
मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, अगले कुछ हफ्तों के भीतर प्रशांत महासागर में 'अल नीनो' (El Niño) का एक नया और संकट दौर शुरू होने वाला है. अल नीनो समंदर के तापमान में होने वाले असामान्य बदलाव की एक ऐसी स्थिति है, जिसके सक्रिय होते ही दुनिया भर का मौसम पूरी तरह से बिगड़ जाता है. इस बार 'विश्व मौसम विज्ञान संगठन' (WMO) ने चेतावनी दी है कि यह चक्र उम्मीद से कहीं ज्यादा मजबूत और खतरनाक साबित हो सकता है. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) ने पिछले 41 सालों के सैटेलाइट डेटा का विश्लेषण करके एक वैश्विक नक्शा तैयार किया है.इस एनालिसिस से साफ है कि इस बार सूखा पड़ने की सबसे ज्यादा आशंका उन संवेदनशील इलाकों में है, जहां लोग पहले से ही भीषण भुखमरी, गरीबी और जंग से जूझ रहे हैं. सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि आज हमारी धरती ग्लोबल वार्मिंग के कारण पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा गर्म हो चुकी है, जिसके कारण इस बार अल नीनो से होने वाला नुकसान पिछले सभी सालों के रिकॉर्ड को तोड़कर कहीं ज्यादा खतरनाक हो सकता है.
दक्षिण एशिया और विशेष रूप से भारत के संदर्भ में देखा जाए तो अल नीनो का आगमन एक बड़े संकट का संकेत है, क्योंकि यहां इसका सीधा मतलब कमजोर और अनियमित मानसून होता है.भारत जैसे कृषि-प्रधान देश में, जहाँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह से मानसूनी बारिश पर निर्भर है, वहां धान और मक्के की खरीफ फसलें इस मौसमी चक्र की दया पर टिकी हुई हैं.इतिहास गवाह है कि जब साल 2015 में अल नीनो का प्रचंड रूप देखने को मिला था,तब भारत में मक्के और धान की कुल पैदावार में भारी गिरावट दर्ज की गई थी. इस बार का खतरा इसलिए भी दोगुन है क्योंकि बढ़ती गर्मी के कारण मिट्टी की नमी पहले ही तेजी से खत्म हो रही है.अगर मानसून ने समय पर अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराई, तो किसानों के सामने फसल बचानें का संकट पैदा हो जाएगा.
भारत की सीमाओं से परे अगर पूरे एशियाई महाद्वीप पर नजर डालें तो अल नीनो का यह नया दौर एक व्यापक क्षेत्रीय आर्थिक त्रासदी में तब्दील होता दिखाई दे रहा है.पाकिस्तान, म्यांमार, थाईलैंड, वियतनाम, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे घनी आबादी वाले देशों पर सूखे का साया लगातार गहरा हो रहा है.जब 2015 में अल नीनो आया था, तब भारत में मक्के और धान की पैदावार में बड़ी गिरावट आई थी, अकेले दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों को लगभग 150 लाख टन चावल के भारी गिरावट का सामना करना पड़ा था. इस बार भी वही पुराना दौर लौटने की पूरी आशंका है क्योंकि वियतनाम और थाईलैंड जैसे देश वैश्विक स्तर पर चावल के सबसे बड़े निर्यातक हैं. चूंकि एशिया महाद्वीप पूरी दुनिया को सबसे ज्यादा चावल सप्लाई करता है,इसलिए यहां पैदावार कम होने अनाज की वैश्विक किल्लत होने से कीमतें आसमान छूने लगेंगी, जिससे गरीब देश बुरी तरह प्रभावित होंगे.
इस साल किसानों के लिए मुसीबतें सिर्फ आसमान से बरसने वाले सूखे तक ही सीमित नहीं रहने वाली हैं, बल्कि जमीनी हालात भी उनके खिलाफ जाकर बदतर हो चुके हैं. एक तरफ जहां अल नीनो के कारण समय पर बारिश न होने की पूरी आशंका जताई जा रही है, वहीं दूसरी तरफ 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' जैसे अहम समुद्री रास्तों में चल रहे सैन्य तनाव की वजह से जहाजों की आवाजाही पर बेहद बुरा असर पड़ा है. इस समुद्री रास्ते के बाधित होने का सीधा नतीजा यह हुआ है कि डीजल,और खेतों में इस्तेमाल होने वाली रासायनिक खादों की कीमतें बढ़ रही हैं. ऐसे नाजुक वक्त में जब भारत और एशिया के किसान अपनी नई फसलों की बुवाई की तैयारी में जुटे हैं, ठीक उसी समय लागत का बढ़ जाना और ऊपर से सूखे का साया मंडराना, उनकी आर्थिक कमर तोड़ने के लिए काफी है. इस दोहरी मार का सबसे ज्यादा असर उन विकासशील देशों पर पड़ेगा, जहां 80 फीसदी से ज्यादा खेती सिर्फ और सिर्फ मानसून के भरोसे होती है.
अगर हम एशिया से बाहर निकलकर उन सुदूर वैश्विक इलाकों की बात करें जहां अल नीनो के कारण सबसे ज्यादा मानवीय तबाही का खतरा है, तो उसमें अफ्रीका का साहेल क्षेत्र और सेंट्रल अमेरिका का ड्राई कॉरिडोर सबसे संवेदनशील हैं. साहेल के प्रमुख देशों जैसे सेनेगल नाइजीरिया, इथियोपिया और सूडान में पिछले पांच सालों से अनाज की भारी कमी है और वहां चल रही जंग ने लोगों को बेघर कर दिया है. FAO के अनुसार, इन हिस्सों में इस बार सूखा पड़ने की आशंका 50 फीसदी से भी ज्यादा है, वहीं दक्षिणीअफ्रीका का हाल इससे भी बदतर है जहां पिछले अल नीनो के दौरान पड़े सूखे ने 8 करोड़ से ज्यादा लोगों को दाने-दाने के लिए तरसा दिया था. नामीबिया और जिम्बाब्वे जैसे मुल्कों में अगर चारागाह और पानी खत्म हुए, तो मवेशी मर जाएंगे,जो वहां के लोगों की असली दौलत हैं. ठीक इसी तरह सेंट्रल अमेरिका के 'ड्राई कॉरिडोर' में इतिहास गवाह है कि 2015-16 के दौरान 70 फीसदी फसलें बर्बाद हो गई थीं. इस बार भी इन इलाकों में सामान्य से 70 प्रतिशत कम बारिश का अनुमान है, जिससे भुखमरी से बचने के लिए लाखों लोगों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ेगा.
एफएओ के अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि अल नीनो जैसी प्राकृतिक आपदा को पूरी तरह से रोकना तो मुमकिन नहीं है, लेकिन सही वक्त पर सही कदम उठाकर इसके नुकसान को बेहद कम जरूर किया जा सकता है. इस बार वैज्ञानिकों के पास आधुनिक सैटेलाइट एनालिसिस का हथियार है, जो धरती पर एक किलोमीटर के दायरे तक की बेहद सटीक जानकारी दे सकता है. अगर दुनिया भर की सरकारें, खासकर भारत और एशियाई देश, इस जानकारी का सही समय पर इस्तेमाल करके किसानों तक सीधी मदद पहुंचाएं—जैसे कम पानी में उगने वाले उन्नत बीजों का वितरण करना, मवेशियों के लिए चारे का अग्रिम इंतजाम करना और पानी के टैंक बनाना—तो इसतबाही से बचा जा सकता है. एफएओ कहना है पिछले सालों में सेंट्रल और दक्षिणी अफ्रीका में ऐसे तजुर्बे बेहद कामयाब रहे हैं, जहां वक्त से पहले बीज और वित्तीय मदद देने से किसानों की फसलें बच गईं. अब देखना यह है कि दुनिया की सरकारें इस चेतावनी को कितनी संजीदगी से लेती हैं और कितनी तेजी से एक्शन में आती हैं.