
मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के ग्राम जैतपुरकला के प्रगतिशील किसान रंजीत बघेल ने पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर औषधीय फसलों की खेती अपनाई और आज लाखों रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं. उनकी सफलता क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए प्रेरणा बन रही है.
रंजीत बघेल के पास कुल 10 एकड़ कृषि भूमि है. पहले वे गेहूं और मक्का जैसी पारंपरिक फसलों की खेती करते थे.इन फसलों में प्रति एकड़ 20 से 25 हजार रुपये तक की लागत आती थी, जबकि शुद्ध लाभ केवल 15 से 18 हजार रुपये प्रति एकड़ ही मिल पाता था. बढ़ती लागत और सीमित आय के कारण उन्होंने खेती में बदलाव करने का निर्णय लिया.
अपनी कृषि आय बढ़ाने के उद्देश्य से रंजीत बघेल ने उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों से संपर्क किया. विभागीय विशेषज्ञों ने उन्हें औषधीय फसल चियासीड (Chia Seed) की खेती करने की सलाह दी. अधिकारियों के तकनीकी मार्गदर्शन और आधुनिक खेती की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने अपनी 5 एकड़ भूमि में चियासीड की खेती शुरू की.
नवंबर माह में बुवाई कर उन्होंने वैज्ञानिक पद्धति से फसल तैयार की. उनका कहना है कि चियासीड की खेती अन्य फसलों की तुलना में काफी आसान है.इसमें रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का कम उपयोग करना पड़ता है तथा केवल 4 से 5 सिंचाई में ही फसल तैयार हो जाती है.
रंजीत बघेल बताते हैं कि चियासीड की खेती में प्रति एकड़ लगभग 15 से 20 हजार रुपये का खर्च आया. अप्रैल माह में फसल की कटाई के बाद उन्हें प्रति एकड़ करीब 7 क्विंटल बीज का उत्पादन प्राप्त हुआ.
जब उन्होंने स्थानीय बाजार में अपनी उपज बेची तो उन्हें प्रति एकड़ लगभग 1.20 लाख रुपये का शुद्ध लाभ मिला. यह लाभ गेहूं और मक्का जैसी पारंपरिक फसलों की तुलना में कई गुना अधिक है। यही वजह है कि अब वे इस खेती को बड़े स्तर पर करने की योजना बना रहे हैं.
उद्यानिकी विभाग के अनुसार चियासीड आज दुनिया भर में एक लोकप्रिय सुपर फूड के रूप में जाना जाता है. इसमें ओमेगा-3 फैटी एसिड, प्रोटीन, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सेवन पाचन तंत्र को बेहतर बनाने, हृदय को स्वस्थ रखने, वजन नियंत्रित करने तथा ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल को संतुलित रखने में सहायक होता है.स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण बाजार में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे किसानों को अच्छे दाम मिल रहे हैं.
चियासीड की खेती से मिली शानदार सफलता से उत्साहित रंजीत बघेल अब अगले सीजन में अपनी खेती का दायरा बढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं.वे अपनी भूमि के अलावा अन्य किसानों से लीज पर जमीन लेकर करीब 15 एकड़ क्षेत्र में चियासीड की खेती करने की योजना बना रहे हैं.
इसके साथ ही वे खेतों की मेढ़ों पर औषधीय फसल सफेद कौंच लगाने की भी तैयारी कर रहे हैं.उनकी सफलता से प्रेरित होकर आसपास के कई किसान भी औषधीय और नकदी फसलों की खेती में रुचि दिखा रहे हैं.
रंजीत बघेल की यह सफलता साबित करती है कि यदि किसान आधुनिक तकनीकों, वैज्ञानिक सलाह और सरकारी विभागों के मार्गदर्शन को अपनाएं तो कम लागत में अधिक उत्पादन और बेहतर मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं. चियासीड जैसी औषधीय फसलें किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ कृषि को लाभकारी व्यवसाय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं.