Research in Arabian Sea: CMFRI अरब सागर में खंगाल रहा स्क्विड, कटलफिश और ऑक्टोपस की जानकारी 

Research in Arabian Sea: CMFRI अरब सागर में खंगाल रहा स्क्विड, कटलफिश और ऑक्टोपस की जानकारी 

Research in Arabian Sea केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (CMFRI), कोच्चिए मुख्यालय और मंगलुरु क्षेत्रीय केंद्र द्वारा राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT), सूरतकल की मदद से अरब सागर में किया जा रहा सीमाउंट मत्स्य पालन संबंधी अनुसंधान प्रोजेक्ट केंद्र के 'डीप ओशन मिशन' के वर्टिकल-3 के तहत लागू किया गया है.

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Research in Arabian Sea: CMFRI अरब सागर में खंगाल रहा स्क्विड, कटलफिश और ऑक्टोपस की जानकारी प्रतीकात्मक तस्वीर.

ICAR का केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (CMFRI), कोच्चिो इन दिनों अरब सागर की गहराईयों को खंगाल रहा है. सीमाउंट मत्स्य पालन संबंधी अध्यन किया जा रहा है. इसके लिए CMFRI की दो अलग-अलग टीम एक खास मकसद से अरब सागर में अभि‍यान चला रही हैं. अभि‍यान के तहत खासतौर पर स्क्विड, कटलफिश और ऑक्टोपस जिन्हें सेफलोपोड्स भी कहा जाता के बारे में एक-एक जानकारी जुटाई जा रही है. इनकी एक पहचान ये भी है कि इनके हाथ-पैर इनके सिर से जुड़े होते हैं. दिमाग से तेज और अपने शि‍कारियों को चकमा देने के लिए रंग बदलने में माहिर होते हैं. 

प्रोजेक्ट के तहत स्क्विड, कटलफिश और ऑक्टोपस प्रजातियों की तकनीकी पहचान करने के लिए AI-आधारित टूल भी विकसित किया जाएगा. टूल की मदद से गहरे समुद्र की जैव विविधता की वैज्ञानिक समझ काफी मज़बूत होगी. इस खास प्रोजेक्ट के लिए पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा कुल 4.986 करोड़ रुपये का बजट दिया गया है. दो साल के इस प्रोजेक्ट के दौरान पूर्वी अरब सागर के सीमाउंट क्षेत्रों में रहने वाले सेफलोपोड्स की विविधता, पारिस्थितिकी, वितरण और जीव विज्ञान का दस्तावेजीकरण करना है.

सेफलोपोड्स के बारे में मिलेंगी खास जानकारी 

प्रोजेक्ट की प्रिंसिपल रिसर्चर गीता शशि‍कुमार का कहना है कि प्रोजेक्ट से जुड़े निष्कर्षों से गहरे समुद्र के सेफलोपोड्स की पारिस्थितिकी और विविधता के बारे में बहुमूल्य जानकारी मिलने की उम्मीद है, जिससे सीमाउंट से जुड़े मत्स्य संसाधनों के संरक्षण के लिए रणनीतियां बनाने में मदद मिलेगी. दक्षिण-पूर्वी अरब सागर में चुने हुए सीमाउंट को लक्षित करने वाला पहला खोजपूर्ण सर्वे CMFRI के रिसर्चर जहाज पोत F.V. सिल्वर पोम्पानो पर किया गया, जो कोच्चि से संचालित होता है.

इसका नेतृत्व वरिष्ठ वैज्ञानिक दिव्या विश्वंभरन और वैज्ञानिक कविता एम. ने किया. वहीं दूसरी वैज्ञानिक टीम जिसका नेतृत्व प्रधान वैज्ञानिक वी. वेंकटेशन ने किया ने कोल्लम में अजीकल फिशिंग हार्बर से एक मछली पकड़ने वाले जहाज पर लगातार नमूना इकट्ठा करने का अभियान चलाया. इस सर्वे का खास मकसद इस क्षेत्र में सीमाउंट आवासों से जुड़े सेफलोपोड समुदायों का दस्तावेजीकरण करना है. 

बढ़ती समुद्री हीटवेव पर भी रिपोर्ट दे चुका है CMFRI 

CMFRI की रिपोर्ट के मुताबिक कोरल रीफ पर समुद्री हीटवेव का सबसे ज्यादा असर लक्ष्यदीव में देखा गया है. आंकड़ों के मुताबिक यहीं पर सामान्य से ज्यादा तापमान बढ़ा है. डिग्री हीटिंग वीक में रिकॉर्ड हुए आंकड़ों की मानें तो तापमान चार डिग्री सेल्सियस से ऊपर बढ़ गया है. रिपोर्ट में बताया गया है कि ये कोरल रीफ के लिए सबसे खतरनाक हालात मानें जाते हैं. इस बदलाव के चलते ही कोरल रीफ मरने लगते हैं.

CMFRI के सीनियर साइंटिस्ट डॉ. के आर श्रीनाथ ने बताया कि जब तापमान बढ़ने के चलते हालात बदलते हैं तो कोरल रीफ में मौजूद जूजैथिली उन्हें छोड़कर भागने लगते हैं. जबकि यही जूजैथिली कोरल रीफ की खुराक भी होते हैं. आमतौर पर हमारे देश में कोरल रीफ अंडमान निकोबार, कच्छ और मन्नार की खाड़ी के साथ ही लक्ष्यदीव में भी पाए जाते हैं.  

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