कई पेड़ों की हरी पत्तियां बकरियों के लिए दवाई की तरह से हैं. फोटो क्रेडिट-किसान तककिसी भी पशु को खूंटे से बांधकर खिलाने और उसे खुले मैदान में छोड़कर चराने से बहुत फर्क पड़ता है. ग्रोथ से लेकर बीमारियों तक पर इसका असर देखने को मिलता है. यही वजह है कि गोट एक्सपर्ट बकरे-बकरियों को रोजाना तीन से चार घंटे खुले मैदान यानि खेत, बाग और जंगल में चराने की सलाह देते हैं. इस तरह से बकरी पालन करने के कई फायदे हैं. ये बात सही है कि बकरे-बकरियों की कई ऐसी नस्ल हैं जो खूंटे पर बांधकर और घर की छत पर पाली जा सकती हैं. लेकिन ऐसी नस्ल को भी दिन में कम से कम एक बार खुले में घूमने की जरूरत होती है. फिर चाहें उसे घर के एक कमर से दूसरे कमरे और घर के आंगने में ही क्यों न घुमाया जाए.
लेकिन जहां बकरे-बकरियों को घुमाने के लिए जगह हैं वहां उन्हें चरने के लिए जरूर भेजना चाहिए. क्योंकि आज जगह की कमी के चलते लोग नापतौल से बकरियों के लिए बाड़े (शेड) बनाते हैं. बकरी अलग जगह रखी जाएंगी. बकरी के बच्चे और बकरे दूसरी जगहों पर रखे जाएंगे यह सब प्लािन किया जाता है. बेशक हम इस तरह के बाड़ों में बकरे-बकरियों को बांधते नहीं हैं, लेकिन एक हॉल और कमरे की सीमा में रखते हैं. वहीं पर उन्हेंए खाने के लिए दिया जाता है और वहीं पानी पिलाया जाता है.
गोट एक्सपर्ट राशिद का कहना है, जब हम बकरी को फसल कटे किसी खेत में, खुले मैदान में या जंगल के आसपास खुला छोड़ते हैं तो ऐसे में बकरे-बकरी अपनी मर्जी से चरते हैं. जहां भी जो भी उन्हें अपने खाने लायक दिखता है तो उसे भी खाते हैं. ऐसी चीजों में ज्यारदातर वो होती हैं जो उन्हें बाड़े में खाने को नहीं मिलती हैं या फिर जिसकी जरूरत उनके शरीर को होती है. इस तरह चरकर वो अपनी जरूरतों को भी पूरा कर लेती हैं. अगर उन्हें दस्त लगे हों तो भांग का पौधा खा लेती हैं.
राशिद बताते हैं कि खुले मैदान, खेत और जंगल के सहारे चरना बकरे-बकरियों की दिमागी और शारीरिक जरूरत भी है. एक ही जगह पर घंटों बंधे रहने या घूमने के बाद उन्हेंे बदलाव चाहिए होता है. ऐसा होने से बकरे-बकरी बहुत खुश होते हैं और कभी-कभी तो खुले में कुछ खाने के बजाए उछल कूद करते हुए यहां-वहां दौड़ लगाते हैं. ऐसा होने पर बकरी जहां दूध ज्यांदा देने लगती है वहीं बकरे का वजन तेजी से बढ़ता है.
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