रिकॉर्ड आयात के बीच केंद्र सरकार ने एक अहम फैसला लेते हुए कॉटन की इंपोर्ट इस साल के अंत तक के लिए खत्म कर दी है. इसकी वजह से महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, कर्नाटक और राजस्थान जैसे बड़े कॉटन उत्पादक सूबों के किसानों में भारी गुस्सा है. किसान संगठनों का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप के 50 फीसदी टैरिफ से चोटिल भारतीय टेक्सटाइल इंडस्ट्री के मुनाफे को बरकरार रखने के लिए सरकार ने इंपोर्ट ड्यूटी खत्म की है. इंडस्ट्री के हितों के लिए किसानों को तबाह करने वाला फैसला लिया गया है. टेक्सटाइल इंडस्ट्री को जब विदेशों से सस्ता कॉटन मिलेगा तब भला कौन भारत के किसानों से महंगा कॉटन खरीदेगा? इस तरह भारत में पहले ही सिकुड़ रही कॉटन की खेती और कम हो जाएगी.
सरकार ने पहले 19 अगस्त 2025 से 30 सितंबर 2025 तक कॉटन पर आयात शुल्क में अस्थायी छूट दी थी. ऐसा माना जा रहा था कि इसके बाद जब नई फसल आनी शुरू होगी तब सरकार फिर से इंपोर्ट ड्यूटी लगा देगी, जिससे किसानों को ज्यादा नुकसान नहीं होगा. लेकिन अब सरकार ने इसमें बड़ा बदलाव करते हुए इसे 31 दिसंबर 2025 तक बढ़ा दिया है. जिससे किसानों का गुस्सा बढ़ गया. क्योंकि जब अक्टूबर में नई फसल आएगी तब भी यह इंपोर्ट ड्यूटी लागू रहेगी. जिसकी वजह आयात सस्ता पड़ेगा. ऐसे में भारतीय किसानों को उचित दाम नहीं मिल पाएगा. भारत में कपास खरीफ सीजन की फसल है, जिसकी कटाई मुख्य तौर पर अक्टूबर से शुरू होती है. कॉटन कारपोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) इसी समय से एमएसपी पर खरीद भी शुरू करता है.
बहरहाल, कॉटन किसानों को सरकार के इंपोर्ट ड्यूटी वाले फैसले से सबसे बड़ा झटका लगा है. हालांकि, अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) ने इस पर खुशी जताई है. यूएसडीए ने उम्मीद जताई है कि फ्री इंपोर्ट ड्यूटी से अमेरिकी कपास की बुकिंग बढ़ने की उम्मीद है. तीन कृषि कानूनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित तीन सदस्यीय कमेटी के सदस्य रहे अनिल घनवत का कहना है कि सरकार ने अपने इस फैसले से अमेरिका और भारतीय टेक्सटाइल इंडस्ट्री दोनों को खुश करने की कोशिश की है, लेकिन इससे किसान तबाह हो जाएगा. क्योंकि टेक्सटाइल इंडस्ट्री ज्यादा से ज्यादा कॉटन इंपोर्ट करेगी. स्टोर करेगी. इसलिए भारत के किसानों को मजबूरन एमएसपी से कम कीमत पर कॉटन बेचना पड़ेगा. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार न तो किसानों को दाम की गारंटी दे रही है और न उन्हें खुला मार्केट उपलब्ध करवा रही है.
नागपुर (महाराष्ट्र) निवासी शेतकरी संगठन के नेता विजय जावंधिया का कहना है कि सरकार के इस फैसले से भारत में कॉटन की सिकुड़ती खेती और खत्म हो जाएगी. किसान कॉटन की खेती छोड़कर दूसरी किसी फसल पर शिफ्ट हो जाएंगे. पिछले दो साल में ही कॉटन की खेती में 14.8 लाख हेक्टेयर की गिरावट आई है, जबकि उत्पादन 42.35 लाख गांठ कम हो गया है. साल 2022-23 में कॉटन की खेती 129.27 लाख हेक्टेयर में हुई थी जो 2024-25 में घटकर 114.47 लाख हेक्टेयर ही रह गई है. इसी दौरान उत्पादन 336.6 लाख गांठ से घटकर 294.25 लाख गांठ रह गया है. जब किसानों को दाम ही नहीं मिलेगा तो क्या वो चैरिटी के लिए खेती करेंगे? सरकार क्यों इंडस्ट्री की चिंता तुरंत कर लेती है और किसानों की परवाह नहीं करती.
कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक 2024-2025 में भारत में कॉटन की खपत 318 लाख गांठ है, जबकि ओपनिंग स्टॉक 47.1 लाख गांठ था. इसके बावजूद अक्टूबर 2024 से जून 2025 के नौ महीनों में ही आयात रिकॉर्ड 29 लाख गांठ को पार कर गया है, जो पिछले छह साल में सबसे ज्यादा है. एक गांठ में 170 किलो ग्राम कॉटन होता है. अब इंपोर्ट ड्यूटी खत्म होने के बाद भारत में कॉटन का आयात और बढ़ जाएगा. सितंबर तक आयात 40 लाख गांठ पार कर जाने की उम्मीद है. बाजार में उपलब्धता बढ़ने से दाम में कमी आएगी. विजय जावंधिया का कहना है कि सरकार के फैसले से एक सप्ताह में ही कॉटन के दाम में भारी गिरावट आई है. इसकी तस्दीक सीसीआई भी कर रहा है.
सीसीआई एमएसपी पर कॉटन की खरीद करता है. पिछले साल उसने लगभग 100 लाख गांठ कॉटन एमएसपी पर खरीदा था. उसके पास अभी भी लगभग 27 लाख गांठें मौजूद हैं. इंपोर्ट ड्यूटी खत्म करने का दबाव उस पर साफ दिखाई दे रहा है. इसीलिए पिछले 10 दिन में ही उसे तीन बार कपास का फ्लोर प्राइस घटाना पड़ा है. जब 19 अगस्त को केंद्र सरकार ने इंपोर्ट ड्यूटी हटाने का फैसला किया, तब सीसीआई ने कपास के दाम में 600 रुपये प्रति कैंडी की गिरावट की. उसके अगले दिन 500 रुपये की गिरावट हुई. इस तरह पिछले 10 दिन में कपास के फ्लोर प्राइस में 1700 रुपये तक की गिरावट है. एक कैंडी में 356 किलो कॉटन होता है.
जानेमाने कृषि अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा का कहना है कि अमेरिका के पास कॉटन उत्पादन करने वाले सिर्फ 8000 किसान हैं जबकि हमारे पास 98 लाख लोग कॉटन की खेती कर रहे हैं. अमेरिका में कॉटन की खेती का औसत आकार 600 हेक्टेयर है, जबकि हमारे यहां एक हेक्टेयर से भी कम है. अमेरिका अपने कॉटन उत्पादक किसानों को सालाना करीब एक लाख डॉलर की सब्सिडी देता है, जबकि भारतीय कॉटन किसानों को महज 27 डॉलर का सरकारी सहयोग मिलता है. इससे पता चलता है कि अमेरिका में कॉटन क्यों सस्ता है. हमारे किसान उनका मुकाबला कैसे कर पाएंगे?
शर्मा कहते हैं कि जितना ही भारत में सस्ता कॉटन आयात होगा भारत में कॉटन की खेती उतने ही बड़े संकट से घिरती जाएगी. अमेरिकी कॉटन हाईली सब्सिडाइज्ड है, वह किसी भी देश का मार्केट खराब कर सकता है. इसके बावजूद भारत ने इंपोर्ट ड्यूठी खत्म कर दी. सरकार के इंपोर्ट ड्यूटी वाले फैसले ने कॉटन क्राइसिस को और बढ़ाने की स्क्रिप्ट लिख दी है. अच्छा यह होता कि सरकार उन कंपनियों से एमएसपी पर कॉटन की पूरी खरीद करवाती, जिनकी वजह से ट्रंप ने 50 फीसदी टैरिफ लगाया. फिर उसे सब्सिडाइडज रेट पर टेक्सटाइल इंडस्ट्री को दे देती. कुछ लोगों की वजह से लगाए गए इतने बड़े टैरिफ की सजा क्यों किसान और टेक्सटाइल इंडस्ट्री भुगते.