
बिहार के रोहतास जिले के पतपुरा गांव के एक किशोर ने अपनी प्रतिभा से सभी को हैरान कर दिया है. किसान परिवार से आने वाले सनीश कुमार ने घर में पड़े कबाड़ और जुगाड़ के सामान की मदद से बैटरी से चलने वाला एक मिनी ट्रैक्टर तैयार किया है. खास बात यह है कि इस ट्रैक्टर को बनाने में सनीश को करीब दो से ढाई महीने का समय लगा और इसे एक बार चार्ज करने पर लगभग 50 किलोमीटर तक चलाया जा सकता है. सनीश ने अपनी शुरुआती पढ़ाई हाई स्कूल भेड़िया से की है. पढ़ाई के साथ-साथ उसे नई मशीनें बनाने का भी शौक है. इसी जुनून के चलते सनीश ने घर और आसपास से पुराने पुर्जे, लोहे का कबाड़ और अन्य सामान इकट्ठा किया और उनसे यह मिनी इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर तैयार कर दिया. सबसे खास बात यह है कि ट्रैक्टर में इस्तेमाल होने वाली बैटरी भी उसने खुद तैयार की है.
यह मिनी ट्रैक्टर देखने में भले छोटा हो, लेकिन इसमें एक सामान्य ट्रैक्टर की तरह कई जरूरी सुविधाएं मौजूद हैं. इसमें सेल्फ स्टार्ट सिस्टम, एक्सीलरेटर, ब्रेक और हॉर्न जैसी सभी सुविधाएं सही तरीके से काम करती हैं. गांव की सड़कों पर जब सनीश अपने इस ट्रैक्टर को लेकर निकलता है तो लोग रुककर उसे देखने लगते हैं और उसकी तारीफ करते हैं.
सनीश का कहना है कि इस मिनी ट्रैक्टर में छोटा हल या अन्य कृषि उपकरण भी जोड़े जा सकते हैं. इसकी मदद से खेतों में खाद और बीज पहुंचाने, फसल ढोने और छोटे-मोटे खेती के काम आसानी से किए जा सकते हैं. संकरी पगडंडियों वाले खेतों तक भी यह ट्रैक्टर आसानी से पहुंच जाता है, जिससे छोटे किसानों को काफी सुविधा मिल सकती है. सनीश के पिता किसान हैं और वह खेती के काम में उनका हाथ भी बंटाता है. उनका मानना है कि यदि ऐसे कम लागत वाले इलेक्ट्रिक कृषि उपकरण बड़े स्तर पर तैयार किए जाएं, तो छोटे किसानों को काफी फायदा मिल सकता है.
यह पहली बार नहीं है जब सनीश ने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है. इससे पहले भी वह इलेक्ट्रिक बाइक और थार जैसी गाड़ी का मॉडल तैयार कर चुका है. अब उसकी इच्छा है कि उसे कोई प्रायोजक (स्पॉन्सर) या संस्था का सहयोग मिले, ताकि वह अपने इन प्रोजेक्ट्स को और बेहतर बना सके और समाज के लिए उपयोगी तकनीक विकसित कर सके. सनीश की इस उपलब्धि से उसके पिता, शिक्षक और गांव के लोग बेहद खुश हैं. सभी ने उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए हरसंभव मदद का भरोसा दिलाया है. उसकी मेहनत और नवाचार आज ग्रामीण युवाओं के लिए प्रेरणा बन गए हैं. (रंजन कुमार की रिपोर्ट)