बिहार में क्यों बंद हुई मंडी व्यवस्था, अब इन बड़ी परेशानियों से जूझ रहे हैं किसान

बिहार में क्यों बंद हुई मंडी व्यवस्था, अब इन बड़ी परेशानियों से जूझ रहे हैं किसान

बिहार में किसान आंदोलनों की शानदार विरासत है. स्वामी सहजानंद सरस्वती ने यहीं से अखिल भारतीय किसान महासभा की स्थापना की और पूरे देश में भूमि सुधार के लिए आंदोलन चलाया. महात्मा गांधी ने भी किसानों को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ने के लिए बिहार की धरती को ही चुना था. लेकिन, आज यहां कोई किसान नेता नहीं है.

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प्राची वत्स
  • Noida,
  • Feb 27, 2025,
  • Updated Feb 27, 2025, 6:12 PM IST

न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) गारंटी कानून और अन्य मांगों को लेकर किसान लगातार आंदोलन कर रहे हैं. इतना ही नहीं, ये आंदोलन देश का अब तक का सबसे बड़ा आंदोलन बन गया है. बड़े-बड़े दिग्गज किसान नेता इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं. इसी बीच मंडियों को लेकर भी कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. ये सवाल इसलिए सामने आए हैं क्योंकि सरकार ने कृषि मार्केटिंग नीति का एक मसौदा राज्यों को भेजा है जिसका विरोध हो रहा है. किसान संगठनों का कहना है कि इससे सरकार मंडी व्यवस्था का निजीकरण करना चाह रही है. 

वहीं किसानों का कहना है कि अगर इसका निजीकरण हुआ तो हालात बिहार जैसे हो जाएंगे. यह बात किसान नेता राकेश टिकैत नहीं कही है. उन्होंने कहा कि निजीकरण से बिहार की मंडियों की जैसी दशा हुई है, वैसी दशा यूपी की मंडियों की भी हो जाएगी. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि मंडी व्यवस्था बंद होने से बिहार में ऐसा क्या बदल गया जिससे पूरा किसान समुदाय डरा हुआ है. तो आइए जानते हैं कि बिहार की मंडी व्यवस्था क्यों बंद हुई.

मंडी व्यवस्था का हुआ खात्मा

2005 में जब नीतीश कुमार सत्ता में आए तो उन्होंने मंडी व्यवस्था को खत्म कर दिया और पैक्स का गठन किया. अब हम आगे इस पर चर्चा करेंगे कि ये पैक्स व्यवस्था क्या है. पैक्स के गठन के बाद किसान अपनी उपज मंडी की जगह पैक्स को देने लगे. आंकड़ों पर गौर करें तो 2006 से पहले जब बिहार में मंडी व्यवस्था थी, तब बिहार में कुल 95 हजार समितियां थीं. जिसमें से 53 हजार समितियों के पास अपने यार्ड थे. जहां किसान अपनी उपज एमएसपी पर बेचते थे. लेकिन पैक्स के गठन के बाद ये मामला पूरी तरह बदल गया. आज पूरे बिहार में लगभग 8500 पैक्स हैं.

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सरकार की दिखी नाकामी

मंडी व्यवस्था में जहां किसानों को तुरंत पैसा मिल जाता था, वहीं शुरुआती दिनों की बात करें तो PACS से फसल का दाम मिलने में 6 महीने तक का समय लग जाता था. इतना ही नहीं, किसानों को दफ्तरों के कई चक्कर भी लगाने पड़ते थे. हालांकि, अब तक इस मामले में कितना सुधार हुआ है, यह कहना अभी भी बहुत मुश्किल है. 

किसानों को क्या है परेशानी?

बिहार के किसान अपनी उपज बेचने में परेशानियों का सामना कर रहे हैं. उनकी शिकायत है कि मंडी व्यवस्था खत्म होने से व्यापारियों और बिचौलियों की मौज आ गई है जो एमएसपी से कम कीमत पर उपज खरीद लेते हैं. किसान के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है कि वह उपज बेचकर भारी कमाई करे. पैक्स की शुरुआती अच्छी नीयत के साथ हुई थी, लेकिन किसान कहते हैं कि उसका काम धरातल पर नहीं दिख रहा है. न पैक्स किसानों के पास खरीद करने जाता है और न किसान वहां अपनी उपज बेचने जाते हैं.

दरअसल, बिहार में छोटी जोत और रकबे वाले किसान अधिक हैं जो 2-4 क्विंटल फसल उपजाते हैं. ऐसे में वे पैक्स में जाने से अच्छा लोकल व्यापारियों को बेचना पंसद करते हैं क्योंकि उन्हें हाथोंहाथ पैसा मिल जाता है. किसान ये भी कहते हैं कि पैक्स किसानों की उपज नहीं खरीद पाता, इसलिए बिचौलिये और व्यापारी इसका गलत फायदा उठाते हैं और किसानों से औने-पौने दामों पर उपज की खरीद कर लेते हैं.

तो फिर क्यों नहीं हो रहा किसान आंदोलन

ऐसे में सवाल है कि बिहार में किसान इस व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन क्यों नहीं कर रहे हैं? बिहार में किसान आंदोलनों की शानदार विरासत है. स्वामी सहजानंद सरस्वती ने यहीं से अखिल भारतीय किसान महासभा की स्थापना की और पूरे देश में भूमि सुधार के लिए आंदोलन चलाया. महात्मा गांधी ने भी किसानों को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ने के लिए बिहार की धरती को ही चुना था. लेकिन, आज यहां कोई किसान नेता नहीं है. न ही किसानों का कोई ऐसा संगठन जमीन पर सक्रिय दिखता है. यहां तक ​​कि बिहार की राजनीति में भी, चाहे विधानसभा हो या संसद, बिहार से किसी किसान नेता की उपस्थिति नहीं दिखती.

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जमीन विवाद में फंसा मामला

इसका मुख्य कारण कहीं न कहीं यह भी है कि यहां कृषि का मुद्दा बाद में आता है. भूमि विवाद उससे पहले ही शुरू हो जाते हैं. कृषि से निकले नेता भी भूमि विवाद में उलझ जाते हैं. यहीं से उनकी राजनीति बदल जाती है. बिहार में भूमि सुधार के लिए आंदोलन चला, लेकिन सुधार नहीं हो सका. यहां भूमि का असमान बंटवारा ऐसा है कि किसानों की आधी लड़ाई इसी के लिए है. आजादी के बाद से किसानों के नाम पर बने संगठनों को देखें तो उनका पहला उद्देश्य भूमि पर अधिकार प्राप्त करना था. कृषि और किसानों की समस्याओं पर बात करने वाला कोई नहीं था.

क्या है PACS?

प्राथमिक कृषि ऋण सहकारी समिति यानी PACS है. PACS आम लोगों और खासकर किसानों को सुविधाएं प्रदान करती है. PACS एक सहकारी समिति है. यह किसानों को सस्ते ब्याज दरों पर ऋण, बीज, खाद, दवाइयां उपलब्ध कराती है. इससे किसानों को बहुत फ़ायदा होता है. इतना ही नहीं PACS किसानों के द्वारा उपजाए गए उत्पादों को खरीदती है ताकि किसानों की आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सके. पहली प्राथमिक कृषि साख समिति (PACS) का गठन वर्ष 1904 में किया गया था जिसका लाभ आज देश के करोड़ों किसान उठा रहे हैं. खासकर गुजरात की बात करें तो वहां के किसानों को सहकारी समितियों का सबसे अधिक लाभ मिल रहा है.

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