
शंघाई में आयोजित 17वें चाइना इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन ऑयल्स एंड ऑयलसीड्स (CCOC-17) में इंडियन वेजिटेबल ऑयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (IVPA) के अध्यक्ष सुधाकर देसाई ने वैश्विक वनस्पति तेल उद्योग की बदलती तस्वीर पर बात की. उन्होंने कहा कि अब यह उद्योग एक ऐसे नए दौर में प्रवेश कर रहा है जहां सिर्फ मांग और आपूर्ति ही नहीं, बल्कि सरकारों की नीतियां, ऊर्जा बाजार, जलवायु परिवर्तन और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थितियां भी कीमतों और व्यापार को सीधे प्रभावित कर रही हैं.
देसाई ने बताया कि विपणन वर्ष 2025-26 में दुनिया के चार प्रमुख वनस्पति तेलों का उत्पादन लगभग 3.1 प्रतिशत बढ़कर करीब 21.25 करोड़ टन तक पहुंच सकता है. वहीं, इसी अवधि में वैश्विक खपत 1.9 प्रतिशत बढ़कर लगभग 21.1 करोड़ टन रहने की संभावना है. इसका मतलब है कि फिलहाल बाजार में संतुलन बना हुआ है, लेकिन यह संतुलन बहुत स्थिर नहीं है और बाहरी कारक इसे तेजी से बदल सकते हैं.
उन्होंने आगे बताया कि 2026 में मलेशिया में पाम ऑयल उत्पादन लगभग 1.98 करोड़ टन और इंडोनेशिया में 4.93 करोड़ टन रहने का अनुमान है. हालांकि दोनों देशों का कुल उत्पादन पिछले साल की तुलना में लगभग 9 लाख टन कम रह सकता है.
सबसे बड़ा बदलाव इंडोनेशिया की जैव ईंधन नीति से आने की संभावना है. अगर 1 जुलाई 2026 से B50 बायोडीजल नीति लागू होती है, तो इंडोनेशिया लगभग 1.46 करोड़ टन पाम ऑयल का उपयोग बायोडीजल बनाने में करेगा. इससे वैश्विक बाजार में पाम ऑयल की उपलब्धता घट सकती है और अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर सीधा असर पड़ेगा.
आईवीपीए अध्यक्ष के अनुसार आने वाले समय में वनस्पति तेल बाजार सिर्फ कृषि उत्पादन पर नहीं, बल्कि बायोफ्यूल नीतियों पर भी बहुत अधिक निर्भर करेगा. अमेरिका की जैव ईंधन नीतियां, कच्चे तेल की कीमतें, विदेशी मुद्रा दरों में उतार-चढ़ाव और मौसम की स्थिति जैसे कारक बाजार की दिशा तय करेंगे.
उन्होंने यह भी कहा कि एल नीनो जैसी जलवायु घटनाएं सूरजमुखी और अन्य तिलहनों की फसलों को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे उत्पादन और कीमतों में अस्थिरता बनी रहेगी.
देसाई ने स्पष्ट किया कि अब वनस्पति तेलों की कीमतें केवल उत्पादन और खपत पर आधारित नहीं रहेंगी. वैश्विक अर्थव्यवस्था, सरकारी नीतियां और अंतरराष्ट्रीय घटनाएं भी कीमतों को तेजी से ऊपर-नीचे कर सकती हैं. इसलिए कंपनियों और व्यापारियों को लगातार बाजार की जानकारी पर नजर रखनी होगी और जोखिम प्रबंधन को मजबूत करना होगा.
उन्होंने बताया कि वर्ष 2026 की दूसरी छमाही में मलेशिया के क्रूड पाम ऑयल फ्यूचर्स लगभग 4,200 से 4,700 मलेशियन रिंगिट प्रति टन के बीच रह सकते हैं. पाम ऑयल और सोयाबीन ऑयल के बीच कीमतों का अंतर भी ज्यादा नहीं रहेगा.
वहीं सूरजमुखी तेल, जो अभी महंगा बिक रहा है, उसकी कीमतों में गिरावट आ सकती है और इसका प्रीमियम सामान्य स्तर पर आकर लगभग 50 से 70 डॉलर प्रति टन रह सकता है.
भारत के संदर्भ में उन्होंने कहा कि देश में हर साल लगभग 2.5 करोड़ टन खाद्य तेल की खपत होती है, जिसमें से करीब 60 प्रतिशत आयात से पूरा किया जाता है. 2025-26 में भारत का खाद्य तेल आयात लगभग 1.68 करोड़ टन तक पहुंच सकता है, जिसमें पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सूरजमुखी तेल प्रमुख होंगे.
उन्होंने यह भी कहा कि भारत को अपनी घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने की जरूरत है, खासकर तिलहन फसलों की पैदावार सुधारकर. इसके लिए खेती की तकनीक और प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाना जरूरी है.
ऑयल पाम और मॉनसून का महत्व
देसाई ने कहा कि भारत में ऑयल पाम की खेती लंबे समय में खाद्य तेल सुरक्षा को मजबूत कर सकती है. साथ ही देश में तिलहन उत्पादन काफी हद तक दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पर निर्भर करता है, इसलिए मौसम का सही रहना बहुत जरूरी है.
उन्होंने यह भी कहा कि भारत और चीन मिलकर वनस्पति तेल की पूरी सप्लाई चेन में बेहतर सहयोग कर सकते हैं. बेहतर लॉजिस्टिक्स, मजबूत व्यापारिक साझेदारी और एक-दूसरे की बाजार जरूरतों को समझकर दोनों देश मिलकर क्षेत्रीय आपूर्ति व्यवस्था को अधिक मजबूत बना सकते हैं.
कुल मिलाकर, वैश्विक वनस्पति तेल उद्योग तेजी से बदलते दौर में प्रवेश कर चुका है. अब यह बाजार पहले की तुलना में ज्यादा जुड़ा हुआ और जटिल हो गया है. आने वाले समय में नीतियां, तकनीक, जलवायु और अंतरराष्ट्रीय सहयोग इस उद्योग की दिशा तय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाएंगे.
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