
मॉनसून से पहले किसानों के लिए राहत भरी खबर आई है. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने इस बार बारिश के पूर्वानुमान को और सटीक बनाने के लिए एक नया AI आधारित सिस्टम शुरू किया है. इस सिस्टम के जरिए किसानों को मॉनसून से जुड़ी जानकारी 10 दिन पहले ही ब्लॉक स्तर पर मिल सकेगी.
अब तक किसानों को मॉनसून के आगमन की सामान्य तारीखों के आधार पर ही तैयारी करनी पड़ती थी, जिससे अक्सर भ्रम की स्थिति बनती थी. कई बार ऐसा होता था कि राज्य में मॉनसून पहुंच जाता था, लेकिन कई जिलों, ब्लॉकों या गांवों में बारिश नहीं होती थी. इसका सीधा असर खेती पर पड़ता था और किसानों को नुकसान उठाना पड़ता था.
इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए IMD ने ‘हाइपर लोकल फोरकास्ट सिस्टम’ लॉन्च किया है. यह सिस्टम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर आधारित है और ब्लॉक स्तर पर मौसम की सटीक जानकारी देगा. इससे किसानों को बुवाई, सिंचाई और अन्य खेती से जुड़े फैसले लेने में मदद मिलेगी.
इस नए मॉडल के तहत IMD केरल में मॉनसून की एंट्री को ट्रैक करेगा और उसी आधार पर देशभर में बारिश का पूर्वानुमान जारी करेगा. इसके लिए ग्लोबल फोरकास्ट एजेंसियों के डेटा का भी सहारा लिया जाएगा. फिलहाल इस सिस्टम के जरिए 15 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के 3,196 ब्लॉकों को कवर किया जा रहा है.
IMD के अनुसार, इस सिस्टम के दो ट्रायल सफलतापूर्वक पूरे हो चुके हैं. जिन राज्यों में यह लागू किया गया है, वे ज्यादातर बारिश पर निर्भर हैं और दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के प्रति संवेदनशील माने जाते हैं. भविष्य में इस सिस्टम को पूरे देश में लागू करने की योजना है, हालांकि इसके लिए और ज्यादा डेटा की जरूरत होगी.
इस साल इस सिस्टम की असली परीक्षा भी होगी, क्योंकि मौसम विशेषज्ञ ‘अल नीनो’ (El Nino) के प्रभाव के चलते सामान्य से कम बारिश का अनुमान लगा रहे हैं. आमतौर पर अल नीनो के दौरान भारत में मॉनसून कमजोर रहता है.
इसी बीच, IMD ने उत्तर प्रदेश के लिए एक खास मॉडल भी लॉन्च किया है, जो 1 किलोमीटर के दायरे में मौसम की जानकारी देगा और यह पूर्वानुमान 10 दिन तक मान्य रहेगा. यूपी को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर इसलिए चुना गया है क्योंकि यहां ऑटोमैटिक वेदर स्टेशनों का बड़ा नेटवर्क मौजूद है.
इसके साथ ही ‘विंड्स’ (WINDS - Weather Information Network and Data System) प्रोजेक्ट पर भी काम चल रहा है, जिसका मकसद मौसम से जुड़े जोखिम की सटीक जानकारी देना है. हालांकि अभी कई राज्यों में ऑटोमेटिक वेदर स्टेशनों और रेन गेज की कमी है.
फिलहाल देश में करीब 10,600 ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन और 9,500 ऑटोमेटिक रेन गेज काम कर रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि इस नए सिस्टम से किसानों को मौसम की अनिश्चितता से काफी हद तक राहत मिल सकती है और खेती को बेहतर योजना के साथ किया जा सकेगा.
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