
महाराष्ट्र में आम उगाने वाले किसान दोहरी मार से परेशान हैं. खासकर अल्फांसो के किसान कुछ ज्यादा ही मुसीबत में हैं. इस बार बेमौसम बारिश बहुत हुई जिससे आम के फूल और फलों पर बुरा असर पड़ा. अल्फांसो जब पक कर तैयार हुआ, देश-दुनिया में बेचने की बारी आई, तो ईरान युद्ध ने सब चौपट कर दिया. आम उगाने वाले किसानों का कहना है कि इस बार नुकसान इतना अधिक है कि उसे बताने का भी कोई फायदा नहीं. बताने से नुकसान का दर्द और भी अधिक बढ़ता है.
अल्फांसो उगाने वाले किसानों ने 'आजतक' को बताया कि ईरान युद्ध ने आम के निर्यात को पूरी तरह से ठप कर दिया है. पुणे में जुन्नर के किसान हरिभाई मस्के ने बताया, इस बार अभी तक 1-2 परसेंट आम ही निर्यात हो सका है. बीते साल में अल्फांसो की विदेशों में अच्छी मांग रही, लेकिन इस बार बड़ी गिरावट देखी जा रही है.
दुबई अल्फांसो का सबसे बड़ा मार्केट है, मगर वहां भी निर्यात नहीं जा पा रहा है. अभी तक 10 परसेंट से भी कम माल भेजा गया है. इसका कारण ईरान और अमेरिका की लड़ाई है. एक किसान ने बताया कि इस बार 90 परसेंट तक किसानों को नुकसान झेलना पड़ा है.
बारिश और ठप निर्यात का असर घरेलू मार्केट में अल्फांसो के बढ़े हुए दाम के रूप में देखा जा रहा है. एक किसान ने बताया कि पिछले साल की तुलना में इस बार ग्राहक प्रति दर्जन 500 रुपये अधिक चुका रहे हैं. जिसको लेना है, वह ले रहा है, मगर खरीद में गिरावट है. पिछले साल जिसने 4-5 दर्जन खरीद की थी, वह इस बार 2 दर्जन में काम चला रहा है.
किसान ने बताया कि मुंबई के लोग आम खाते हैं, बिना आम के उनका काम नहीं चलेगा. मांग को देखते हुए मार्केट में बिकी भी हो रही है, लेकिन गिरावट के साथ. दाम बढ़ने से आम की खरीद बिल्कुल ठप नहीं हुई है, मगर मात्रा में कमी जरूर आई है. ईरान युद्ध के बाद सीजफायर का ऐलान हुआ, इसके बाद भी निर्यात पूरी तरह नहीं खुला है क्योंकि होर्मुज स्ट्रेट आंशिक रूप से बंद है.
किसानों को इस बात का डर सता रहा है कि जब तक एक्सपोर्ट खुलेगा, तब तक अल्फांसो का सीजन खत्म हो जाएगा. किसानों ने पूरी तैयारी से अल्फांसो की बागवानी की थी, मगर बारिश और ईरान युद्ध ने बड़ा नुकसान कर दिया है.
यह नुकसान किसानों तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसका प्रभाव बाजार में दुकानदार से लेकर मजदूरों तक पर देखा जा रहा है. अल्फांसो की बिक्री और निर्यात अधिक होता है तो दुकानदारों के चहरे खिले रहते हैं. निर्यात में तेजी रहे तो मजदूरों को ढुलाई का काम अधिक मिलता है. किसानों की कमाई बढ़ती है जिससे वे अगली बागवानी के लिए तैयारी करते हैं. इस बार पूरी चेन प्रभावित हो गई है. किसान, एक्सपोर्टर, दुकानदार और मजदूर सभी परेशान हैं.(विद्या की रिपोर्ट)