
बिहार के अंदर दोबारा एनडीए की नई सरकार बनने के बाद जो सबसे पहली घोषणाएं हुईं, उनमें राज्य में 25 नई चीनी मिल शामिल हैं. इसके साथ ही 7 पुरानी चीनी मिलों को भी शुरू करने की बात सरकार द्वारा कही गई है. इसके बाद से राज्य के अंदर गन्ना किसानों में खुशी की लहर है. साथ ही गन्ना की खेती के नए क्षेत्रों में विस्तार को लेकर संभावनाएं भी जगी हैं. लेकिन नई चीनी मिलों के शुरू होने को लेकर और उनमें गन्ना की जरूरत को पूरा करने को लेकर बिहार राज्य गन्ना किसान मोर्चा के अध्यक्ष अशोक प्रसाद सिंह कई तरह के सवाल उठा रहे हैं.
उनका मानना है कि अगर ये चीनी मिलें शुरू होती हैं, तो उनके लिए जो गन्ना चाहिए, उसकी पूर्ति राज्य में होने वाले उत्पादन से हो पाएगी? क्योंकि करीब-करीब 34 नई और पुरानी चीनी मिलों को शुरू करने को लेकर सरकारी घोषणाओं में करीब आठ लाख हेक्टेयर में गन्ना की खेती होना अनिवार्य है, लेकिन हाल के समय में करीब 2.37 लाख हेक्टेयर में ही गन्ना की खेती हो रही है.
राज्य सरकार द्वारा 25 नई चीनी मिलों की स्थापना को लेकर बीते दिनों गन्ना उद्योग विभाग के अपर मुख्य सचिव के. सेंथिल कुमार ने एक उच्चस्तरीय बैठक में कहा कि बिहार में चीनी मिलों की संख्या बढ़ाने की दिशा में सरकार तत्परता से काम कर रही है. इसलिए अधिक से अधिक गन्ना खेती को बढ़ाया जाए, ताकि मिलों को गन्ना की कमी नहीं रहे. गन्ना किसानों को अधिकतम पांच एकड़ तक की खेती के लिए गन्ना बीज पर 50 प्रतिशत अनुदान उपलब्ध कराया जाएगा, ताकि उत्पादन लागत में कमी आए और किसानों को प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ मिल सके. साथ ही 15 दिनों के अंदर राज्य के सभी गन्ना किसानों का पंजीकरण कराने का निर्देश भी दिया गया.
बिहार राज्य गन्ना किसान मोर्चा के अध्यक्ष अशोक प्रसाद सिंह का मानना है कि आज तक राज्य के अंदर करीब 2.37 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हीं गन्ना की खेती विभाग करवा पाया है, तो वह दो, तीन या पांच वर्षों में 8 लाख हेक्टेयर में गन्ना की खेती कैसे करवा पाएगा? क्योंकि जो नई चीनी मिलें स्थापित होंगी, उनके लिए इतने क्षेत्र में यदि गन्ना की खेती होगी, तभी किसी भी मिल को गन्ना की कमी नहीं होगी.
वे कहते हैं कि एक चीनी मिल में प्रतिदिन करीब 50,000 क्विंटल गन्ने की जरूरत पेराई के लिए होती है. यह प्रक्रिया करीब 140 दिनों तक रहती है. वहीं हाल के समय में यदि एक एकड़ में बहुत अच्छी फसल हो, तो 200 क्विंटल तक गन्ने का उत्पादन हो पाता है. जबकि बिहार में इतना संभव नहीं है. इसके लिए विभाग को एक ठोस रणनीति के साथ किसानों का मनोबल बढ़ाने, भरोसा और विश्वास पैदा करने की जरूरत होगी. यदि किसानों में सरकार के प्रति भरोसा पैदा नहीं हुआ, तो सरकारी निर्णय ख्याली पुलाव बनकर रह जाएंगे. नई चीनी मिलें खोलने की बात तो दूर रही, चालू चीनी मिलें भी बंद हो जाएंगी.
अशोक प्रसाद सिंह कहते हैं कि बिहार के गन्ना किसान सबसे ज्यादा शोषित और उपेक्षित हैं. देश-विदेश में सबसे कम गन्ना मूल्य बिहार में है. हाल के समय में नेपाल में गन्ना किसानों को प्रति क्विंटल 440 रुपये का दाम मिल रहा है. वहीं पंजाब में 415 रुपये, हरियाणा में 416 रुपये, उत्तराखंड में 405 रुपये, उत्तर प्रदेश में 400 रुपये और बिहार में करीब 380 रुपये प्रति क्विंटल किसानों को गन्ने का दाम मिल रहा है. जब बिहार में नाम मात्र की चीनी मिलें चालू हैं, उसके बावजूद भी विभाग की ओर से किसानों को इतना कम दाम मिल रहा है, तो नई चीनी मिलें शुरू होने के बाद सरकार द्वारा किसानों को कितना दाम दिया जाएगा, यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है.
करीब 1904 से लेकर 1940 के बीच बिहार में 33 चीनी मिलें खुली थीं. बिहार देश का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक हुआ करता था. अशोक प्रसाद कहते हैं कि बिहारी चीनी लंदन में मशहूर थी. वहां की महारानी जब अपने अतिथियों को चाय पिलाती थीं, तो कहा करती थीं कि इस चाय में बिहार की चीनी घुली हुई है.
लेकिन बिहार राज्य चीनी निगम की लूट-खसोट और मिल प्रबंधन की मनमानी के चलते 1980 से 2005 के बीच 18 चीनी मिलें बंद हो गईं. आज मात्र 10 चीनी मिलें ही बिहार में चल रही हैं, जिनमें रोजाना 64,500 टन गन्ने की पेराई हो रही है. मिलों को पर्याप्त गन्ना नहीं मिल पा रहा है, इसलिए या तो पेराई सत्र छोटा कर दिया जाता है या कम क्षमता पर मिलें चलाई जा रही हैं.