
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय कावेरी नदी जल बंटवारे के लंबे समय से चले आ रहे विवाद के समाधान के लिए कर्नाटक के साथ द्विपक्षीय बातचीत करने के पक्ष में हैं. लेकिन, राज्य के किसान संगठन और विपक्षी दल इस पहल का विरोध कर रहे हैं. सरकारी सूत्रों के अनुसार, राज्य में गहराते जल संकट के बीच सरकार बातचीत के जरिए समाधान तलाशने की कोशिश कर रही है. तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा क्षेत्र, खासकर तंजावुर, तिरुवारुर और नागपट्टिनम जिलों में पानी की भारी कमी बनी हुई है. इसका असर अल्प अवधि की कुरुवई धान फसल की बुवाई पर पड़ रहा है. जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं होने के कारण इस साल 12 जून को परंपरागत रूप से खोले जाने वाले मेट्टूर बांध का उद्घाटन भी तय समय पर नहीं हो सका.
राज्य के कृषि मंत्री आर. विनोथ की अध्यक्षता में हुई परामर्श बैठक में सोमवार को किसान संगठनों के प्रतिनिधियों ने कर्नाटक के साथ प्रस्तावित बातचीत को रद्द करने की मांग की. तमिलनाडु कावेरी किसान संघ के प्रतिनिधियों का कहना है कि दोनों राज्यों के बीच सीधे संवाद से सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय कानूनी व्यवस्था कमजोर होगी. उन्होंने कहा कि सरकार को बातचीत के बजाय कानूनी विकल्पों का सहारा लेना चाहिए.
उधर, मामले को लेकर विपक्षी दल डीएमके ने भी मुख्यमंत्री की इस पहल पर आपत्ति जताई है. डीएमके का कहना है कि राज्य सरकार को कावेरी जल विवाद के स्थायी समाधान के लिए अलग न्यायाधिकरण की दिशा में कोशिश करनी चाहिए और तमिलनाडु के हिस्से का पूरा पानी सुनिश्चित करना चाहिए.
साल 2018 में दिए गए अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कावेरी जल बंटवारे की निगरानी और क्रियान्वयन के लिए कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) का गठन किया था. यही संस्थाएं दोनों राज्यों के बीच पानी के आवंटन की निगरानी करती हैं.
सुप्रीम कोर्ट के तय कार्यक्रम के अनुसार 1 जून से 22 जुलाई 2026 के बीच तमिलनाडु को 31 टीएमसी फीट पानी मिलना चाहिए था. लेकिन, इस अवधि में राज्य को केवल 3.5 टीएमसी फीट पानी ही मिला. इससे कृषि और पेयजल दोनों पर दबाव बढ़ गया है.
मुख्यमंत्री की प्रस्तावित पहल ऐसे समय सामने आई है, जब केंद्र सरकार ने संसद में कहा है कि कर्नाटक को कावेरी नदी पर किसी इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए तमिलनाडु, केरल या पुडुचेरी की सहमति लेने की जरूरत नहीं है. राज्यसभा में केंद्रीय जल शक्ति राज्य मंत्री राज भूषण चौधरी ने कहा कि 16 फरवरी 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में ऐसी कोई शर्त नहीं है.
केंद्रीय मंत्री ने यह भी बताया कि कर्नाटक ने वर्ष 2019 में मेकेदातु बैलेंसिंग रिजर्वायर और पेयजल परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) पेश की थी. इसे कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के फैसले और केंद्रीय जल आयोग के मौजूदा दिशा-निर्देशों के अनुरूप संशोधित कर दोबारा पेश करने के लिए वापस भेज दिया गया है. (पीटीआई)