Budget 2026: बजट में क्यों बदला यूरिया का स्वरूप? जानें सल्फर कोटेड यूरिया के पीछे का वैज्ञानिक सच

Budget 2026: बजट में क्यों बदला यूरिया का स्वरूप? जानें सल्फर कोटेड यूरिया के पीछे का वैज्ञानिक सच

केद्र सरकार ने साल 2026 के बजट से पहले सल्फर कोटेड यूरिया के 40 किलो बैग को 254 रुपये में बेचने को मंजूरी देकर खेती की दिशा में एक बड़ा निर्णय लिया है, जिसका मुख्य उद्देश्य देश की लगभग 70 फीसदी मिट्टी में फैली सल्फर की गंभीर कमी को दूर करना है. सरकार ने यह कदम भावनाओं के बजाय वैज्ञानिक रिपोर्टों और मृदा स्वास्थ्य के आंकड़ों के आधार पर उठाया है, क्योंकि पारंपरिक यूरिया के अंधाधुंध उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता गिर रही थी और फसलें कमजोर हो रही थीं.

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जेपी स‍िंह
  • नई दिल्ली,
  • Feb 02, 2026,
  • Updated Feb 02, 2026, 11:33 AM IST

भारत सरकार ने 1 फरवरी को पेश 2026-27 के बजट के साथ देश के करोड़ों किसानों के लिए एक बड़ा निर्णय लिया है. कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने 'सल्फर कोटेड यूरिया' के 40 किलो वाले बैग की कीमत मात्र 254 रुपये तय कर दी है. उर्वरक नियंत्रण आदेश 1985 के तहत इसका फैसला लिया गया. सरकार का कहना है कि यह फैसला न केवल किसानों की जेब पर बोझ कम करेगा, बल्कि मिट्टी की सेहत सुधारने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा.

दरअसल, भारतीय किसान पारंपरिक यूरिया का अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे थे, जिससे पौधों को नाइट्रोजन तो मिल रही थी, लेकिन मिट्टी की अम्लता बढ़ने से उसकी उपजाऊ शक्ति तेजी से घट रही थी. कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि सल्फर की परत चढ़ा हुआ यह नया यूरिया 'स्लो रिलीज' तकनीक पर काम करेगा, जिससे नाइट्रोजन पौधों को धीरे-धीरे मिलेगी और साथ ही सल्फर की कमी भी पूरी होगी. इससे न केवल फसलों की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि पैदावार में भी भारी बढ़ोतरी देखने को मिलेगी.

सरकार ने क्यों बदला यूरिया का फार्मूला?

भारतीय मिट्टी की सेहत को लेकर हाल ही में जारी किए गए आंकड़े बेहद डराने वाले हैं. ICAR और TSI-FAI-IFA जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के सर्वेक्षण बताते हैं कि देश के लगभग 70 फीसदी मिट्टी के नमूनों में सल्फर की भारी कमी पाई गई है. चिंता की बात यह है कि 1990 के दशक में सल्फर की कमी महज 130 जिलों तक सीमित थी, लेकिन आज यह समस्या पूरे देश में एक महामारी की तरह फैल चुकी है.

आंकड़ों के अनुसार, भारत के 40-45% जिलों में सल्फर का स्तर 'क्रिटिकल' यानी खतरे के निशान से नीचे पहुंच चुका है. इसका मतलब है कि देश की लगभग 640 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि इस समय सल्फर की कमी से जूझ रही है. यदि मिट्टी में सल्फर का स्तर 10 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम से कम है, तो उसे खेती के लिए असुरक्षित माना जाता है. वर्तमान में हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे 'अन्न भंडार' कहे जाने वाले राज्यों की मिट्टी इस संकट की चपेट में सबसे ज्यादा है.

भावनाओं से ज्यादा विज्ञान को दी अहमियत

मिट्टी से सल्फर के खत्म होने के पीछे प्राकृतिक कारणों से ज्यादा मानवीय गलतियां जिम्मेदार हैं. 'सघन खेती' इसका सबसे प्रमुख कारण है. पिछले चार दशकों में हमने पैदावार तो 1200 लाख टन बढ़ा ली, लेकिन इस प्रक्रिया ने मिट्टी के प्राकृतिक सल्फर भंडार को पूरी तरह निचोड़ लिया. किसान अक्सर फसल की कटाई के बाद अनाज तो ले लेते हैं, लेकिन बचे हुए अवशेष जैसे भूसा और डंठल खेत से हटा देते हैं, जिससे मिट्टी का चक्र अधूरा रह जाता है.

दूसरा कारण है यूरिया, डीएपी  और पोटाश जैसे 'सल्फर-मुक्त' उर्वरकों का अंधाधुंध उपयोग. इनमें केवल नाइट्रोजन और फास्फोरस होता है, सल्फर नहीं. साथ ही, प्रदूषण नियंत्रण कानूनों के कारण अब बारिश के पानी से मिलने वाला प्राकृतिक सल्फर भी बंद हो गया है. इसके अलावा, जरूरत से ज्यादा सिंचाई के कारण घुलनशील सल्फर जमीन की गहराई में बह जाता है जिससे वह पौधों की जड़ों की पहुंच से बाहर हो जाता है.

सिर्फ वादा नहीं, विज्ञान है आधार

सल्फर को पौधों का चौथा सबसे अनिवार्य पोषक तत्व माना जाता है. यह पौधों के भीतर अमीनो एसिड, प्रोटीन और जरूरी एंजाइम बनाने का काम करता है. पर्याप्त सल्फर होने से पौधों में क्लोरोफिल का निर्माण बेहतर होता है, जिससे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया तेज होती है और पौधा स्वस्थ रहता है. विशेष रूप से तिलहनी फसलों जैसे सरसों, मूंगफली और सोयाबीन के लिए तो सल्फर एक 'वरदान' है, क्योंकि यह बीजों में तेल की मात्रा को 12 फीसदी से लेकर 48 फीसदी तक बढ़ा सकता है.

दालों में यह प्रोटीन की गुणवत्ता बढ़ाता है और गन्ने में चीनी की रिकवरी में सुधार करता है. इतना ही नहीं, प्याज और लहसुन में जो खास तीखापन और औषधीय गंध होती है, वह भी सल्फर के कारण ही संभव है. यह मिट्टी में मौजूद नाइट्रोजन की कार्यक्षमता को भी बढ़ाता है, जिससे डाली गई अन्य खादों का पूरा लाभ फसल को मिल पाता है.

क्यों जरूरी है सल्फर कोटेड यूरिया?

जब मिट्टी में सल्फर की कमी होती है, तो पौधे बहुत सी कमी के लक्षण दिखाने लगते हैं. सल्फर की कमी से नई पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं जबकि पुरानी पत्तियां हरी रहती हैं. इसके विपरीत, नाइट्रोजन की कमी में पुरानी पत्तियां पहले पीली पड़ती हैं. सल्फर की कमी से पौधों के तने सख्त और लकड़ी जैसे हो जाते हैं और फसल समय पर नहीं पकती. इसके साथ ही, जब किसान बिना सल्फर के केवल यूरिया का प्रयोग करते हैं, तो पौधा नाइट्रोजन को प्रोटीन में नहीं बदल पाता. इससे पौधों में 'नाइट्रेट' का जमाव बढ़ जाता है, जो चारे के जरिए पशुओं और अन्न के जरिए मनुष्यों के शरीर में पहुंचकर बीमारियां पैदा कर सकता है.

अधिक यूरिया के प्रयोग से पौधे कोमल और रसीले हो जाते हैं, जिससे उन पर कीटों और बीमारियों का हमला कई गुना बढ़ जाता है, जिससे किसान की लागत बढ़ जाती है. मिट्टी की खोई हुई उपजाऊ शक्ति को वापस पाने के लिए प्रति हेक्टेयर कम से कम 20 से 60 किलो सल्फर का उपयोग करना आज की जरूरत बन गया है. सरकार द्वारा पेश किया गया 'सल्फर कोटेड यूरिया' समाधान के लिए लाया गया है क्योंकि यह नाइट्रोजन की बर्बादी रोकता है और सल्फर की आपूर्ति सुनिश्चित करता है. 

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