
महाराष्ट्र के प्रमुख प्याज उत्पादक इलाके इन दिनों गहरे संकट से गुजर रहे हैं. नासिक, पुणे और आसपास के क्षेत्रों में प्याज के दाम गिरकर 50 पैसे से लेकर 2 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गए हैं, जिससे किसान भारी आर्थिक नुकसान झेल रहे हैं. किसानों का कहना है कि मौजूदा कीमतों पर उन्हें खेती की लागत तक निकालना मुश्किल हो रहा है. जानकारी के अनुसार, प्याज की उत्पादन लागत 20 से 25 रुपये प्रति किलो तक बैठ रही है, जबकि मंडियों में 2 से 6 रुपये प्रति किलो ही मिल रहे हैं. कुछ मामलों में किसानों को सभी कटौतियों के बाद मात्र 50 पैसे प्रति किलो ही मिल पाए.
मार्केट एनालिस्ट प्रभाकर शिंदे ने बताया कि 2021 से 2025 के बीच, मार्च में बार-बार बेमौसम बारिश हुई, लेकिन इस साल बारिश ने सीधे तौर पर प्याज पैदा करने वाले मुख्य तालुकों को प्रभावित किया. बारिश ने स्टोर किए गए प्याज को नुकसान पहुंचाया और उनकी क्वालिटी कम कर दी, जिससे मार्केट में उनकी कीमत कम हो गई. महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में लू जैसी स्थितियों ने स्टोरेज और शेल्फ लाइफ को प्रभावित करके इस समस्या को और बढ़ा दिया.
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और सुनेत्रा अजित पवार ने नई दिल्ली में केंद्रीय मंत्रियों के साथ बैठक की. बैठक में किसानों को राहत देने के उपायों पर चर्चा की गई.
मुख्यमंत्री फडणवीस ने बताया कि केंद्र सरकार ने NAFED और NCCF को सीधे किसानों से खरीद करने की अनुमति देने पर सहमति जताई है. साथ ही, प्याज के निर्यात पर कोई प्रतिबंध या अतिरिक्त शुल्क न लगाने का भी आश्वासन दिया गया है.
शिंदे ने भारत की प्याज अर्थव्यवस्था में मौजूद असंतुलन पर भी रोशनी डाली. भारत हर दिन लगभग 50,000 टन प्याज की खपत करता है, जो सालाना लगभग 1.8 करोड़ टन बैठता है. हर साल 20 लाख टन प्याज एक्सपोर्ट किया जाता है, जबकि कुल उत्पादन लगभग 2.3 करोड़ टन है. उनके अनुसार, उत्पादन में 10 से 20 लाख टन का उतार-चढ़ाव भी मार्केट की कीमतों पर बहुत बड़ा असर डाल सकता है.
उन्होंने आगे यह तर्क दिया कि प्याज को 'आवश्यक वस्तु अधिनियम' (Essential Commodities Act) के दायरे से बाहर कर देना चाहिए, ताकि सरकार का जरूरत से ज्यादा दखल कम हो सके और मार्केट का कामकाज सुविधाजनक तरीके से चल सके.
सरकार ने खरीद प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए मशीनीकृत ग्रेडिंग सिस्टम लागू करने की बात कही है, ताकि किसानों की उपज को मनमाने तरीके से खारिज न किया जा सके. राज्य सरकार ने केंद्र से खरीद लक्ष्य बढ़ाकर 10 लाख टन करने की मांग भी उठाई है.
केंद्र द्वारा 1,580 रुपये प्रति क्विंटल की न्यूनतम खरीद कीमत तय की गई है, लेकिन किसान इसे नाकाफी बता रहे हैं. उनका कहना है कि बढ़ती लागत के मुकाबले यह दर बहुत कम है.
पुणे जिले के ओतुर के एक प्रगतिशील किसान और प्याज विशेषज्ञ विक्रम अवचट ने कहा कि भारत का निर्यात बाजार भी पिछले कुछ सालों में लगातार बदलते नीतिगत फैसलों की वजह से कमजोर हुआ है. उन्होंने बताया कि बांग्लादेश कभी भारतीय प्याज के सबसे बड़े खरीदारों में से एक था. लेकिन, अपनी कृषि नीति में बदलाव करने और प्याज उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने की कोशिश के बाद, बांग्लादेश ने भारतीय आयात पर अपनी निर्भरता कम कर दी है. इसका महाराष्ट्र के किसानों पर काफी असर पड़ा, जो पारंपरिक रूप से बंपर पैदावार वाले सालों में कीमतों को स्थिर रखने के लिए निर्यात पर निर्भर रहते थे.
अवचट ने आगे कहा कि यूरोप और दूसरे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय प्याज की मांग अब भी काफी अधिक है, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा बार-बार निर्यात पर रोक लगाने, अचानक ड्यूटी बढ़ाने और नीतियों में बदलाव करने से निर्यातकों और खरीदारों के बीच अनिश्चितता पैदा हो गई है.
अर्थशास्त्र और नीतिगत बहसों से परे, प्याज की कीमतों में आई भारी गिरावट ने खेती करने वाले परिवारों को गहरे संकट में डाल दिया है. पुणे जिले के ओतुर गांव में, महिला किसान बालीशा चव्हाण ने 41 क्विंटल प्याज 2 रुपये प्रति किलो की दर से बेचने के बाद अपनी आपबीती सुनाई. अपने नुकसान के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें जो पैसे मिले, वे मजदूरी, ढुलाई और खेती की लागत निकालने के लिए भी काफी नहीं थे. अगले महीने स्कूल खुलने वाले हैं, ऐसे में चव्हाण ने कहा कि उनके पास अपने बच्चों के लिए कॉपियां, किताबें और स्कूल की यूनिफ़ॉर्म खरीदने के लिए भी पैसे नहीं हैं.
उनकी कहानी पूरे महाराष्ट्र में प्याज किसानों के बीच बढ़ती हताशा का प्रतीक बन गई है. जहां एक तरफ राज्य सरकार केंद्र सरकार के आश्वासनों को धरातल पर उतरने का इंतजार कर रही है, वहीं किसानों का कहना है कि सिर्फ अस्थायी खरीद उपायों से प्याज के इस बार-बार आने वाले संकट का हल नहीं निकलेगा. वे भविष्य में इस तरह की गिरावट को रोकने के लिए एक स्थिर निर्यात नीति, स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर, पारदर्शी खरीद प्रणाली और लंबे समय के लिए बाजार सुधारों की मांग कर रहे हैं.