Mithun Farmingहाल ही में अरुणाचल प्रदेश के पापुम पारे जिले के अपर जुमी, किमिन में मिथुन मेले का आयोजन किया गया. इसका मकसद मिथुन पालन को बढ़ावा देने के तरीकों का पता लगाने के साथ किसानों को इसके बारे में जानकारी देना था.
पूर्वोत्तर राज्यों में पाए जाते हैं मिथुन
मिथुन (इसे ग्रेट हिमालयन बाइन भी कहा जाता है) एक तरह का जंगली बैल है. इन्हें गयाल के नाम से भी जाना जाता है. ये खास तौर पर देश के पूर्वोत्तर राज्यों में पाए जाते हैं. मिथुन की शारीरिक संरचना बहुत मजबूत होती है और यह जानवर शाकाहारी होता है. इसका आकार काफी बड़ा होता है और इसमें दोनों लिंगों (पुरुष और महिला) में सींग होते हैं. दूसरे मवेशियों की तरह, इनका इस्तेमाल हल चलाने या दूध उत्पादन के लिए नहीं किया जाता है. इन्हें खास तौर पर मांस के लिए पाला जाता है.
मिथुन के जरिए किसानों का मुनाफा कैसे ज्यादा बढ़ाएं
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के एडीजी, डॉ. ए. के. त्यागी बताते हैं, "मेला इसी वजह से हुआ था कि कैसे मिथुन को साइंटिफिकली देखभाल कर सकते हैं और किसानों का मुनाफा कैसे ज्यादा बढ़े और कैसे उनको ज्यादा पैसा मिले. उनको कैसे अच्छी तरह से पालें, व्यावसायिक लाभ के लिए कैसे मिथुन पालन में सुधार किया जा सकता है.
मिथुन को मांस के लिए पाला जाता है
आपको बता दें, पूर्वोत्तर के आदिवासी समुदायों में मिथुनों को बहुत सम्मान दिया जाता है. इन्हें धन और वैभव का प्रतीक माना जाता है. अरुणाचल प्रदेश में मिथुन को मांस के लिए पाला जाता है. मिथुन का मांस उच्च प्रोटीन और स्वाद में अच्छा होता है. अरुणाचल प्रदेश के आदिवासी समुदायों में मिथुन समृद्धि और शक्ति का प्रतीक माना जाता है. कई पारंपरिक उत्सवों और समारोहों मिथुन की पूजा की जाती है. मिथुन की बलि भी कुछ समुदायों में धार्मिक अनुष्ठानों का हिस्सा होती है.
आजिविका चलाने में भी मदद मिलेगी
दोईमुख के विधायक, नबाम विवेक कहते हैं, "हमारी तरफ से मांग रखी गई है कि अरुणाचल में एक मिथुन रिसर्च सेंटर खोलना है. मैं भी सरकार से भारत सरकार से आग्रह करता हूं कि अगर अरुणाचल में इतना ज्यादा मिथुन का पालन पोषण होता है तो इसमें एक रिसर्च सेंटर होना जरूरी है ताकि हमारे किसानों को इसका फायदा मिले. प्रस्तावित मिथुन अनुसंधान केंद्र से लोगों को पशुधन के जरिए अपने इलाके का विकास करने के साथ अपनी आजिविका चलाने में भी मदद मिलेगी.
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