खेती-किसानी के साथ कई ऐसे सहायक व्यवसाय हैं जो न केवल किसान की आय बढ़ाते हैं, बल्कि खेती को भी सीधा फायदा पहुंचाते हैं. इन व्यवसायों में मधुमक्खी पालन का स्थान सबसे ऊपर है. यह एक ऐसा अद्भुत व्यवसाय है जिसे बहुत कम पूंजी में शुरू करके भरपूर लाभ कमाया जा सकता है. इसे छोटे स्तर से शुरू करके धीरे-धीरे एक बड़े उद्योग का रूप दिया जा सकता है. इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इस काम को भूमिहीन किसान या कोई भी व्यक्ति जिसके पास थोड़ी सी खाली जगह हो, आसानी से अपना सकता है और अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकता है.
आज के समय में मधुमक्खी पालन का व्यवसाय तेजी से बढ़ रहा है, जिसके पीछे कई ठोस कारण हैं. इसकी शुद्धता और औषधीय गुणों के कारण आज कई बड़ी एफएमसीजी और आयुर्वेदिक कंपनियां शहद की ब्रांडिंग और मार्केटिंग में लगी हुई हैं, जिससे बाजार में इसकी मांग लगातार बनी हुई है.
भारत शहद उत्पादन में दुनिया के अग्रणी देशों में से एक है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत ने साल 2022-23 में 1.42 लाख मीट्रिक टन शहद का उत्पादन किया और इसमें से लगभग 79,929 मीट्रिक टन शहद का निर्यात किया, जिससे देश को बहुमूल्य विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई. अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय शहद की बढ़ती मांग को देखते हुए सरकार ने 31 दिसंबर, 2025 तक शहद के लिए 2,000 अमेरिकी डॉलर प्रति मीट्रिक टन का न्यूनतम निर्यात मूल्य भी तय किया है. यह कदम दर्शाता है कि आने वाले समय में इस व्यवसाय में मुनाफे की अपार संभावनाएं हैं.
पहले मधुमक्खी पालन का मतलब केवल शहद उत्पादन तक ही सीमित था, लेकिन आज वैज्ञानिक तरीकों और नई जानकारी की मदद से इसका दायरा बहुत बड़ा हो गया है. अब मधुमक्खी के बक्सों से शहद के अलावा कई अन्य कीमती उत्पाद भी निकाले जाते हैं, जिनकी बाजार में बहुत अच्छी कीमत मिलती है. इन उत्पादों में बी-वैक्स (मोम), प्रोपोलिस, रॉयल जेली और बी-पॉलेन शामिल हैं. बी-वैक्स का इस्तेमाल कॉस्मेटिक उत्पादों और मोमबत्तियां बनाने में होता है, जबकि रॉयल जेली और प्रोपोलिस अपने औषधीय गुणों के कारण बहुत महंगे बिकते हैं. इन सह-उत्पादों से मधुमक्खी पालक अपनी आय को कई गुना बढ़ा सकते हैं.
अगर कोई नया मधुमक्खी पालन करना चाहता तो उसके लिए अक्टूबर का महीना बेहतर होता है. नए लोगों को लगता है कि शहद का उत्पादन केवल कुछ विशेष मौसमों में ही हो सकता है, लेकिन यह पूरी तरह सच नहीं है. सही योजना और जानकारी के साथ साल भर शहद का उत्पादन लिया जा सकता है. इसका रहस्य है मधुमक्खियों के बक्सों को अलग-अलग समय पर खिलने वाली फसलों के पास रखना, जिसे 'माइग्रेटरी बीकीपिंग' भी कहते हैं.
मधुमक्खियों को अपना भोजन, यानी फूलों का रस और पराग, लगातार मिलना चाहिए. इसके लिए किसान एक फसल चक्र बना सकते हैं. उदाहरण के लिए, जब तोरिया और सरसों की फसल में फूल आएं, तो बक्सों को उनके खेतों के पास रखें. जब वहां फूलों का मौसम खत्म हो जाए, तो बक्सों को लीची के बागों में ले जाएं. लीची के बाद उन्हें यूकेलिप्टस, करंज, सूरजमुखी या अन्य फूल वाले पौधों के पास रखा जा सकता है. इससे फसलों में परागण बेहतर तरीके से होता है, जिसके परिणामस्वरूप फसल की पैदावार में 15 से 20 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी गई है. इस तरह किसान की उपज बढ़ती है और मधुमक्खी पालक को शहद मिलता है. यह दोनों के लिए एक फायदे का सौदा है.
विशेषज्ञों के अनुसार इस व्यवसाय को शुरू करना बेहद आसान है. कोई भी व्यक्ति 5 बक्सों से इसकी शुरुआत कर सकता है, जिसमें लगभग 20,000 रूपये का शुरुआती खर्च आता है. एक बार शुरू होने के बाद हर बक्से की साल भर की देखभाल का खर्च भी बहुत कम, मात्र 400 से 500 रुपये होता है. सबसे खास बात यह है कि सही देखभाल से हर साल मधुमक्खियों की कॉलोनियों की संख्या दोगुनी हो जाती है. एक बक्से से शहद और नई कॉलोनियां बेचकर सालाना 5,000 से 8,000 रुपये का मुनाफा कमाया जा सकता है. जब आपका काम बढ़कर 100 बक्सों तक पहुंच जाता है, तो आप आसानी से साल के 2 से 3 लाख रुपये तक की कमाई कर सकते हैं.
इस व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें भी भरपूर मदद कर रही हैं. हालांकि यह व्यवसाय बहुत लाभकारी है, लेकिन इसे शुरू करने से पहले सही प्रशिक्षण लेना अत्यंत आवश्यक है. किसी अनुभवी मधुमक्खी पालक या कृषि विज्ञान केंद्र जैसे सरकारी संस्थान से ट्रेनिंग लेकर आप इसकी सभी बारीकियों को जानकर इस व्यवसाय को अपनाएं, तो यह निश्चित रूप से आपको आर्थिक सफलता की मिठास चखाएगा.