लोगों ने ताने मारे। बोले, 'पहले बाजरा उगाकर घर तो चल रहा था अब अनार लगाकर बच्चों को खिलाएगी क्या'. सिंचाई के लिए ड्रिप सिस्टम लगवाया तो लोगों ने मजाक उड़ाया. बोले, 'पूरी जमीन पर सांप से बिछा लिए हैं'. पति नौकरी छोड़ खेती में हाथ बंटाने लगे तो फिर से लोगों ने कोसा. कहा, 'पहले पति 3 हजार तो कमा रहा था अब उसकी भी नौकरी छुड़वा दी'. संतोष खेद्दार अपनी ये कहानी बताते हुए कुछ इसी तरह बात शुरू करती हैं और आखिर में जब वो कहती हैं- 'मगर मैंने हार नहीं मानी, लोगों की बात पर ध्यान नहीं दिया और अपनी खेती में लगी रही तो मुझे लगता है कि मैं घंटों बस यूं ही बैठकर उनसे बात करती रहूं.
संतोष खेद्दार की ये कहानी सिर्फ खेती की एक अलग दुनिया में नहीं ले जाती... बल्कि उस औरत के जज्बे को करीब से महसूस करने का मौका देती है... जहां हार मान लेने की सोच फटक तक नहीं पाती है.
...तो शुरू करते हैं
राजस्थान के सीकर में एक गांव है बेरी। इस गांव में रहती हैं संतोष खेद्दार. संषोष खेद्दार अपनी एक अलग पहचान बना चुकी हैं अपनी खेती के जरिए. उनकी खेती है सेब-अनार और इसके साथ मौसंबी, अमरुद जैसे कई और भी फल. खास बात ये फल नहीं हैं, खास बात है इन फलों का राजस्थान में उगना. संतोष खेद्दार का दावा है कि राजस्थान में सफलतापूर्वक अनार और सेब उगाने वाली वह पहली किसान हैं. ये सफर बहुत मुश्किलों से शुरू हुआ लेकिन आज वह इसी की बदौलत हर साल 30-40 लाख रुपये कमा रही हैं.
बताती हैं, 'हमने 2008 में पहली बार अनार लगाए. मैंने अपने साथ के लोगों से भी कहा कि आप भी लगा लो, लेकिन किसी ने नहीं माना. सबने कहा- आप लगाओ पहले .. देखते हैं कि आपकी जमीन में अनार लगेंगे या नहीं. मैंने कहा ठीक है, तो उनकी सुन ली लेकिन मैं पीछे नहीं हटी, क्योंकि अगर पीछे हट जाती तो आज मैं इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाती. उस समय मेरे पति होमगार्ड की नौकरी कर रहे थे। बच्चे स्कूल चले जाते तो घर में ज्यादा कुछ काम नहीं बचता। तभी खाली बैठे-बैठे कुछ अलग करने की सोची और लगा कि बाजरा, गेहूं नहीं बागवानी करनी है, जहां मेरे पति होमगार्ड का काम करते थे, वहां उनके साहब ने अनार लगवाए थे. लेकिन उनमें फल नहीं आए, मुझे पता चला तो मैंने सोचा मैं करके देखती हूं.' बस यहीं से शुरू हुआ संतोष खेद्दार का सफर। संतोष खेद्दार की ये चाहत उन्हें सीकर के उद्यान विभाग तक ले गई और वहां से वो अनार के पौधे ले आईं. तब अपने 5 बीघा में 220 अनार के पेड़ लगाए.
कहती हैं, '2011 में पेड़ों पर अनार आए तो हर तरफ चर्चा शुरू हो गई. सब देखने आने लगे हैरान हो गए कि इतनी लदखद अनार जैसे कश्मीर में घूम रहे हैं. हमारी भी खुशी का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि हमने भी कभी अनार देखी नहीं थी। सभी अधिकारी आकर के अचुंभा करने लगे भाई वाह वास्तव में आपने तो राजस्थान में अनार उगा के दिखाई हैं. 2013 में मुझे ₹25,000 का अवॉर्ड भी दिया गया था.'
संतोष खेद्दार बताती हैं कि वह बचपन से खेती से जुड़ी थी। पहले दादा जी के साथ खेती में हाथ बंटाती थी. फिर मां के साथ, उन्हीं से सीखा कि कैसे खाद बनाते हैं. कैसे फसल को रोग से बचाते हैं. वही जो कुछ याद था अनार की खेती में भी वही आजमाया. केमिकल खरीदने के पैसे नहीं थे इसलिए जैविक खेती पर ही ध्यान दिया. गड्ढे में खाद तैयार करके वही पेड़ों में इस्तेमाल की, खुद ही स्प्रे भी कैयार किए. बताती हैं,'बचपन से सुना था कि धतूरा के इस्तेमाल से पेड़ों में कीड़े नहीं लगते. खेती में करते-करते सीख जाता है किसान... तो वही मैंने किया. फिर मैंने जो अनार छाया में थी उनकी कटिंग की. जिनकी मैंने कटिंग की उनकी जो अनार की साइज थी वो तो 500-600 ग्राम तक हो गई। जिनकी कटिंग नहीं की उनकी 300-200 ग्राम रह गई. फिर ये सीखा कि कटिंग करने से उसकी जो खुराक थी वो उन्हें मिल गई, तो फिर मैंने हर एक पेड़ पर ही वो कटिंग वाला काम किया. इससे हमारे फलों की एक साइज बन गई। फिर हमारा अनार एकदम अलग हो गया बाकी से.' अब अपने मदर प्लांट से नर्सरी तैयार करके बाकी किसानों को भी अनार के ये पौधे बेच रही हैं संतोष खेद्दार. बताती हैं,' अनार जुलाई-अगस्त में बरसात के टाइम पर लगाते हैं. एक फरवरी के महीने में लगा सकते हैं। तो उस समय लगाने के बाद हमें फल तो जल्दी आ जाएंगे लेकिन दो साल उनकी जो फ्रूटिंग है वो हमें तोड़ के डालनी पड़ेगी ताकि पेड़ हमारा ग्रोथ कर सके. उसके बाद तीसरे साल फसल ले सकते हैं. एक पेड़ पर 25-25 किलो तक अनार आ जाते हैं.
2008 में अनार लगाने के बाद जब 2011 में संतोष खेद्दार ने जगह-जगह ले जाकर अपने अनार दिखाए और बेचे तो पहली बार में ही उन्हें 3 लाख रुपये की आमदनी हो गई. फिर पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा. बताती हैं, 'सबसे पहले हम बाजार लेकर गए अपने अनार. अनार मंडी में सब हैरान हो गए. अधिकारियों ने देखा और हैरान हुए तो हमने कहा आप टेस्ट करके देख लो. अधिकारियों के पास व्यापारी भी आते थे। उन्हें भी टेस्ट कराया. बाजार के अनार से कंपेयर भी करवाया. हमारे अनार का जो टेस्ट था वो उससे अलग ही था. मिठास भी अलग थी और उसका जो दाना था बहुत सॉफ्ट था. बाजार में जो मिल रहे थे उनके अंदर लकड़ी की तरह काट थी. सबने खाया तो उन्हें अच्छा लगा. पहले साल ही दिक्कत हुई हमें दूसरे साल अनार हमारे खेत से ही उठ गई और 3 लाख की आमदनी भी हो गई. हमें अब भी मार्केट जाना ही नहीं पड़ता. बाग से ही उठ जाते हैं अनार। इसके बाद मैंने अपने पति से कहा कि आप होमगार्ड की नौकरी छोड़ दो. बस फिर हम दोनों मिलकर पूरा ध्यान अपनी बागवानी में देने लगे, इसी के बाद सेब भी लगाया.
2016 में संतोष खेद्दार ने सेब लगाना शुरू किया. बताती हैं, 'सेब का पेड़ मुझे सुंदाराम जी वर्मा से मिला. वह भी सीकर के ही है. किसानों को आगे बढ़ाने में बहुत मदद करते हैं. उनके पास पेड़ आए थे तो उन्होंने हमें भी दिया एक पेड़. उस पेड़ को भी उसी तरह लगाया और उसमें भी दो साल बाद फल आ गए. फल आने के बाद हमने उसी से पौध तैयार की. फिर सबने अचंभा किया. अरे भाई राजस्थान में सेब हो सकता है क्या? कैसे हो सकता है?' सुंदारामजी वर्मा ने सेब का जो पौधा संतोष खेद्दार को दिया वो किस्म ही राजस्थान के लिए तैयार हुई थी. ये ऐसी किस्म है जो 50 डिग्री तापमान में भी हो सकती है. इसका नाम है हरिमन 50. इस किस्म को एप्पल मैन के नाम से मशहूर पद्मश्री किसान हरिमन शर्मा ने तैयार किया है, इसे गर्म जलवायु में उगाया जा सकता है. बस यहीं से संतोष खेद्दार ने अनार के साथ सेब उगाना भी शुरू कर दिया. बताती हैं, 'सेब को जिस तरह की ठंडक और पानी चाहिए उसके लिए हमने ड्रिप सिस्टम लगवाया. धीरे-धीरे पेड़ों को पानी दिया, फिर फल आए तो उनकी भी पौध तैयार करके बेचना शुरू कर दिया.
संतोष खेद्दार बताती हैं कि बागवानी के बाद जब रिजल्ट अच्छे आए तो उन्होंने मदर प्लांट्स से पौधे भी तैयार करने शुरू किए. मकसद था कि बाकी किसानों तक भी ये काम पहुंचे और वो भी फायदा कमा सकें. कहती हैं, 'हमारी नर्सरी NHB (national horticulture board) द्वारा रजिस्टर्ड है. इसके जरिए ऑल इंडिया का कोई भी किसान हमारे यहां से पौधा लेकर जाता है तो उसे सब्सिडी मिलती है. हमारे अनार की खास बात ये भी है कि इसे एक महीने तक तोड़ के भी रख लेते हैं तो यह खराब नहीं होता है.
संतोष खेद्दार के तीन बच्चे हैं। दो बेटी और एक बेटा, तीनों को उन्होंने एग्रीकल्चर की पढ़ाई करवाई है. बेटे से कह दिया कि नौकरी की जरूरत नहीं है. मैं खेती से 30 लाख कमा रही हूं तो तुम 40 लाख कमाओ. वहीं, एक बेटी एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट ही सुपरवाइजर है तो दूसरी भी संतोष खेद्दार की तरह ही खेती कर रही है. बताती हैं, 'मैंने बेटी की शादी के दहेज में भी 501 पौधे दिए थे ताकि वो इस काम को आगे बढ़ा सके'
संतोष खेद्दार की अब तक की कहानी पढ़कर आपको लग रहा होगा कि सब कुछ कितना आसान रहा, लेकिन ऐसा है नहीं. बताती हैं, ' ऐसा नहीं है कि मुश्किलें नहीं आईं, लेकिन मैंने हार नहीं मानी, केवीके से संपर्क किया. अधिकारियों से मिलते रहे, बात करते रहे. पढ़ते रहे, सीखते रहे, कभी पौधों में हींग डाली, कभी गाय के गोमूत्र में नीम आग धुरा बना के डाला, फिर हल्दी डाली. कभी नमक हल्दी मिर्ची सारी डाल डाल के हमने वो पेस्ट तैयार किया ताकि जो पेड़ पर रोग लगा है तो चला जाए. काफी दिन में हम सक्सेसफुल हुए. उसके बाद वो रोग नहीं आया. जैविक तरीके से ही कई तरह के कीटनाशक हमने तैयार किए. बात ये है कि जो रोग आता है वो हमेशा गंदगी से आता है. ज्यादा घास फूस होता है, जो कच्ची फुटान होती है उस पर आता है. हम हर महीने उनकी कटिंग कर देते हैं ताकि उन पर रोग नहीं आ सके. अब मेरे पास नवंबर के आखिर तक अनार पूरी तरह तैयार हो जाएगा. सितंहर के अंत तक मौसंबी पूरी तैयार हो जाएगी. जून के अंत तक सेब पूरा तैयार मिलेगा, तो हर कुछ महीनों में आमदनी का जरिया तैयार है. बाकी समय पौध भी बिकती रहती है. किसानों को इसी तरह प्लानिंग करनी चाहिए ताकि वो एक चीज पर ही डिपेंड ना रहें बस.
संतोष खेद्दार की कहानी जो सीख दे रही है वो ये है कि खेती घाटे का सौदा नहीं है अगर आप उसमें सही तकनीक और सोच भी शामिल कर लेते हैं. बेटी की शादी से लेकर रिटायरमेंट तक की हर प्लानिंग में खेती से पैदा निकाला जा सकता है. किसान सिर्फ जमीन नहीं बल्कि पूरे समाज की सोच भी बदल सकता है. इस कहानी को पढ़ने के बाद अगर आपके मन में कोई सवाल हो तो नीचे दिए गए वीडियो लिंक पर कमेंट करके पूछ सकते हैं. शायद आपकी भी जिंदगी और कहानी बदलने में कुछ मदद मिले.