सूखे से चारे का संकटमहाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में सूखे जैसे हालात के कारण किसानों के साथ अब चारा व्यापारियों की मुश्किलें भी बढ़ गई हैं. मवेशियों के लिए चारा जुटाना इतना कठिन हो गया है कि व्यापारियों को एक ट्रक भरने के लिए पांच से छह गांवों तक जाना पड़ रहा है. चारे की कमी के चलते इसकी कीमतों में भी भारी बढ़ोतरी हुई है. व्यापारियों का कहना है कि उन्होंने अपने कई दशकों के कारोबार में ऐसे हालात पहले कभी नहीं देखे हैं.
मराठवाड़ा के छत्रपति संभाजीनगर स्थित जाफर गेट चारा मंडी में चारे की कमी साफ दिखाई दे रही है. इस इलाके में मवेशियों के चारे का प्रमुख स्रोत ज्वार की फसल के डंठल हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘कड़बी’ कहा जाता है. लेकिन इस साल बारिश की कमी के कारण ज्वार और बाजरा जैसी फसलों की पैदावार प्रभावित हुई है. इससे चारे के रूप में इस्तेमाल होने वाले फसल अवशेष भी कम मिल रहे हैं. पहले व्यापारियों को एक ही गांव से इतना चारा मिल जाता था कि ट्रक आसानी से भर जाता था. लेकिन अब उन्हें एक ट्रक भरने के लिए पांच से छह गांवों में जाना पड़ रहा है. इससे चारा जुटाने में समय और मेहनत दोनों बढ़ गए हैं.
जाफर गेट मंडी से जुड़े 70 साल से अधिक उम्र के अनुभवी व्यापारी शेख सलीम का कहना है कि मौजूदा हालात 1972 के भीषण सूखे से भी ज्यादा मुश्किल लग रहे हैं. सलीम के मुताबिक, वह बचपन से इस मंडी से जुड़े हुए हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों से चारा जुटाना अब पहले से कहीं ज्यादा कठिन हो गया है. उन्होंने बताया कि उस समय मवेशियों की संख्या कम थी, जबकि अब चारे की जरूरत ज्यादा है. इसी वजह से व्यापारियों को दूर-दराज के गांवों से चारा लाना पड़ रहा है.
चारे की कमी का असर अब इसकी कीमतों पर भी पड़ रहा है. जाफर गेट बाजार में चारा काटने की यूनिट चलाने वाले समद शेख ने बताया कि वह पिछले 30 साल से इस कारोबार में हैं, लेकिन उन्होंने पहले कभी ऐसी स्थिति नहीं देखी. उन्होंने बताया कि फिलहाल परभणी जिले के मंथा और जिंतूर इलाकों से चारा मंगाया जा रहा है. वहां भी किसानों के पास इतना चारा नहीं है कि वे अपने मवेशियों की जरूरत पूरी करने के बाद बड़ी मात्रा में उसे बेच सकें. किसान जरूरत पड़ने पर ही चारा बेच रहे हैं, ताकि रोजमर्रा के खर्च पूरे कर सकें.
समद के मुताबिक, पिछले साल तक 100 बंडल ज्वार के लिए अधिकतम 2,500 रुपये देने पड़ते थे. लेकिन अब यही कीमत बढ़कर करीब 4,000 रुपये हो गई है. यानी व्यापारियों को 100 बंडल के लिए 1,500 रुपये ज्यादा चुकाने पड़ रहे हैं. इसके बावजूद पर्याप्त चारा मिलने की गारंटी नहीं है. दूसरी ओर, बढ़ती कीमतों के कारण ग्राहकों के लिए भी चारा खरीदना महंगा हो गया है. ऐसे में व्यापारी और पशुपालक, दोनों परेशान हैं.
मराठवाड़ा के आठ जिलों में इस साल मॉनसून की कमी का असर खरीफ फसलों पर पड़ा है. ज्वार और बाजरा जैसी फसलें ठीक से नहीं उग पाने के कारण चारे की कमी हो गई है. महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के 358 तालुकों में से 305 में सूखा घोषित किया है. इस स्थिति ने खेती के साथ पशुपालन पर भी दबाव बढ़ा दिया है, क्योंकि मवेशियों के लिए पर्याप्त चारा जुटाना मुश्किल होता जा रहा है.
चारे की कमी को देखते हुए नांदेड़, लातूर और छत्रपति संभाजीनगर जिलों में प्रशासन किसानों को चारे वाली फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है. जिन क्षेत्रों में सिंचाई और बांधों से पानी उपलब्ध है, वहां किसानों को रबी सीजन में ज्वार और अन्य चारे की फसलें लगाने की सलाह दी जा रही है. वहीं, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दिवाली से पहले किसानों के बैंक खातों में 5,000 रुपये की शुरुआती राहत राशि सीधे जमा करने की घोषणा भी की है. उन्होंने बताया कि अलग-अलग क्षेत्रों में उपलब्ध चारे का स्टॉक करीब 90 दिनों से लेकर सात महीने तक के लिए है. राज्य सरकार ने यह भी कहा है कि वह किसानों से चारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदने के लिए प्रतिबद्ध है.
मराठवाड़ा में चारे की कमी अब केवल व्यापारियों की समस्या नहीं रह गई है. इसकी बढ़ती कीमतों का असर उन पशुपालकों पर भी पड़ रहा है, जिन्हें अपने मवेशियों के लिए रोजाना चारा खरीदना पड़ता है. अगर चारे की उपलब्धता नहीं बढ़ी और कीमतें ऊंची बनी रहीं, तो पशुपालन का खर्च और बढ़ सकता है. ऐसे में चारे की नई फसल तैयार करना, उपलब्ध स्टॉक का सही इस्तेमाल करना और प्रभावित इलाकों तक चारा पहुंचाना जरूरी होगा, ताकि सूखे के बीच किसानों और पशुपालकों को कुछ राहत मिल सके. (PTI)
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