
कभी मौसम की निश्चित लय पर चलने वाली भारतीय कृषि अब अनिश्चितता के दौर में प्रवेश कर चुकी है. वर्षों तक अनुभव और परंपरा के सहारे फसल बोने वाले किसानों के सामने आज जलवायु परिवर्तन सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है. रिकॉर्ड तोड़ गर्मी, बेमौसम बारिश, बाढ़, सूखा और ओलावृष्टि जैसी समी घटनाएं अब अपवाद नहीं, बल्कि नई सामान्य स्थिति बनती जा रही हैं. 2024 और 2025 में देखे गए ये बदलाव साफ संकेत देते हैं कि अब खेती की सफलता केवल बीज, खाद और तकनीक पर नहीं, बल्कि बदलते मौसम के साथ तालमेल बिठाने की क्षमता पर भी निर्भर हो गई है.
'बिजनेस लाईन' के रिपोर्ट के मुताबिक, धानुका एग्रीटेक लिमिटेड के अध्यक्ष लिखते हैं कि मौसम की मार का सबसे सीधा असर फसलों की पैदावार पर पड़ रहा है. फूल आने और दाना बनने के समय तेज गर्मी से अनाज, सब्जी और फल वाली फसलें कमजोर हो रही हैं. वहीं, बेमौसम बारिश से कहीं बुवाई में देरी, तो कहीं तैयार फसल खराब हो रही है. कटाई के वक्त ज्यादा बारिश होने से किसानों को कटाई के बाद भी भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है. इसके अलावा कीटों और बीमारियों का खतरा भी बढ़ते जा रहा है. बढ़ते तापमान और आर्द्रता में उतार-चढ़ाव कीटों के पनपने के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर रही हैं. इस स्थिति के कारण किसानों को फसल की सुरक्षा रणनीतियों में बीच मौसम में ही बदलाव करना पड़ता है.
खेती का एक अहम हिस्सा मिट्टी की सेहत भी बदलते मौसम से प्रभावित हो रही है. लगातार हर साल आ रहे बाढ़ और कटाव से कई जगह उपजाऊ मिट्टी बह जाती है, जबकि सूखे के कारण जमीन की ताकत कम हो जाती है और उसमें खारापन बढ़ने लगता है, इससे खेती जोखिम भरी होती जा रही है. इसका सीधा असर किसानों की कमाई पर भी पड़ रहा है. फसल खराब होने से दाम तेजी से घटते-बढ़ते रह रहे हैं, सप्लाई में रुकावट आती है और किसानों को बीमा और सरकारी मदद पर ज्यादा निर्भर होना पड़ रहा है. कई किसानों के लिए यह परेशानी अब लगातार बनी हुई है.
उन्होंने लिखा है कि जलवायु परिवर्तन से खेती को नुकसान जरूर हुआ है, लेकिन इसकी कहानी सिर्फ नुकसान तक सीमित नहीं है. इस चुनौती ने खेती में नए प्रयोग और बदलाव को भी तेजी से बढ़ावा दिया है. बढ़ते जोखिमों के कारण किसान अब फसलों में विविधता ला रहे हैं. ज्यादा पानी वाली फसलों की जगह मक्का, बाजरा, दालें और तिलहन जैसी फसलों की ओर तेजी से रुझान बढ़ा है, जो बदलते मौसम के लिए अच्छी हैं. इससे पानी की बचत होती है और पोषण सुरक्षा भी मजबूत होती है.
तकनीक अपनाने से भी खेती को नई दिशा मिली है. मौसम की जानकारी, आधुनिक कृषि उपकरण और ड्रोन से छिड़काव किसानों को सही समय पर सही फैसला लेने में मदद कर रहे हैं. इससे कई बार फसल बच जाती है और बड़ा नुकसान टल जाता है. साथ ही अब किसान जलवायु के असर को कम करने वाले बीज, कीट प्रबंधन और फसल सुरक्षा उपायों को खेती का जरूरी हिस्सा मानने लगे हैं.
जो कुछ हो रहा है, वह सिर्फ एक साल की परेशानी नहीं है, बल्कि खेती में बड़ा बदलाव है. मौसम के बार-बार बदलने से किसान अब बुवाई और कटाई का समय भी बदलने लगे हैं, जिन इलाकों में पहले कुछ खास फसलें उगाई जाती थी, अब वहां यह सोचा जा रहा है कि आगे भी वे फसलें ठीक रहेंगी या नहीं. हालात ऐसे हैं कि किसानों को अब ज्यादा सोच-समझकर फैसले लेने पड़ रहे हैं, इसलिए मोबाइल ऐप, डिजिटल सलाह और सीधे विशेषज्ञों से मिलने वाली सलाह पहले से ज्यादा जरूरी हो गई है.
उन्होंने लिखा है कि समय के साथ सरकार की नीतियां भी बदल रही हैं. फसल बीमा, मौसम की पहले से चेतावनी देने वाली व्यवस्था और जलवायु के अनुसार खेती की योजनाएं अब बहुत अहम हो गई हैं. इससे साफ है कि अब सिर्फ ज्यादा पैदावार ही नहीं, बल्कि जोखिम से बचाव भी उतना ही जरूरी हो गया है. इस बदलाव के दौर में सरकारी और निजी दोनों स्तरों पर रिसर्च और नई तकनीक पर जोर बढ़ा है. अब ऐसे बीज, फसल सुरक्षा के तरीके, सिंचाई प्रणालियां और कृषि तकनीक विकसित की जा रही हैं, जो बदलते मौसम को झेल सकें.
अब खेती में सफलता का मतलब सिर्फ ज्यादा उत्पादन नहीं रह गया है. टिकाऊ खेती बदलते हालात के अनुसार खुद को ढालना और लंबे समय तक खेती को सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी हो गया है. आज वही किसान है सफल जो मौसम के खतरे को पहले समझे, अलग-अलग फसलें अपनाए और जलवायु के अनुकूल खेती करे, जो किसान तकनीक सही सलाह और टिकाऊ साधनों का सही इस्तेमाल कर रहे हैं, वे अपनी फसल और कमाई दोनों को बेहतर तरीके से बचा पा रहे हैं.
आने वाले समय में मौसम की मार और बढ़ सकती है, जिससे भारतीय खेती की चुनौतियां और गहरी होंगी. खेती किसानों की रोजी-रोटी और देश की खाद्य सुरक्षा अब तेजी से मौसम की अनिश्चितता पर निर्भर होती जा रही है. हालांकि, यह बदलाव खेती को ज्यादा मजबूत और आधुनिक बनाने का मौका भी दे रहे हैं.
सबसे बड़ी जरूरत यह है कि यह बदलाव हर किसान तक पहुंचे. इसके लिए मजबूत रिसर्च, समय पर बदलती नीतियां, सस्ती और आसान तकनीक और किसानों को सही वक्त पर मदद मिलना जरूरी है. अगर इसे सही तरीके से संभाला गया, तो मौसम और खेती के बीच की यह लड़ाई एक स्थायी संकट नहीं बनेगी, बल्कि खेती को लंबे समय तक मजबूत बनाने में मदद करेगी. आज खेती सिर्फ फसल उगाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि बदलते हालात में खुद को संभालने और टिके रहने की कला बन चुकी है.