
सरकार ने घरेलू बाजार में पर्याप्त सप्लाई बनाए रखने के लिए, अरहर, उड़द और पीली मटर जैसी प्रमुख दालों के लिए आयात नीति (इंपोर्ट पॉलिसी) को एक और साल के लिए बढ़ाकर 31 मार्च, 2027 तक कर दिया है. नए बदलाव के मुताबिक, काली उड़द (ब्लैक मैटपे) और अरहर (पिजन पी) का आयात ड्यूटी फ्री बना रहेगा, जबकि पीली मटर पर 30 प्रतिशत की इंपोर्ट ड्यूटी लगती रहेगी. अरहर, उड़द और पीली मटर के लिए मौजूदा आयात नीति मंगलवार को समाप्त हो गई थी.
दालों के आयात को ड्यूटी फ्री करना किसानों के लिए नुकसान का सौदा हो सकता है क्योंकि बाहरी माल की उपलब्धता बढ़ने से किसानों की उपज खरीद धीमी पड़ सकती है. जीरो इंपोर्ट ड्यूटी इसलिए भी नुकसानदेह है क्योंकि हाल के समय में दालों का आयात तेजी से बढ़ा है क्योंकि घरेलू स्तर पर उसकी पैदावार संतोषजनक नहीं है.
उड़द और अरहर, दोनों ही फिलहाल शुल्क 'मुक्त' श्रेणी में हैं. इसका मतलब है कि 2027 की समय सीमा तक इनके आयात पर कोई प्रतिबंध नहीं है. इस पॉलिसी का असर किसानों की कमाई पर नहीं पड़े, इसके लिए सरकार ने दालों की शत-प्रतिशत खरीद का ऐलान किया है. इसी कड़ी में घरेलू किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए, कृषि मंत्रालय ने 2028-29 तक अरहर, उड़द और मसूर के राज्य उत्पादन की 100% खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर करने की मंजूरी दे दी है.
'फाइनेंशियल एक्सप्रेस' की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा वित्त वर्ष (अप्रैल-जनवरी) के पहले दस महीनों में दालों के आयात में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है. अरहर (तूर/पिजन पी) का आयात 15% बढ़कर 13 लाख टन (MT) हो गया. उड़द (ब्लैक ग्राम या मैटपे) का आयात 35% बढ़कर 9 लाख टन हो गया. पिछले पांच वर्षों (2020–2025) का आंकड़ा देखें तो आयातित दालों पर कुल निर्भरता 9% से बढ़कर 23.1% हो गई है. किसानों के लिहाज से यह आंकड़ा परेशान करने वाला है. आयात बढ़ने से घरेलू स्तर पर खेती और बिक्री दोनों प्रभावित होगी, किसान घाटे में जाएंगे.
जीरो इंपोर्ट ड्यूटी का मकसद दालों की सप्लाई बढ़ाकर घरेलू महंगाई पर अंकुश लगाना है. इससे आमतौर पर उपभोक्ताओं के लिए खुदरा कीमतें स्थिर रहती हैं, लेकिन अक्सर घरेलू किसानों को नुकसान पहुंचता है, क्योंकि इससे बाजार कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से नीचे गिर जाती हैं. कई फसलों की खरीद में देखा जाता है कि जीरो इंपोर्ट ड्यूटी की वजह से कृषि उपज का रेट एमएसपी के बराबर या उससे अधिक नहीं मिलता जिससे किसान भारी घाटे में आ जाते हैं.
सस्ते आयात से स्थानीय रूप से उगाई गई दालों की बाजार कीमत कम हो जाती है, जिससे किसानों के लिए गारंटीशुदा MSP पाना मुश्किल हो जाता है. अक्सर इसके चलते टैरिफ बढ़ाने की मांग उठने लगती है. जीरो इंपोर्ट ड्यूटी बड़ी मात्रा में आयात को बढ़ावा देती है, खासकर कनाडा और रूस जैसे देशों से. सरकार अक्सर सस्ती खाने की चीजों और घरेलू किसानों की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने के लिए, 'जीरो ड्यूटी' और 'ऊंचे टैरिफ' के बीच फेरबदल करती रहती है. लेकिन इस फेरबदल का गहरा प्रभाव किसानों पर देखा जाता है. मेहनत से उगाई उनकी फसल को सही और लाभदायक रेट नहीं मिलता, यहां तक कि लागत निकालना भी मुश्किल होता है.
सरकार के नए फैसले के मुताबिक, पीली मटर पर 30 प्रतिशत की इंपोर्ट ड्यूटी लगती रहेगी. पीली मटर पर इंपोर्ट ड्यूटी फिर से लगाने के फैसले से देश के किसानों को बेहतर कीमतें मिलेंगी, क्योंकि अभी उन्हें सरकार की ओर से तय MSP से कम दाम मिल रहे हैं. पीली मटर पर 1 नवंबर, 2025 से लागू 30% आयात शुल्क में 10% मूल शुल्क और 20% कृषि अवसंरचना विकास उपकर (AIDC) शामिल है. इस कदम का मकसद सस्ते आयात को कम करके, घरेलू दालों की कीमतों में गिरावट को रोककर और स्थानीय फसलों की मांग बढ़ाकर स्थानीय किसानों को लाभ पहुंचाना है.