी पर कोई प्रस्ताव नहीं (सांकेतिक तस्वीर)केंद्र सरकार ने संसद में एक लिखित बयान में साफ किया है कि फिलहाल उसकी दूध पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) लागू करने की कोई योजना नहीं है. सरकार का कहना है कि दूध की खरीद कीमतें आगे भी बाजार की परिस्थितियों के आधार पर सहकारी डेयरियां और निजी डेयरी कंपनियां ही तय करेंगी. यह जानकारी मंगलवार को लोकसभा में दी गई. लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के लिखित उत्तर में केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने कहा कि सरकार के पास दूध के लिए MSP तय करने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है. उन्होंने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में कीमत निर्धारण बाजार और डेयरी संस्थाओं की खरीद नीति के अनुसार होता है.
मंत्री ने जवाब में कहा कि डेयरी किसानों की आय को मजबूत करने, दूध की कीमतों में संतुलन बनाए रखने, उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने और दूध की क्वालिटी सुनिश्चित करने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं. साथ ही संगठित डेयरी नेटवर्क का विस्तार भी लगातार किया जा रहा है.
ललन सिंह ने बताया कि मार्च 2026 तक देशभर में 36,283 नई ग्राम स्तरीय डेयरी सहकारी समितियां बनाई गई हैं, जबकि 31,150 मौजूदा समितियों को मजबूत किया गया है. इसके अलावा प्रतिदिन 168 लाख लीटर क्षमता का नया दूध चिलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया गया है. दूध की क्वालिटी जांच के लिए 76,748 परीक्षण उपकरण भी बांटे गए हैं. वहीं, 418 लाख लीटर प्रतिदिन क्षमता वाली मिल्क प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी गई है.
सरकार ने बताया कि देश का दूध उत्पादन वर्ष 2014-15 के 146 मिलियन मीट्रिक टन से बढ़कर 2024-25 में 248 मिलियन मीट्रिक टन पहुंच गया है. यानी लगभग 69 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है. सरकार ने इस उपलब्धि का श्रेय नस्ल सुधार, आनुवंशिक उन्नयन, मुफ्त कृत्रिम गर्भाधान, सेक्स-सॉर्टेड सीमेन और इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन जैसी योजनाओं को दिया है.
मंत्री ललन सिंह ने जानकारी दी कि अब तक 17.27 करोड़ कृत्रिम गर्भाधान किए जा चुके हैं. इससे कृत्रिम गर्भाधान का दायरा 20 प्रतिशत से बढ़कर 42 प्रतिशत तक पहुंच गया है. इसी वजह से दूध उत्पादकता में करीब 67 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.
सरकार ने बताया कि देश में उत्पादित कुल दूध का लगभग 63 प्रतिशत बाजार तक पहुंचता है. हालांकि, बाजार में आने वाले दूध का करीब 68 प्रतिशत हिस्सा अभी भी असंगठित क्षेत्र के माध्यम से कारोबार में आता है. सरकार का लक्ष्य गांव स्तर पर डेयरी ढांचे को मजबूत कर अधिक से अधिक दुग्ध उत्पादकों को संगठित खरीद प्रणाली से जोड़ना है.
सरकार ने कहा कि देशभर में दूध की गुणवत्ता पर लगातार नजर रखी जा रही है. भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) राज्य खाद्य सुरक्षा प्राधिकरणों के साथ मिलकर नियमित निगरानी और सैंपलिंग के जरिए दूध की गुणवत्ता की जांच कर रहा है.
डेयरी विशेषज्ञों के अनुसार, अप्रैल से जून के बीच बढ़ते तापमान का सीधा असर दूध उत्पादन पर पड़ता है. गर्मी के कारण गाय-भैंस हीट स्ट्रेस का शिकार हो जाती हैं, जिससे उनका दूध उत्पादन कम हो जाता है. दूसरी ओर, इस मौसम में हरे चारे की उपलब्धता घटने और उसकी कीमत बढ़ने से पशुपालकों की लागत भी बढ़ जाती है.
इसके अलावा दूध के कलेक्शन और ट्रांसपोर्ट पर होने वाला खर्च भी बढ़ता है. दूध को पशुपालकों से कलेक्शन सेंटर, वहां से चिलिंग प्लांट और फिर डेयरी तक पहुंचाने में ईंधन की बड़ी भूमिका होती है. डीजल महंगा होने पर यह लागत भी बढ़ जाती है. उत्पादन में कमी और बढ़ती लागत के कारण डेयरी कंपनियां समय-समय पर दूध की कीमतों में (बढ़ोतरी) बदलाव करती हैं.
यही वजह है कि गर्मियों में दूध के दाम बढ़ने की संभावना अन्य मौसमों की तुलना में अधिक रहती है. हालांकि, अब तक के ट्रेंड के मुताबिक, देश में पहले सहकारी संस्थाएं और फिर इसके बाद प्राइवेट कंपनियां दूध के दाम में बढ़ोतरी करती है, जो ज्यादातर 2 रुपये प्रति लीटर तक की जाती है. किसी-किसी साल कीमतें सीजन में 2 बार भी बढ़ाने की नौबत आ जाती है.
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