
Animal Care सर्दियों का मौसम इंसानों संग जानवरों के लिए भी परेशानी लेकर आता है. अगर कड़ाके की ठंड की बात करें तो दिसम्बर और जनवरी के दो महीने ज्यादा रहती है. हालांकि इंसान तो बदलते मौसम के हिसाब से खुद को ढाल लेता हैं, लेकिन इस मौसम के दौरान जानवरों के लिए खाने और ठंड से बचने के लिए रहने की सबसे ज्यादा परेशानी आती है. सबसे ज्यादा छोटे जानवरों की खास देखभाल बहुत जरूरी हो जाती है. क्योंकि यह ये मौसम पशुओं की ब्रीडिंग का भी होता है.
और ब्रीडिंग के दौरान पशुओं को बीमारियां आसानी से चपेट में ले लेती हैं. अगर बछड़ों की बात करें तो जन्म से तीन महीने की उम्र के बीच करीब 32 से 35 फीसद मौतें होती हैं. इसलिए पशुपालकों को ठंड के हिसाब से पशुओं के बाड़े में सभी जरूरी इंतजाम कर लेने चाहिए. क्योंकि एनिमल एक्सपर्ट के मुताबिक खासतौर पर चार तरह की बीमारियां सबसे ज्यादा पशुओं को परेशान करती हैं.
आमतौर पर ज़्यादा दूध पिलाने, पेट में कीड़े और पेट में अन्य इन्फेक्शन के कारण बछड़ों को दस्त हो जाते हैं. इसलिए जन्म के तुरंत बाद बछड़े को उसके शरीर के वजन का करीब 1/10 हिस्सा कोलोस्ट्रम पिलाना चाहिए. कोलोस्ट्रम न पिलाने से कम उम्र में ही बछड़े की मौत भी हो सकती है. इस परेशानी से निपटने के लिए एंटीबायोटिक और एंटीबैक्टीरियल दवाएं मुंह से या इंजेक्शन से दी जा सकती हैं.
डिहाइड्रेशन होने पर शरीर में इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखने के लिए इलेक्ट्रोलाइट देना चाहिए. समय-समय पर पशुओं के मल की जांच कराना भी ज़रूरी है. अगर कोक्सीडियोसिस की परेशानी होती है और मल में खून आने लगता है तो कोक्सीडियोस्टेट खिलाना चाहिए. ठंड लगने से भी बछड़ों को दस्त हो सकते हैं, इसलिए छोटे बछड़ों को ठंड से बचाना चाहिए.
निमोनिया होने पर छोटे बछड़ों को बुखार हो जाता है. सांस लेने में दिक्कत होने लगती है. इसकी वजह ये भी है कि हवा का आवागमन ठीक से नहीं हो पाता या बहुत ज़्यादा होने लगता है. अगर समय पर इलाज न किया जाए तो पशुओं की मौत भी हो सकती है. पशुओं के बाड़े में खराब वेंटिलेशन निमोनिया की एक खास और बड़ी वजह है.
ठंड के मौसम में बुखार के साथ खूनी दस्त होना पशुओं के लिए जानलेवा हो जाता है. इसे सल्मोनेलोसिस भी कहा जाता है. बुखार के साथ खूनी दस्त इस बीमारी का खास और बड़ा लक्षण है. इस बीमारी के इलाज के लिए एंटीबायोटिक और एंटीबैक्टीरियल दवाओं की ज़रूरत होती है.
एनिमल एक्सपर्ट के मुताबिक खुरपका-मुंहपका बीमारी कम उम्र के जानवरों में कम होती है. लेकिन अगर इन्फेक्शन हो जाता है तो यह मुख्य रूप से दिल को प्रभावित करता है. इस वजह से पशुओं की मौत भी हो जाती है. तेज़ बुखार के साथ मुंह और पैरों में हो जाते हैं. इससे बचाव के लिए पशुओं के बाड़े को 0.1 फीसद पोटेशियम परमैंगनेट सॉल्यूशन से साफ करना चाहिए. घावों पर बोरो-ग्लिसरीन लगाना चाहिए. पैरों को फिनाइल सॉल्यूशन से धोना चाहिए. बीमार जानवरों को स्वस्थ जानवरों से अलग रखें. एक महीने, तीन महीने और छह महीने की उम्र में वैक्सीनेशन करवाना चाहिए. हर छह महीने के अंतर पर इसे दोहराना चाहिए.
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