El Nino: क्या है ‘गॉडजिला’ अल नीनो? क्यों बढ़ा मॉनसून और खरीफ फसलों पर खतरा

El Nino: क्या है ‘गॉडजिला’ अल नीनो? क्यों बढ़ा मॉनसून और खरीफ फसलों पर खतरा

‘गॉडजिला’ अल नीनो क्या है और यह भारत के मॉनसून व खेती को कैसे प्रभावित करेगा—जानिए इस एक्सप्लेनर में. कमजोर बारिश, सूखा, बाढ़ और बढ़ती गर्मी के बीच 2026 का मॉनसून क्यों चिंता बढ़ा रहा है.

Warm water glows across the central Pacific in satellite imagery, the ocean signature behind every so-called Godzilla El Nino. (Photo: X/GIF: Nasa)Warm water glows across the central Pacific in satellite imagery, the ocean signature behind every so-called Godzilla El Nino. (Photo: X/GIF: Nasa)
क‍िसान तक
  • New Delhi,
  • Jun 11, 2026,
  • Updated Jun 11, 2026, 2:53 PM IST

इस साल दुनिया भर में मौसम को प्रभावित करने वाला एक बेहद ताकतवर “गॉडजिला अल नीनो” तेजी से विकसित हो रहा है. मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि यह सामान्य से कहीं ज्यादा शक्तिशाली हो सकता है और इसका असर 2026 के अंत तक और 2027 की शुरुआत तक देखने को मिल सकता है. भारत के लिए यह खास तौर पर चिंता का विषय है, क्योंकि इससे मॉनसून कमजोर होने और खेती पर गंभीर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है.

क्या है ‘गॉडजिला’ अल नीनो?

‘गॉडजिला अल नीनो’ कोई आधिकारिक वैज्ञानिक नाम नहीं है, बल्कि बहुत ताकतवर “सुपर अल नीनो” को ही आम तौर पर इस नाम से पुकारा जाता है. ऐसा अल नीनो तब बनता है जब प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा गर्म हो जाता है. इससे दुनियाभर के मौसम का संतुलन बिगड़ जाता है.

1997-98 और 2015-16 में आए ऐसे ही मजबूत अल नीनो को “गॉडजिला” कहा गया था, क्योंकि उसने वैश्विक स्तर पर सूखा, बाढ़ और आर्थिक नुकसान पैदा किया था.

भारत के मॉनसून पर असर

भारतीय मौसम विभाग (IMD) के मुताबिक, 2026 में मॉनसून सामान्य से कमजोर रह सकता है. इसे गॉडजिला अल नीनो का असर ही कहा जाएगा क्योंकि इससे पूरे देश में कम बारिश होने की संभावना 84% तक बताई गई है. यह पिछले 11 सालों में सबसे कमजोर मॉनसून हो सकता है. इसी का प्रभाव है कि केरल में मॉनसून की एंट्री भी इस बार 4 जून को देरी से हुई. हालांकि दक्षिण भारत में कुछ जगह अच्छी बारिश हो रही है, लेकिन मध्य और उत्तर भारत में बारिश की रफ्तार धीमी है.

अजीब मौसम बनेगा बड़ी चुनौती

इस बार समस्या सिर्फ कम बारिश की नहीं है, बल्कि मौसम का अनियमित होना भी बड़ा खतरा है. कहीं कम समय में भारी बारिश और फ्लैश फ्लड तो कहीं लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति और तापमान में तेज बढ़ोतरी और लू जैसी घटनाएं अल नीनो में सामान्य हो जाती हैं. अगर इसका प्रभाव बहुत अधिक हो तो ऐसी घटनाएं व्यापक स्तर पर दिखाई देती हैं. यानी अल नीनो की वजह से एक ही देश में अलग-अलग हिस्सों में बाढ़ और सूखा दोनों साथ देखने को मिल सकते हैं.

खरीफ फसलों पर सीधा असर

जून से सितंबर तक चलने वाला खरीफ सीजन सीधे तौर पर मॉनसून पर निर्भर करता है. भारत की लगभग 50% खेती बारिश पर निर्भर है, इसलिए 10% तक कम बारिश भी बड़ा नुकसान कर सकती है. धान, मक्का, कपास जैसी फसलें प्रभावित होंगी और मिट्टी में नमी कम होने से बीज अंकुरण में दिक्कत होगी.

गर्मी और कीटों का हमला

मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, अल नीनो की वजह से तेज गर्मी और अनियमित बारिश का असर केवल पानी तक सीमित नहीं रहेगा. अल नीनो के चलते तापमान 44°C से ऊपर जा सकता है जिससे मिट्टी जल्दी सूखेगी. इससे फसल की शुरुआत ही कमजोर हो जाती है. एफिड्स, व्हाइटफ्लाई और थ्रिप्स जैसे कीट तेजी से फैल सकते हैं और कपास और सब्जियों की फसल को बड़ा नुकसान हो सकता है.

पानी का संकट और रबी सीजन पर असर

अल नीनो का असर आगे भी दिख सकता है. इसके प्रभाव से बांध और भूजल ठीक से नहीं भर पाएंगे. इससे आने वाले रबी सीजन (गेहूं, सरसों) पर भी खतरा होगा और किसानों के सामने दोहरी मार पड़ेगी. खरीफ और रबी दोनों पर संकट गहरा सकता है.

विशेषज्ञों की चेतावनी

विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह “गॉडजिला” अल नीनो लंबे समय तक सक्रिय रहा तो फूड प्रोडक्शन घट सकता है, महंगाई बढ़ सकती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा. इसलिए, ‘गॉडजिला’ अल नीनो भारत के लिए सिर्फ एक मौसम से जुड़ी घटना नहीं, बल्कि खेती, पानी और अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बनकर उभर रहा है. कमजोर मॉनसून, अनियमित बारिश और बढ़ती गर्मी के बीच अब सरकार और किसानों दोनों के सामने चुनौती है कि वे इस संकट से निपटने के लिए समय रहते तैयारी करें.

MORE NEWS

Read more!