Buffer Stock: 7 बार रेट बढ़ाने के बाद भी नहीं बिक रहा प्याज, किसानों ने सरकार को क्यों दिखाया ठेंगा?

Buffer Stock: 7 बार रेट बढ़ाने के बाद भी नहीं बिक रहा प्याज, किसानों ने सरकार को क्यों दिखाया ठेंगा?

महाराष्ट्र में किसानों के विरोध के बीच केंद्र सरकार ने प्याज की खरीद कीमत बढ़ाकर 2,125 रुपये प्रति क्विंटल कर दी है. हालांकि 50 दिनों में 7 बार रेट बढ़ाने के बावजूद किसान NAFED और NCCF को प्याज बेचने को तैयार नहीं हैं. किसानों का कहना है कि खुले बाजार और APMC मंडियों में बेहतर भाव मिल रहा है, जबकि सरकारी रेट उत्पादन लागत के मुकाबले कम है. इससे सरकार का प्याज बफर स्टॉक लक्ष्य खतरे में पड़ गया है और बरसात के दौरान कीमतों में संभावित उछाल की चिंता बढ़ गई है.

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रवि कांत सिंह
  • New Delhi,
  • Jul 06, 2026,
  • Updated Jul 06, 2026, 5:54 PM IST

केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के विभाग ने रविवार को एक बड़ा फैसला लिया. महाराष्ट्र में किसानों के विरोध प्रदर्शन के बीच प्याज की खरीद कीमत (MAPP) 13% बढ़ाकर 2,125 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया. इस फैसले का मकसद प्याज की खरीद को बढ़ावा देना और किसानों को बेहतर दाम दिलाना है. फैसले की खास बात ये भी है कि बीते 50 दिनों में सरकार ने 7 बार प्याज का दाम बढ़ाया है. इस उम्मीद में कि महाराष्ट्र के किसानों का रोष कम होगा, कीमतों को लेकर पनपा असंतोष कुछ घटेगा. लेकिन ऐसा कुछ भी होता नहीं दिख रहा. किसानों ने ठान लिया है कि वे इस 'औने पौने' सरकारी रेट पर अपनी उपज नहीं बेचेंगे. सवाल है कि जब किसान प्याज नहीं बेचेंगे तो इसमें किसका नुकसान है?

सतही तौर पर देखें तो इसका बड़ा घाटा किसानों को ही होना चाहिए. मगर किसान इस बात से बेपरवाह हैं. उनका कहना है कि सरकारी रेट पर प्याज नहीं बिकने से उनका कोई नुकसान नहीं है. बल्कि नुकसान सरकार को है. ऐसा क्यों? इसका जवाब सरकार के बफर स्टॉक में छिपा है.

क्या है बफर स्टॉक का गणित?

दरअसल, सरकार हर साल किसानों से बफर स्टॉक के लिए उपज की खरीद करती है. इस उपज में प्याज भी शामिल है. चूंकि हर साल कुछ खास अवधि में प्याज के रेट बेतहाशा बढ़ते हैं. मार्केट में उसकी सप्लाई कम पड़ जाती है. उस वक्त सरकार उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए अपने बफर स्टॉक से प्याज खुले बाजार में बेचती है जिसका रेट बाजार के भाव से कम होता है. सरकार के इस कदम से आम जनता को बहुत मदद नहीं मिलती, लेकिन लोगों में यह मैसेज जरूर जाता है कि सरकार ने दखल देते हुए सस्ते प्याज की बिक्री शुरू की है. इसका मनोवैज्ञानिक दबाव बाजार पर पड़ता है. लिहाजा बाजार के रेट भी गिरते हैं.

इस पूरी कवायद के लिए सरकार को पहले प्याज का बफर स्टॉक जमा करना होता है. इसके लिए सरकार किसानों से प्याज की खरीद करती है जिसमें नेफेड और एनसीसीएफ जैसी एजेंसियां खरीद का काम करती हैं. इस बार भी सरकार ने इन एजेंसियों को प्याज की खरीद के लिए महाराष्ट्र में काम पर लगाया है. मगर किसान इन एजेंसियों को भाव नहीं दे रहे. 

किसानों का कहना है कि 2125 रुपये क्विंटल का भाव उनके लिए फायदे का सौदा नहीं है क्योंकि इससे तो लागत भी नहीं निकल पाएगी. जबकि इससे अधिक और अच्छे रेट खुले बाजार और खुली मंडियों (APMC) में मिल रहे हैं. फिर भला किसान क्यों नेफेड और एनसीसीएफ को कम दाम पर अपनी उपज बेचे?

बफर स्टॉक नहीं भरेगा तो क्या होगा?

जब किसान सरकारी एजेंसियों को प्याज नहीं बेचेंगे तो क्या होगा? सरकार का बफर स्टॉक नहीं भरेगा, जैसा कि अभी देखने में आ रहा है. सरकार ने इस सीजन बफर स्टॉक के लिए 2 लाख टन प्याज खरीद का लक्ष्य तय किया है. 7 बार भाव बढ़ने के बाद भी अभी तक कुल बफर की मात्र 5 फीसद ही खरीद हो चुकी है. जबकि बीते दो महीने में सरकार ने खरीद कीमत में 5 गुना तक वृद्धि की है. 

एक तरफ सरकार किसानों की भलाई की दुहाई देते हुए प्याज के भाव बढ़ा रही है, तो दूसरी ओर किसान सरकार के इस रेट को कोई भाव नहीं दे रहे हैं. इससे सरकार के कान खड़े हो गए हैं, खासकर उपभोक्ता मामलों के विभाग के.  इसकी वजह क्या है? वजह है बरसात और प्याज की कालाबाजारी. बरसात में अक्सर प्याज के दाम आसमान पर चढ़ जाते हैं. इसका बड़ा कारण प्याज की अवैध होर्डिंग है. व्यापारी मौसम की चाल को भांपते हुए पहले ही किसानों से सस्ते दाम पर प्याज खरीद लेते हैं और उसे अपने गोदामों में डंप कर लेते हैं. फिर बारिश के दिनों में मार्केट में प्याज की कृत्रिम कमी बनाई जाती है और व्यापारी 80-100 रुपये तक अपना माल बेचते हैं. इससे सरकार की किरकिरी होती है और व्यापारी चांदी काटते हैं.

सरकार इस किरकिरी से बचना चाहती है. इसलिए प्याज खरीद की कीमत को बार-बार बढ़ाया जा रहा है. लेकिन मामला उलटा साबित हो रहा है. सरकारी रेट बढ़ाए जाने के बाद भी किसान नेफेड और एनसीसीएफ को ठेंगा दिखा रहे हैं और व्यापारियों को अपनी उपज बेच रहे हैं. इससे आशंका प्रबल हो रही है कि कहीं बफर स्टॉक खाली न रह जाए और बरसात में प्याज के रेट के साथ व्यापारी कोई बड़ा खेला न कर दें.

नेफेड को प्याज क्यों नहीं बेच रहे किसान?

सवाल है कि किसान सरकार को अपनी उपज क्यों नहीं बेच रहे हैं? इसका जवाब प्याज के मंडी रेट में छिपा है. गुरुवार को लासलगांव APMC में प्याज की औसत कीमत 2,175 रुपये प्रति क्विंटल (21.75 रुपये प्रति किलो) दर्ज की गई. इसमें न्यूनतम और अधिकतम कीमतें क्रमशः 700 रुपये और 2,740 रुपये प्रति क्विंटल थीं. अच्छी क्वालिटी और चमक वाले प्याज की बिक्री 2,000 रुपये से 2,700 रुपये प्रति क्विंटल के दायरे में हुआ. इससे समझना आसान है कि जब किसान को 2700 रुपये भाव मिलेगा तो वह नेफेड या एनसीसीएफ को 2100 रुपये में प्याज क्यों देगा. यही वजह है कि सरकारी एजेंसियों के गोदाम अभी खाली चल रहे हैं.

सरकारी गोदाम भरें, इसका उपाय क्या है? इसका जवाब हमें महाराष्ट्र प्याज उत्पादक संघ के अध्यक्ष भरत दिघोले के इस जवाब में छिपा है. दिघोले कहते हैं, हम मांग कर रहे हैं कि केंद्र सरकार अपनी एजेंसियों, NAFED और NCCF के जरिए 3,000 रुपये प्रति क्विंटल (30 रुपये प्रति किलो) की दर से प्याज खरीदे. हालांकि ये एजेंसियां ​​APMC में चल रही कीमतों से कम दर पर खरीद की पेशकश कर रही हैं. हम यह भी चाहते हैं कि NAFED और NCCF, APMC में नीलामी प्रक्रिया के जरिए सीधे किसानों से प्याज खरीदें.

दिघोले ने कहा, "प्याज उत्पादन की लागत लगभग 2,000 रुपये प्रति क्विंटल (20 रुपये प्रति किलो) है, और अगर किसानों को इससे कम कीमत मिलती है तो उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है. केंद्र की मौजूदा खरीद दर उत्पादन लागत से कम है."

कुल मिलाकर, क्या सरकार प्याज की कीमत को 3,000 रुपये के रेट तक ले जाएगी ताकि किसान नेफेड और एनसीसीएफ का गोदाम भर सकें.  अगर ऐसा रेट नहीं मिलता, तो शायद किसान खुले बाजार में ही अपनी उपज बेचना मुफीद समझेंगे.

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