मोरिंगा यानि सहजन का हरा चारा सालभर आसानी से मिलता है. फोटो क्रेडिट-किसान तकबात अब सिर्फ दूध की पौष्टितकता तक ही नहीं रह गई है. बकरे का मीट भी पौष्टि क है या नहीं इसकी भी जांच होती है. बकरे ने क्या-क्या खाया है और उसका क्या असर बकरे के मीट पर पड़ा है इसकी भी जानकारी अब खरीदने वाले करने लगे हैं. यही वजह है कि एक छोटी सी जांच में एक्सपोर्ट हो रहा मीट का पूरा कंटेनर देश में ही रोक दिया जाता है. एनिमल एक्सपर्ट की मानें तो ये सब निर्भर करता है बकरे-बकरी को खिलाए जा रहे हरे चारे पर. हालांकि आज किसी भी पशुपालक से बात करें तो उसकी सबसे बड़ी परेशानी है कि हरा चारा आसानी से और पौष्टिक नहीं मिलता है.
अब तो गर्मियों में ही नहीं सर्दियों के मौसम में भी हरे चारे की किल्लत का सामना करना पड़ता है. बरसात में हरा चारा खूब होता है लेकिन बरसात के दौरान हरे चारे में नमी ज्यादा होती है. बकरियों को भी दाने और सूखे चारे के साथ हरे चारे की जरूरत होती है. लेकिन केन्द्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान (CIRG), मथुरा के साइंटिस्ट की मानें तो प्रकृति ने हमे एक ऐसा हरा चारा भी दिया है जो साल के 12 महीने मिलता है. उसके पत्ते से लेकर तने तक को बकरे-बकरी बड़े ही चाव से खाते हैं.
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फोडर एक्सपर्ट मोहम्मद आरिफ ने किसान तक को बताया कि मोरिंगा में बड़ी मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है. इसके साथ ही दूसरे जरूरी मिनरल्स और विटामिन भी इसके अंदर बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं. और दूसरे हरे चारे के मुकाबले प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स के मामले में यह बहुत ही पौष्टिक है. इसकी एक और सबसे बड़ी खास बात ये कि थोड़ी सी देखभाल के बाद प्राकृतिक तरीके से ये बहुत तेजी से बढ़ता है. इसके उत्पादन के लिए किसी भी तरह के केमिकल की जरूरत भी नहीं होती है. इसलिए इसे प्राकृतिक रूप से ऑर्गेनिक भी कहा जा सकता है.
डॉ. आरिफ ने बकरे-बकरियों को मोरिंगा खिलाने के बारे में बताया कि मोरिंगा के तने को भी बकरी खाती है. क्योंकि इसका तना बहुत ही मुलायम होता है. इसकी पत्तियों को भी बकरे और बकरी बड़े ही चाव से खाते हैं. अगर आप चाहें तो जिस वक्त खूब उत्पादन हो रहा हो तो पहले बकरियों को पत्तियां खिला सकते हैं. इसके तने को अलग रखकर उसके पैलेट्स बना सकते हैं. पैलेट्स बनाने का अपना एक अलग खास तरीका है. ऐसा करके आप गर्मी और बरसात के लिए भी चारे का इंतजाम कर के रख सकते हैं.
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मोहम्मद आरिफ ने बताया कि मोरिंगा लगाने के लिए गर्मी और बरसात का मौसम सही होता है. जैसे जून से मोरिंगा लगाना शुरू कर दिया जाए तो फायदेमंद रहता है. लेकिन ख्याल यह रखना है कि इसे पेड़ नहीं बनने देना है. इसके लिए यह जरूरी है कि 30 से 45 सेंटी मीटर की दूरी पर इसकी बुवाई की जाए. इसकी पहली कटाई 90 दिन यानि तीन महीने के बाद करनी है. तीन महीने के वक्त में यह आठ से नौ फीट की हाईट पर आ जाता है. इस तरह से पहली कटाई 90 दिन में करने के बाद बाकी की कटाई हर 60 दिन बाद करनी है. काटते वक्त यह खास ख्याल रखना है कि इसकी कटाई जमीन से एक से डेढ़ फीट की ऊंचाई से करनी है. इससे होता यह है कि नई शाखाएं आने में आसानी रहती है.
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