
गन्ने की खेती न केवल चीनी और गुड़ उद्योगों को कच्चा माल देती है, बल्कि बड़े पैमाने पर रोजगार भी पैदा करती है. हालांकि, गन्ना किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसकी 12 महीने की लंबी अवधि और चीनी मिलों से भुगतान में होने वाली देरी है. लंबे इंतजार और आर्थिक तंगी के कारण किसानों को अक्सर परेशानियों का सामना करना पड़ता है. कृषि विज्ञान केंद्र, पश्चिम चम्पारण के प्रमुख डॉ.आर.पी. सिंह के अनुसार, अगर किसान बंसत कालीन, जो फरवरी से मार्च में बोई जाती है, उस गन्ने के साथ खाली पड़ी जगह में कम समय वाली इंटरक्रॉप फसलें उगाते हैं, तो उन्हें 3-4 महीने में ही अच्छी आमदनी मिल जाती है. इससे न केवल आर्थिक सुरक्षा मिलती है, बल्कि गन्ने की खेती की लागत भी निकल आती है. साधारण खेती में जहां एक एकड़ गन्ने से साल भर में 55-60 हजार रुपये का शुद्ध लाभ होता है, वहीं इंटरक्रॉपिंग के जरिए इसे दोगुना तक बढ़ाया जा सकता है.
गन्ने में इटरक्रॉपिंग के लिए ऐसी फसलों का चुनाव किया जाता है जो कम समय में तैयार हो जाएं. डॉ. सिंह बताते हैं कि बसंतकालीन गन्ने के साथ भुट्टे वाली मक्का लगाने पर 3-4 महीने में 80 हजार रुपये प्रति एकड़ की अतिरिक्त कमाई हो सकती है. इसी तरह, फ्रेंचबीन से 65 हजार रुपये और उड़द, मूंग या लोबिया से 35-40 हजार रुपये तक का अतिरिक्त लाभ लिया जा सकता है. यदि किसान सब्जियां जैसे प्याज, लौकी, खीरा या भिंडी उगाते हैं, तो उन्हें 40-45 हजार रुपये की एक्स्ट्रा इनकम होती है. यहां तक कि 'फरो रेज बेड सिस्टम' से गेहूं के साथ गन्ना बोने पर भी 25-30 हजार रुपये का मुनाफा पक्का है.
बेहतर इंटरक्रॉपिंग के लिए गन्ने की बुवाई की विधि बहुत अहम है. वैज्ञानिक ट्रेंच मेथड और पिट की सलाह देते हैं. ट्रेंच मेथड में 30 सेमी चौड़ी और गहरी नालियां बनाई जाती हैं. आजकल गन्ना पौध रोपण विधि यानि एसटीपी मेथड बहुत लोकप्रिय हो रही है, जिसमें पहले नर्सरी तैयार की जाती है और फिर पौधों की रोपाई की जाती है. इस विधि में लाइनों के बीच 4 से 5 फीट की दूरी रखी जाती है, जिससे बीच की जगह में दूसरी फसलें उगाने के लिए पर्याप्त स्थान और धूप मिल सके.
इंटरक्रॉपिंग का लाभ सिर्फ पैसों तक सीमित नहीं है, यह मिट्टी के लिए भी वरदान है. जब किसान गन्ने के साथ मूंग, उड़द या लोबिया जैसी दलहनी फसलें उगाते हैं, तो उनकी जड़ों से मिट्टी को प्राकृतिक नाइट्रोजन मिलता है. इन फसलों की फलियां तोड़ने के बाद, पौधों के अवशेषों को गन्ने की दो लाइनों के बीच मिट्टी में दबा देने से प्रति एकड़ 12 से 15 किलोग्राम नाइट्रोजन की बचत होती है. यह 'हरी खाद' का काम करती है, जिससे गन्ने की पैदावार भी बढ़ती है और रासायनिक खादों पर खर्च कम होता है.
गन्ने के साथ इंटरक्रॉपिंग करना चीनी मिलों पर निर्भरता कम करने का एक सशक्त जरिया है. डॉ. सिंह का सुझाव है कि किसान गन्ने की दो पंक्तियों के बीच खीरा, ककड़ी या अन्य सीधी बढ़ने वाली सब्जियां लगाकर बिना मुख्य फसल को नुकसान पहुंचाए अतिरिक्त लाभ ले सकते हैं. यह तकनीक न केवल प्रति एकड़ आय को बढ़ाती है, बल्कि खेती में होने वाले जोखिम को भी कम करती है. संक्षेप में, इंटरक्रॉपिंग 'एक पंथ दो काज' की तरह है—गन्ने की बम्पर पैदावार भी और जेब में हर तीन महीने पर नकद पैसा भी.
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