
जब तक दिल्ली की घेराबंदी न हो और सड़कों पर ट्रैक्टरों का रेला न दिखे, तब तक सत्ता के गलियारों में कोई सुगबुगाहट नहीं होती. किसान जब अपनी मांगों को लेकर दिल्ली कूच कर देते हैं या सड़क पर बैठ जाते हैं तब सरकार घबराकर आनन-फानन में बातचीत की मेज सजा देती है. लेकिन जैसे ही देश का अन्नदाता इस सरकारी आश्वासन और मान-मनौव्वल की मर्यादा का सम्मान करते हुए अपने कदम पीछे खींचता है, वैसे ही व्यवस्था के छलावे का खेल शुरू हो जाता है. अपना काम निकलते ही हुक्मरान संवाद के दरवाजे पर ताला जड़ देते हैं. इस पूरी व्यवस्था की विडंबना तब और उजागर होती है, जब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते इन किसानों को शहरी एलीट वर्ग और सोशल मीडिया ट्रोलर्स की तीखी आलोचना का सामना करना पड़ता है. तब किसानों को खलनायक बना दिया जाता है. कोई यह बुनियादी सवाल नहीं पूछता कि जिस किसान का ठिकाना खेत-खलिहान होना चाहिए, उसे चमचमाती डामर की सड़कों पर रातें गुजारने और पुलिस की लाठियां-आंसू गैस के गोले खाने का शौक क्यों होगा?
वास्तव में, समाधान के नाम पर फेंका जाने वाला यह ‘संवाद कार्ड’ अब समाधान का जरिया नहीं, बल्कि आंदोलन की धार कुंद करने, किसानों को थकाने और समय काटने की एक सोची-समझी प्रशासनिक चालाकी बन चुका है. केंद्रीय कृषि मंत्रालय का मौजूदा रवैया इसी चालाकी का प्रमाण है. इस टालमटोल की हकीकत यह है कि मार्च 2025 में सातवें दौर की बातचीत के बाद सरकार गहरी नींद में सो गई. आज अगस्त 2026 आ चुका है. सवा साल से भी ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी आठवें दौर की बैठक की तारीख तय नहीं की गई है. जब लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद को ही आंदोलन कुचलने का हथियार बना लिया जाए, तो किसानों के पास अपनी आवाज सुनाने के लिए दोबारा सड़क पर निकलने के अलावा कौन सा रास्ता बचता है?
किसान नेता अभिमन्यु कोहाड़ का कहना है कि सरकार की नीयत का खोट उनके बदलते रवैये से साफ दिखाई देता है. जब किसान पूरे लाव-लश्कर के साथ शंभू और खनौरी बॉर्डर पर डटे हुए थे और दिल्ली की घेराबंदी का दबाव चरम पर था, तब केंद्र सरकार के तीन-तीन बड़े मंत्री खुद चलकर दिल्ली से चंडीगढ़ आ रहे थे. किसानों को मनाने और आंदोलन को दिल्ली की सीमाओं में प्रवेश करने से रोकने के लिए मंत्रियों ने चंडीगढ़ में आधी-आधी रात तक बैठकें कीं. लेकिन जैसे ही किसान दोनों बॉर्डर से हटे तो सरकार का पूरा रवैया बदल गया. दिल्ली का रास्ता सुरक्षित होते ही मंत्रियों का चंडीगढ़ आना तो दूर, उन्होंने दिल्ली में भी बातचीत के लिए नहीं बुलाया.
पहले दौर की बातचीत: 8 फरवरी 2024 को चंडीगढ़ के महात्मा गांधी राज्य लोक प्रशासन संस्थान (MGSIPA) में हुई, जिसमें केंद्रीय कृषि मंत्री अर्जुन मुंडा, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने शिरकत की और इसमें किसान संगठनों की मांगों पर शुरुआती चर्चा हुई लेकिन मंत्रियों द्वारा आर्थिंक आकलन के लिए समय मांगने के कारण यह बैठक पूरी तरह बेनतीजा रही.
दूसरे दौर की बातचीत: 12 फरवरी 2024 को दोबारा चंडीगढ़ के MGSIPA में इन्हीं तीनों केंद्रीय मंत्रियों (अर्जुन मुंडा, पीयूष गोयल, नित्यानंद राय) की मौजूदगी में हुई, जिसमें दिल्ली कूच रोकने के लिए सरकार ने बिजली संशोधन विधेयक जैसी कुछ तकनीकी मांगों पर तो सहमति दे दी लेकिन MSP की कानूनी गारंटी पर बात अटकने के कारण कोई समझौता नहीं हो सका.
तीसरे दौर की बातचीत: 15 फरवरी 2024 को शंभू और खनौरी बॉर्डर सीमाओं पर भारी तनाव और आंसू गैस के गोले छोड़े जाने के बीच फिर से चंडीगढ़ के MGSIPA में केंद्रीय मंत्रियों अर्जुन मुंडा, पीयूष गोयल और नित्यानंद राय के साथ मैराथन बैठक हुई, जिसमें मंत्रियों ने एमएसपी की कानूनी गारंटी देने पर विभिन्न मंत्रालयों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ पर विचार करने की बात कहकर किसानों से और समय मांगा.
चौथे दौर की बातचीत: 18 फरवरी 2024 को चंडीगढ़ के MGSIPA में केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा और पीयूष गोयल की अगुवाई में आयोजित की गई, जिसमें सरकार ने सहकारी समितियों के माध्यम से मक्का, कपास, अरहर, उड़द और मसूर को पांच साल तक एमएसपी पर खरीदने का लिखित प्रस्ताव दिया, जिसे किसान संगठनों ने सभी 23 फसलों की गारंटी न होने के कारण अगले ही दिन ठुकरा दिया.
पांचवें दौर की बातचीत: 21 फरवरी 2024 को खनौरी बॉर्डर पर झड़प और युवा किसान शुभकरण सिंह की मौत के बाद बढ़ते तनाव के बीच हुई, जिसमें तत्कालीन कृषि मंत्री अर्जुन मुंडा ने शांति बहाली और संवाद के लिए चंडीगढ़ में औपचारिक बुलावा भेजा था, लेकिन सीमा पर हुई हिंसा और कंक्रीट बैरिकेडिंग के विरोध में किसान संगठनों ने इस दौर में वार्ता की मेज पर आने से साफ इनकार कर दिया.
छठे दौर की बातचीत: 22 फरवरी 2025 को सरहदों पर साल भर के लंबे गतिरोध के बाद दोबारा संपर्क साधने के लिए चंडीगढ़ में हुई, जिसकी कमान नये केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संभाली और इसमें सरकार ने खरीद के दायरे में कुछ और नई फसलों को शामिल करने का मौखिक प्रस्ताव दिया, लेकिन किसानों ने सभी 23 फसलों की पक्की कानूनी गारंटी की मांग दोहराई जिससे यह प्रयास भी अधूरा रहा.
सातवें दौर की बातचीत: 19 मार्च 2025 को कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और अन्य के साथ चंडीगढ़ में किसान नेताओं की सातवें दौर की बैठक हुई. यह बैठक बिना किसी ठोस फैसले के समाप्त हो गई और अगली बातचीत की तारीख 4 मई तय की गई. बैठक खत्म होने के कुछ ही घंटों बाद पंजाब पुलिस ने बड़ा क्रैकडाउन करते हुए प्रमुख किसान नेताओं जगजीत सिंह डल्लेवाल, सरवन सिंह पंधेर और सैकड़ों अन्य प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया. गिरफ्तारी के तुरंत बाद, पंजाब पुलिस और प्रशासन ने बुलडोजरों की मदद से शंभू और खनौरी बॉर्डर पर लगे किसानों के तंबू, शेड और पक्के मोर्चों को हटा दिया.
शंभू और खनौरी बॉर्डर पर किसान आंदोलन 401 दिन तक चला था. यह आंदोलन 13 फरवरी 2024 को एमएसपी की कानूनी गारंटी और कर्ज माफी सहित अपनी विभिन्न मांगों को लेकर पंजाब के किसान संगठनों ने दिल्ली कूच की शुरुआत की थी. हरियाणा पुलिस द्वारा सीमाओं पर भारी बैरिकेडिंग, कंक्रीट की दीवारों और कटीले तारों से रोके जाने के बाद किसानों ने शंभू और खनौरी बॉर्डर पर ही पक्का मोर्चा लगा दिया. जबकि यह 20 मार्च 2025 को तब खत्म हुआ जब सातवें दौर की बातचीत बेनतीजा रहने के बाद 19 मार्च 2025 की रात पंजाब पुलिस जबरन धरना स्थल खाली करवाया.
इतने दिनों तक डटे किसानों के पास सरकार की बातचीत वाली वादाखिलाफी का पुख्ता सबूत है. किसानों ने हमें कृषि मंत्रालय द्वारा 24 अगस्त 2025 को जारी किया गया आधिकारिक पत्र दिया है. यह पत्र संयुक्त सचिव द्वारा किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल को भेजा गया था, जिसमें साफ लिखा था कि केंद्रीय कृषि मंत्री प्रवास पर दिल्ली से बाहर हैं. उनके वापस आते ही शीघ्र ही आपको बैठक की तिथि के बारे में सूचित कर दिया जाएगा.
किसानों का सीधा सवाल है कि साल भर से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी वह 'शीघ्र' की तारीख आज तक क्यों नहीं आई? आठवें दौर की बातचीत कब शुरू होगी. क्या तब जब पंजाब के किसान प्रदर्शन करने दिल्ली पहुंच जाएंगे तब? बहरहाल, अभी तो किसानों को खनौरी बॉर्डर पर रोका गया है.
मंगलवार को हमने एक प्रेस कान्फ्रेंस में जब केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से यह सवाल पूछा तो उन्होंने दावा किया कि “वे हर हफ्ते किसान संगठनों से मिलते है.” लेकिन, महोदय, सच तो यह है कि आपने पिछले एक साल में उन किसानों से एक बार भी बात नहीं की जो एमएसपी की कानूनी गारंटी को लेकर शंभू और खनौरी बॉर्डर पर बैठे हुए थे. आपने केवल उन चुनिंदा 'जेबी संगठनों' से मुलाकातें कीं जो सरकार की नीतियों पर बिना सवाल उठाए हां में हां मिलाते हैं.
सरकार की इसी सोची-समझी संवादहीनता और छलावे का नतीजा है कि एसकेएम (नॉन-पॉलिटिकल) से जुड़े किसान एक बार फिर सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए हैं. बार-बार छले जाने से भड़के किसानों ने इस बार कड़ा रुख अपनाया है और खनौरी बॉर्डर पर ही अर्धनग्न होकर विरोध प्रदर्शन शुरू करने का ऐलान किया है.
ये भी पढ़ें: आजादी के 80 साल: आंखें फोड़कर चश्मा दान करने वाली पॉलिसी का कैसे शिकार बना किसान?
ये भी पढ़ें: सचिन के शतकों और अमिताभ की फिल्मों पर 'सीलिंग' नहीं, तो फिर किसान की जमीन पर ये बंदिश क्यों?