तराई के किसानों की नई उड़ान: काला नमक चावल, मखाना और मधुमक्खी पालन से बढ़ी कमाई

तराई के किसानों की नई उड़ान: काला नमक चावल, मखाना और मधुमक्खी पालन से बढ़ी कमाई

उत्तर प्रदेश सरकार और इंडिया टुडे के संयुक्त प्रयास से आयोजित ‘किसान तक का किसान कारवां’ प्रदेश के सभी 75 जिलों तक पहुंचा. अब शुरू हो रही है खास सीरीज ‘कहानी कारवां की’, जिसमें उत्तर प्रदेश के 9 एग्रोक्लाइमेटिक जोन्स की खेती, किसानों की सफलता, वैज्ञानिकों की सलाह और सरकारी योजनाओं के असर की कहानी दिखाई जाएगी. आज की कड़ी में जानिए North Eastern Plain Zone के किसानों की बदलती तस्वीर, जहां मछली पालन, मखाना, मधुमक्खी पालन और काला नमक धान किसानों की आय बढ़ाने का जरिया बन रहे हैं.

धर्मेंद्र सिंह
  • Noida ,
  • May 15, 2026,
  • Updated May 15, 2026, 10:25 AM IST

उत्तर प्रदेश सरकार और India Today Group के साझा प्रयास से आयोजित किसान कारवां ने प्रदेश के सभी 75 जनपदों में पहुंचकर किसानों की समस्या से समाधान तक पहुंचा. यह कारवां केवल एक जागरूकता अभियान नहीं रहा, बल्कि किसानों तक हर जानकारी पहुंचाने वाला प्रभावी मंच बन गया. इस यात्रा के माध्यम से किसानों को आधुनिक खेती, पशुपालन, बागवानी, मछली पालन, मधुमक्खी पालन और सरकारी योजनाओं की विस्तृत जानकारी मिली. वहीं कृषि विभाग, पशुपालन विभाग और कृषि विज्ञान केंद्रों के वैज्ञानिकों को भी सीधे किसानों से जुड़ने का अवसर मिला.

पूर्वांचल से निकलकर किसान कारवां अब नॉर्थ ईस्टर्न प्लेन जोन यानी गोरखपुर के तराई क्षेत्र तक पहुंच चुका है. इस जोन में गोंडा, बस्ती, संत कबीर नगर, महाराजगंज, गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर और सिद्धार्थनगर समेत 10 जिले शामिल हैं. इन जिलों की पहचान खेती, बागवानी और पशुपालन के क्षेत्र में अलग रही है. किसान कारवां के जरिए इस पूरे क्षेत्र में 10 हजार से ज्यादा किसानों तक सीधा संवाद स्थापित किया गया.

मछली पालन बना किसानों की नई ताकत

गोरखपुर और आसपास के जिलों में अब किसान तेजी से मछली पालन को व्यवसाय के रूप में अपना रहे हैं.गोंडा कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. ज्ञानदीप गुप्ता ने बताया कि मछली पालन किसानों की आय बढ़ाने का मजबूत माध्यम बन रहा है.सरकार की ओर से मछली पालन योजनाओं पर 40 से 60 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जा रही है.इसके अलावा मछली चारा निर्माण इकाई स्थापित करके भी किसान अतिरिक्त लाभ कमा सकते हैं.

मछली पालन कर रहे किसानों ने बताया कि इस क्षेत्र में सरकार का बेहतर सहयोग मिल रहा है. सबसे बड़ी बात यह है कि मछली बेचने के लिए किसानों को बाजार तक नहीं जाना पड़ता, बल्कि व्यापारी सीधे तालाब पर पहुंचकर खरीदारी कर लेते हैं। ऐसे में किसानों को बेहतर मूल्य और आसान बाजार दोनों मिल रहे हैं.

खरपतवार नियंत्रण और मिट्टी की सेहत पर विशेष जोर

किसान कारवां के दौरान किसानों ने फसलों में बढ़ते खरपतवार को लेकर कई सवाल उठाए. इस दौरान कृषि विशेषज्ञों और निजी कंपनियों ने किसानों की शंकाओं का समाधान किया. धानुका के उत्पाद “संप्रा” को मोथा जैसे खरपतवार को नियंत्रित करने में प्रभावी बताया गया. वहीं मिट्टी की उत्पादकता बढ़ाने के लिए चंबल फर्टिलाइजर्स के विभिन्न उत्पादों की जानकारी भी किसानों को दी गई.

केवीके से जुड़कर बढ़ रही किसानों की आमदनी

प्रदेश के हर जिले में स्थापित कृषि विज्ञान केंद्र किसानों के लिए नई तकनीक और बेहतर खेती का आधार बन रहे हैं.गोंडा के कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. राम लखन सिंह ने बताया कि जो किसान कृषि विभाग और केवीके से जुड़ रहे हैं, उनकी आय में लगातार वृद्धि हो रही है.किसानों को समय पर उन्नत बीज, नई तकनीक और योजनाओं की जानकारी मिल रही है.

उन्होंने किसानों को सलाह दी कि गेहूं की कटाई के बाद मिट्टी की जांच अवश्य करानी चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि खेत में किन पोषक तत्वों की कमी है.इससे संतुलित उर्वरक प्रबंधन में मदद मिलती है और लागत भी कम होती है.

पशुपालन से बदल रही ग्रामीण अर्थव्यवस्था

उत्तर प्रदेश दुग्ध उत्पादन के मामले में देश में अग्रणी राज्य है. अब पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ बनता जा रहा है.गोरखपुर और तराई क्षेत्र में युवाओं का रुझान तेजी से पशुपालन की ओर बढ़ा है. किसान नंद बाबा, नंदिनी और मिनी नंदिनी जैसी योजनाओं का लाभ लेकर अच्छे नस्ल के पशुओं का पालन कर रहे हैं.

बलरामपुर के मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. राजेश कुमार ने बताया कि हर दिन बड़ी संख्या में किसान योजनाओं की जानकारी लेने पहुंच रहे हैं. उन्होंने किसानों से “भारत पशुधन” ऐप से जुड़ने की भी अपील की, ताकि पशुपालन से जुड़ी सुविधाओं का लाभ आसानी से मिल सके.

तराई क्षेत्र में मखाना खेती की अपार संभावना

सिद्धार्थनगर और बलरामपुर जैसे तराई वाले जिलों में मखाना खेती की संभावनाएं तेजी से बढ़ रही हैं. सरकार किसानों को प्रशिक्षण देने के साथ-साथ अनुदान पर बीज भी उपलब्ध करा रही है. कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से किसानों को मखाना उत्पादन की तकनीकी जानकारी दी जा रही है.

बलरामपुर कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. जयप्रकाश ने बताया कि जिले में मखाना खेती का भविष्य बेहद उज्ज्वल है. किसानों को इसके आर्थिक फायदे समझाए जा रहे हैं, जिसके बाद अब बड़ी संख्या में किसान इस खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं. बाजार में मखाना की मांग और कीमत दोनों बेहतर हैं.

लेजर लैंड लेवलर से घट रहा सिंचाई खर्च

विशेषज्ञों ने किसानों को बताया कि खेत जितना समतल होगा, उतनी ही कम सिंचाई की जरूरत पड़ेगी ऐसे में लेजर लैंड लेवलर तकनीक किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो रही है. कृषि अधिकारी डॉ. शैलेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि विभाग की ओर से 50 प्रतिशत अनुदान पर उन्नत बीज उपलब्ध कराए जा रहे हैं.

उन्होंने कहा कि यदि किसान वैज्ञानिक तरीके से खेती करें तो एक रुपये की लागत पर चार रुपये तक का लाभ कमाया जा सकता है.

अमरूद की बागवानी से लंबे समय तक कमाई

तराई क्षेत्र में बागवानी की फसलें किसानों के लिए कमाई का बड़ा जरिया बन रही हैं. सिद्धार्थनगर में अमरूद की खेती की अच्छी संभावनाएं देखी जा रही हैं. कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. प्रवीण कुमार मिश्रा ने बताया कि अमरूद स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी फल माना जाता है और बाजार में इसके अच्छे दाम मिल रहे हैं.

उन्होंने किसानों को सलाह दी कि एक बार बाग लगाने के बाद 15 से 20 वर्षों तक लगातार आय प्राप्त की जा सकती है.

पशु एंबुलेंस 1962 से मिल रही त्वरित सहायता

प्रदेश सरकार की पशु एंबुलेंस सेवा 1962 पशुपालकों के लिए राहत का बड़ा माध्यम बन रही है. ग्रामीण क्षेत्रों में किसान केवल एक फोन कॉल पर 15 से 20 मिनट के भीतर पशु चिकित्सा सुविधा प्राप्त कर रहे हैं. किसान कारवां के मंच से किसानों को इस सेवा की जानकारी दी गई और एंबुलेंस का लाइव डेमो भी दिखाया गया.

मधुमक्खी पालन से महिलाओं को मिल रहा रोजगार

गोरखपुर और आसपास के जिलों में मधुमक्खी पालन तेजी से लोकप्रिय हो रहा है. महिलाएं भी अब इस क्षेत्र में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं.प्रगतिशील किसान राजू सिंह ने बताया कि वह किसानों के साथ मिलकर हर साल 300 कुंतल से अधिक शहद का उत्पादन करते हैं और उनका कारोबार करोड़ों रुपये तक पहुंच चुका है.

उन्होंने कहा कि मधुमक्खी पालन बेहद आसान और कम लागत वाला व्यवसाय है, जिसे किसान अतिरिक्त आय के साधन के रूप में अपना सकते हैं.

काला नमक धान से बढ़ रही क्षेत्र की पहचान

सिद्धार्थनगर और बस्ती जैसे जिलों में काला नमक धान किसानों की पहचान बन चुका है.अपनी खुशबू और गुणवत्ता के कारण यह धान विश्व स्तर पर प्रसिद्ध है और इसे जीआई टैग भी मिल चुका है.

पूसा काला नमक-1 किस्म से किसानों को प्रति एकड़ लगभग 18 क्विंटल तक उत्पादन मिल रहा है. कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक किसानों को आश्वस्त कर रहे हैं कि उनकी उपज को बेचने में किसी प्रकार की परेशानी नहीं होगी और उन्हें बाजार में बेहतर दाम उपलब्ध कराए जाएंगे.

किसानों के लिए बदलाव की नई शुरुआत बना किसान कारवां

किसान कारवां ने यह साबित कर दिया कि यदि सरकार, वैज्ञानिक और किसान एक मंच पर आएं तो खेती को लाभकारी बनाया जा सकता है. यह अभियान किसानों को केवल जानकारी देने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्हें आधुनिक खेती, तकनीक, सरकारी योजनाओं और नए व्यवसायों से जोड़कर आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़ा कदम साबित हुआ. 

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