
कभी लाल-लाल सेबों से लदे रहने वाले हिमाचल प्रदेश के बाग इस बार मौसम की मार झेल रहे हैं. बेमौसम बारिश, कम बर्फबारी, ओलावृष्टि और लगातार बदलते तापमान ने राज्य की मशहूर सेब फसल को बड़ा नुकसान पहुंचाया है. हालात ऐसे हैं कि वर्ष 2026 में हिमाचल का सेब उत्पादन करीब 40 प्रतिशत तक घटने का अनुमान है. इससे न केवल राज्य की करीब 5,000 करोड़ रुपये की एप्पल इकॉनमी पर असर पड़ेगा, बल्कि सेब की खेती पर निर्भर लाखों किसान परिवारों की आय भी प्रभावित हो सकती है.
बागवानी विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, वर्ष 2025 में हिमाचल प्रदेश में करीब 6.99 लाख मीट्रिक टन सेब का उत्पादन हुआ था. लेकिन मौजूदा मौसम की परिस्थितियों को देखते हुए वर्ष 2026 में यह घटकर करीब 4.36 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है. यानी उत्पादन में करीब 2.63 लाख मीट्रिक टन की कमी आ सकती है.
विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार मौसम का मिजाज सेब की खेती के अनुकूल नहीं रहा. सर्दियों में सामान्य से काफी कम बर्फबारी हुई, जिससे पेड़ों को जरूरी ठंड नहीं मिल सकी. इसके बाद वसंत ऋतु में बेमौसम बारिश और कई इलाकों में लगातार ओलावृष्टि हुई, जिससे फूल और छोटे फल झड़ गए. इसके अलावा तापमान में लगातार उतार-चढ़ाव ने भी फसल की क्वालिटी और उत्पादन दोनों को प्रभावित किया है.
हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था में सेब का बेहद महत्वपूर्ण योगदान है. दरअसल, राज्य के आठ जिलों में बड़े पैमाने पर सेब की खेती होती है और करीब 25 लाख किसान और बागवान इससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इससे जुड़े हुए हैं. वहीं, उत्पादन में भारी गिरावट का असर किसानों की आमदनी के साथ-साथ स्थानीय कारोबार, पैकिंग, परिवहन और मंडियों पर भी पड़ सकता है.
बागवानों का कहना है कि मौसम की मार के साथ-साथ खेती की लागत भी लगातार बढ़ रही है. दवाइयों, खाद, मशीनरी और मजदूरी पर पहले से ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है, जबकि उत्पादन कम होने से कमाई घट रही है. बाग मालिक बलवंत जस्टा का कहना है कि इस साल न तो समय पर बर्फबारी हुई और न ही बारिश. सिंचाई की पर्याप्त सुविधा नहीं होने के कारण बाग पूरी तरह मौसम पर निर्भर हैं, जिससे नुकसान और बढ़ गया है. वहीं, किसान वीरेंद्र सिंह का कहना है कि बढ़ते तापमान के कारण पेड़ों को जरूरी ठंड नहीं मिला. इसके अलावा ओलावृष्टि ने भी फसल को काफी नुकसान पहुंचाया है. ऐसे में उत्पादन घटने के साथ किसानों की लागत लगातार बढ़ रही है.
फल, सब्जी और फूल उत्पादक संघ के अध्यक्ष हरीश चौहान के अनुसार, पारंपरिक सेब की किस्मों को अच्छी पैदावार के लिए 7 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान पर 1,200 से 1,600 घंटे तक ठंड की जरूरत होती है. वहीं, जल्दी तैयार होने वाली किस्मों के लिए भी लगभग 600 घंटे की ठंड आवश्यक होती है. लेकिन लगातार बढ़ते तापमान के कारण यह अवधि कम होती जा रही है, जिससे उत्पादन पर सीधा असर पड़ रहा है.
जलवायु परिवर्तन का असर केवल सेब तक सीमित नहीं है. बल्कि हिमाचल प्रदेश में उगाई जाने वाली खुबानी, चेरी, आड़ू और बेर जैसे गुठलीदार फलों का उत्पादन भी घटने की आशंका है. पिछले साल जहां इन फलों का उत्पादन करीब 24,622 मीट्रिक टन रहा था, वहीं इस वर्ष यह घटकर लगभग 23,000 मीट्रिक टन रहने का अनुमान है.
बागवानों ने सरकार से सिंचाई व्यवस्था मजबूत करने, जल संरक्षण योजनाओं को बढ़ावा देने और फसल बीमा योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने की मांग की है. उनका कहना है कि बदलते मौसम के दौर में आधुनिक सिंचाई सुविधाएं और बेहतर बीमा व्यवस्था ही किसानों को बड़े नुकसान से बचा सकती हैं. वहीं, विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो हिमाचल प्रदेश की सेब अर्थव्यवस्था पर संकट और गहरा सकता है. इससे न केवल किसानों की आय प्रभावित होगी, बल्कि देश में सेब की उपलब्धता और कीमतों पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है. (PTI)