दुनिया भर में मधुमक्खियों की करीब 20,000 प्रजातियां पाई जाती हैं. जिन्हें खासियत के हिसाब से अलग-अलग परिवारों में बांटा गया है. इसमें से बढ़ई मधुमक्खियां (Carpenter Bees) खेती के लिए बेहद अहम मानी जाती हैं. दरअसल, कृषि फसलों का कीट परागण (Pollination) एक महत्वपूर्ण क्रिया है. विश्व की 115 प्रमुख खाद्य फसलों में से 87 फल, सब्जी फसलों या बीज का उत्पादन परागण पर निर्भर करता है. परागण निर्भर फसलों की खेती का क्षेत्र पिछले दशकों में असंगत रूप से बढ़ गया है, जिससे पता चलता है कि निकट भविष्य में परागण की जरूरत काफी बढ़ जाएगी. यह मधुमक्खी पालकों और कीट-परागण वाली फसलों के उत्पादकों के लिए चिंता का विषय है.
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) से जुड़े कृषि वैज्ञानिकों लवप्रीत कौर, सुनीता यादव, दीपिका कलकल , मनीष ककरालिया और संदेश कुमार के मुताबिक खाद्य आपूर्ति के 15-30 प्रतिशत उत्पादन के लिए परागणकों की आवश्यकता होती है. किसान इन सेवाओं को प्रदान करने के लिए दुनिया भर में मधुमक्खियों पर निर्भर रहते हैं. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार मधुमक्खियां हमेशा सभी तरह की फसलों के परागण में सक्षम नहीं होती हैं. इसके साथ ही विश्व के विभिन्न हिस्सों में इनकी संख्या में निरंतर कमी आ रही है. इस कारण फसल परागण की कमी एक आम समस्या होती जा रही है.
जंगली और पालतू गैर-एपिड मधुमक्खियां कई फसलों में परागण को प्रभावी ढंग से पूरक करती हैं. मधुमक्खियां एक फूल से दूसरे फूल पर पराग ले जाकर परागण करती रहती है. इससे बीज व दाने बनने की क्रिया तेज हो जाती है. बहरहाल, बढ़ई मधुमक्खी में 730 से अधिक प्रजातियां शामिल हैं. ये फल, सब्जी और सजावटी पौधों के परागण में प्रमुख भूमिका निभाती हैं. इस तरह फसल की उपज और उचित बीज निर्धारण में वृद्धि करने में इनका महत्व बढ़ जाता है.
ग्रीन ब्लॉग में राचेल फ्रीमैन लॉन्ग ने लिखा है कि अन्य मधुमक्खियों की तरह, बढ़ई मधुमक्खियां देसी पौधों के समुदायों, बगीचों और कुछ फसलों में महत्वपूर्ण परागणकर्ता हैं. हम अपने भोजन के एक तिहाई हिस्से के लिए कीट परागण पर निर्भर हैं, जिसमें फल-सब्जियां, मेवे (बादाम) और बीज वाली फसलें शामिल हैं. शहद की मक्खियों जैसे कीट परागणकर्ता हमारे कृषि उद्योग में लगभग 29 बिलियन डॉलर का योगदान करते हैं, जिसमें से लगभग 15 प्रतिशत मूल्य बढ़ई मधुमक्खियों जैसी देसी मधुमक्खियों से आता है.
आईसीएआर के कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार बढ़ई मधुमक्खियां संयुक्त राज्य अमेरिका में सबसे बड़ी देसी मधुमक्खी हैं. इन मधुमक्खियों को दो समूहों में बांटा गया है: 'जाइलोकोपा' की बड़ी बढ़ई मधुमक्खियां और 'सेराटिना' की छोटी बढ़ई मधुमक्खियां. बढ़ई नाम इनकी 'घोंसला बनाने की प्रवृति' से लिया गया है. छोटी बढ़ई मधुमक्खियां विभिन्न झाड़ियों के नरम तनों में सुरंग खोदती हैं व बड़ी ठोस लकड़ी के ठूंठों, लकड़ियों या वृक्षों और बांस की मृत शाखाओं को चबाती हैं और घोंसला बनाती हैं.
ज्यादातर बढ़ई मधुमक्खियां, भौंरों जैसी दिखने वाली बड़ी और मजबूत कीट होती हैं. मादा बढ़ई मधुमक्खी लकड़ी के एक टुकड़े में सुरंग खोदती है. पराग से एक गेंद बनाकर उस पर अपने अंडे देती है. फिर वह सुरंग को लकड़ी के चूरे से बंद कर देती है. केवल एक छोटा सा कक्ष छोड़ती है, जहां उसके अंडे होते हैं. अंडे से निकलने वाली मधुमक्खियां खुद ही अपना रास्ता खोदकर बाहर निकल जाती हैं.
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