
नौकरी की तलाश में लंबे समय तक भटकने के बाद भी जब स्थायी रोजगार नहीं मिला, तब मुलताई तहसील के डहुआ पंखा निवासी जयप्रकाश चिकाने ने हार मानने के बजाय स्वरोजगार का रास्ता चुना.उनकी यह पहल आज क्षेत्र के युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है. मध्यप्रदेश शासन की प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (PMFME) के तहत मिली वित्तीय सहायता से उन्होंने ‘दूध गंगा डेयरी’ की स्थापना की और आज न केवल खुद आत्मनिर्भर बने हैं, बल्कि करीब 20 लोगों को रोजगार भी उपलब्ध करा रहे हैं.
जयप्रकाश बताते हैं कि योजना के तहत आवेदन करने के बाद उन्हें बैंक से 27 लाख रुपए का ऋण स्वीकृत हुआ, जिसमें 10 लाख रुपए का अनुदान भी शामिल था. इस आर्थिक सहयोग ने उनके डेयरी व्यवसाय के सपने को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. प्राप्त राशि से उन्होंने आधुनिक सुविधाओं से युक्त डेयरी यूनिट स्थापित की, जो आज क्षेत्र में दुग्ध संग्रहण और प्रसंस्करण का प्रमुख केंद्र बन चुकी है.
वर्तमान में दूध गंगा डेयरी आसपास के 15 से 20 गांवों से प्रतिदिन लगभग 4 हजार लीटर दूध एकत्रित कर रही है. इससे क्षेत्र के पशुपालक किसानों को अपने गांव के पास ही दूध बेचने की सुविधा मिल रही है और उन्हें बेहतर बाजार उपलब्ध हो रहा है.
संग्रहित दूध का उपयोग केवल कच्चे दूध की बिक्री तक सीमित नहीं है, बल्कि डेयरी में इसका प्रसंस्करण कर दही, घी, मक्खन, पनीर, खोवा और मिठाई जैसे मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार किए जाते हैं. इन उत्पादों की स्थानीय बाजार में अच्छी मांग है और इन्हें विभिन्न दुकानों तक पहुंचाया जाता है. इसके अलावा नर्मदापुरम की एक निजी कंपनी को भी नियमित रूप से दूध की आपूर्ति की जा रही है.
जयप्रकाश के अनुसार डेयरी संचालन से होने वाली कुल आय में से सभी खर्चों को निकालने के बाद उन्हें लगभग 40 हजार रुपए प्रतिमाह शुद्ध लाभ प्राप्त हो रहा है. उनका मानना है कि यदि युवा सही योजना और सरकारी सहायता का लाभ लें तो स्वरोजगार के माध्यम से बेहतर भविष्य बना सकते हैं.
दूध गंगा डेयरी ने केवल जयप्रकाश की आर्थिक स्थिति को मजबूत नहीं किया, बल्कि क्षेत्र के कई युवाओं को रोजगार भी दिया है. डेयरी में कार्यरत देवेन्द्र पोटफोड़े पिछले तीन वर्षों से यहां काम कर रहे हैं और उन्हें प्रतिमाह 12 हजार रुपए मानदेय मिलता है.
देवेन्द्र बताते हैं कि डेयरी में काम करने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वे रोजगार के साथ-साथ अपनी खेती और घरेलू जिम्मेदारियां भी आसानी से निभा पाते हैं. उनका कार्य समय सुबह 6 बजे से 10 बजे तक और शाम 6 बजे से रात 9 बजे तक रहता है. बाकी समय वे खेती और अन्य कार्यों में लगाते हैं.उनका कहना है कि किसी निजी कंपनी में नौकरी करने पर पूरा समय देना पड़ता, जबकि डेयरी में काम करने से आय और खेती दोनों का संतुलन बना रहता है.
जयप्रकाश चिकाने की यह सफलता कहानी दर्शाती है कि सरकारी योजनाओं का सही उपयोग कर ग्रामीण क्षेत्र के युवा भी आत्मनिर्भर बन सकते हैं. उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय PMFME योजना को देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के प्रति आभार व्यक्त किया है. उनका मानना है कि ऐसी योजनाएं ग्रामीण युवाओं को रोजगार और उद्यमिता की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर प्रदान कर रही हैं.
दूध गंगा डेयरी आज इस बात का उदाहरण है कि दृढ़ इच्छाशक्ति, सही योजना और सरकारी सहयोग के बल पर रोजगार मांगने वाला व्यक्ति रोजगार देने वाला उद्यमी बन सकता है.