Sugar Price: रिकॉर्ड पैदावार के 'नशे' में सोती रही नौकरशाही, इथेनॉल से एक्सपोर्ट तक...ये है चीनी संकट की असली कहानी

Sugar Price: रिकॉर्ड पैदावार के 'नशे' में सोती रही नौकरशाही, इथेनॉल से एक्सपोर्ट तक...ये है चीनी संकट की असली कहानी

कृषि वैज्ञानिकों की चुप्पी, मिल मालिकों का लालच और खाद्य विभाग के अफसरों के इथेनॉल और एक्सपोर्ट वाले मिसमैनेजमेंट ने त्योहारों से ठीक पहले देश की 140 करोड़ आबादी को चीनी संकट की आग में झोंका. शुगर रिकवरी से बेपरवाह कृषि मंत्रालय के 5000.63 लाख टन गन्ने के रिकॉर्ड उत्पादन के आंकड़े को देखकर क्यों सोती रही खाद्य मंत्रालय की नौकरशाही?

चीनी के क्यों बढ़ रहे हैं दामचीनी के क्यों बढ़ रहे हैं दाम
ओम प्रकाश
  • New Delhi,
  • Aug 22, 2026,
  • Updated Aug 22, 2026, 3:40 PM IST

जिस देश के पास प्राइस मॉनिटरिंग सेल, स्टैटिस्टिक्स विंग और भारतीय आर्थिक सेवा के महारथियों की पूरी फौज हो, वह देश सिर्फ 4 महीनों के भीतर चीनी के बड़े एक्सपोर्टर से एक लाचार इंपोर्टर की कतार में कैसे खड़ा हो गया? इसका जवाब प्रशासनिक लापरवाही, तकनीकी अंधापन और व्यापारियों की लालच के उस खतरनाक कॉकटेल में छिपा है, जिसने देश का जायका कड़वा कर दिया है. बाजारों में चीनी की खुदरा कीमतें 48 से छलांग लगाकर 65 रुपये प्रति किलो को पार कर चुकी हैं. आम उपभोक्ता त्योहारों के ठीक मुहाने पर लुट रहा है और व्यापारी मौके का फायदा उठाकर निहाल हो रहा है.

विडंबना देखिए, सरकारी लोग इसे कमजोर मॉनसून की मार और अल-नीनो का प्रभाव बताकर पल्ला झाड़ रहे हैं. लेकिन अगर उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय की 21 अगस्त 2026 की पीआईबी रिपोर्ट और मंत्रालय के पिछले नौ महीनों के फैसलों की टाइमलाइन का पोस्टमार्टम किया जाए, तो साफ हो जाएगा कि यह संकट कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है. यह उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के उन चोटी के नौकरशाहों, सीनियर इकोनॉमिक एडवाइजर्स और रणनीतिकारों की मैन-मेड विफलता है, जो जमीनी हकीकत से कटकर सिर्फ फाइलों पर पेन घिस रहे थे.

शुगर रिकवरी रेट का गणित

केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने 27 मई 2026 के अपने तीसरे अग्रिम अनुमान रिपोर्ट में बड़े गर्व से ऐलान किया था कि देश में इस बार रिकॉर्ड 5000.63 लाख टन गन्ने का उत्पादन हुआ है. कृषि भवन में इस रिकॉर्ड वजन का जश्न मनाया गया और इसी आंकड़े के नशे में खाद्य विभाग के अफसर चादर तानकर सो गए. ये तथाकथित विशेषज्ञ 'शुगर रिकवरी रेट' का वह बुनियादी नियम ही भूल गए जिसे गन्ने की खेती करने वाला एक आम किसान भी जानता है. सरल भाषा में कहें तो चीनी उद्योग में गन्ने का कुल वजन या खेतों में खड़ी फसल की लंबाई तब तक बेमानी है, जब तक कि उसका रिकवरी रेट सही न हो. रिकवरी रेट का मतलब है कि जब मिलों में 1 क्विंटल गन्ने की पेराई होगी, तो उससे कितने किलो सफेद चीनी बाहर निकलेगी.

उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक के गन्ने के खेतों में इस सीजन रेड रॉट यानी लाल सड़न रोग और टॉप बोरर जैसी खतरनाक बीमारियां महामारी की तरह फैल चुकी थीं. इन बीमारियों ने गन्ने के भीतर के सुक्रोज कंटेंट यानी उसकी मिठास और रस को सुखा दिया था. इसका नतीजा यह हुआ कि गन्ने का वजन तो कागजों पर दिख रहा था, लेकिन जब वह मिलों के कोल्हू में पहुंचा, तो राष्ट्रीय औसत रिकवरी रेट 9.70% से गिरकर सीधे 8.91% पर आ गया. मिलों को निचोड़ने के बाद भी चीनी नहीं मिल रही थी. कागजी गन्ने के नशे में डूबे अफसर इस गिरावट को भांपने में पूरी तरह फेल रहे.

वैज्ञानिकों ने सरकार को क्यों नहीं चेताया?

इस पूरे चीनी संकट की क्रोनोलॉजी में देश की सबसे बड़ी और प्रतिष्ठित कृषि अनुसंधान संस्था ICAR, यानी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की भूमिका पर सबसे गंभीर सवाल खड़े होते हैं. ICAR के अंतर्गत आने वाले गन्ना संस्थानों और उनके फील्ड वैज्ञानिकों को दिसंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच ही फील्ड सर्वे के दौरान यह पक्का पता चल चुका था कि देश के मुख्य चीनी बेल्ट्स में लाल सड़न रोग गन्ने की खड़ी फसल को खोखला कर रहा है.

वैज्ञानिकों के पास यह लाइव डेटा था कि इस संक्रमण की वजह से इस साल रिकवरी रेट में भारी गिरावट आने वाली है. लेकिन वैज्ञानिकों ने केवल अपने एसी कमरों में बैठकर रिसर्च पेपर छापने और अपनी सालाना प्रोग्रेस रिपोर्ट भरने में ही भलाई समझी. ICAR और उसके माई-बाप कृषि मंत्रालय का यह प्राथमिक और नैतिक कर्तव्य था कि वह खाद्य मंत्रालय और उसके आर्थिक सलाहकारों को एक कड़ा रेड-अलर्ट भेजता कि खेतों में खड़ी फसल को देखकर धोखे में न रहें, इस बार गन्ने से चीनी नहीं बल्कि सिर्फ खोई निकलेगी. वैज्ञानिकों की इस खामोशी और तकनीकी नाकामी के कारण खाद्य मंत्रालय का पूरा थिंक-टैंक अंधेरे में हवा में तीर चलाता रहा.

मुनाफे के लिए दबाए रखा डेटा

सरकारी वैज्ञानिकों की लापरवाही के बाद इस संकट का दूसरा बड़ा गुनहगार है निजी चीनी मिलों का सबसे बड़ा संगठन ISMA यानी इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन. चीनी मिलों के पास अपना एक बहुत बड़ा और सक्रिय ग्राउंड स्टाफ होता है, जो हर दिन मिल गेट पर आने वाले गन्ने और उससे निकलने वाली चीनी की रिकवरी का एक-एक ग्राम का हिसाब रखता है.

अप्रैल और मई 2026 में जब देश की अधिकांश मिलों में पेराई का काम पूरी तरह बंद हो रहा था, तब ISMA के पदाधिकारियों और मिल मालिकों को अच्छी तरह पता चल चुका था कि देश का कुल चीनी उत्पादन शुरुआती सरकारी दावे यानी 343 लाख मीट्रिक टन (LMT) के आसपास भी नहीं पहुंचने वाला है और यह आंकड़ा मुश्किल से 300 LMT पर सिमट जाएगा. लेकिन मिल मालिकों ने इस कड़वे सच को सरकार के सामने लाने के बजाय पूरी तरह दबाए रखा. इसके पीछे एक सोची-समझी  रणनीति थी कि अगर अप्रैल में ही उत्पादन घटने की भनक सरकार को लग गई, तो वो उनके चीनी निर्यात के कोटे को तुरंत रद्द कर देगी. अंतरराष्ट्रीय बाजार में उस समय चीनी के दाम आसमान पर थे और मिल मालिकों को घरेलू बाजार के बजाय विदेशों में चीनी बेचकर मोटा मुनाफा कमाना था. इसलिए उन्होंने भी सरकार को जानबूझकर गुमराह रखा.

एक्सपोर्ट का आत्मघाती फैसला

जब घर में अनाज न हो, तो उसे पड़ोसियों को नहीं बेचा जाता, लेकिन हमारे देश के सीनियर इकोनॉमिक एडवाइजर्स ने यही आत्मघाती कदम उठाया. जब देश का क्लोजिंग स्टॉक यानी बफर स्टॉक पिछले 9 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच रहा था और गोदामों में केवल 43 लाख टन चीनी बची थी, तब इन अफसरों ने मिल मालिकों के दबाव में आकर नवंबर में 15 लाख टन चीनी निर्यात करने की खुली छूट दे दी.

बात यहीं नहीं रुकी, अधिकारियों की लापरवाही का आलम यह था कि फरवरी 2026 में, जब खेतों में गन्ने की बर्बादी साफ दिख रही थी, बिना किसी जमीनी समीक्षा के इस निर्यात कोटे को बढ़ाकर 20 लाख टन कर दिया गया. मिल मालिकों ने इस ढिलाई का पूरा फायदा उठाया और देखते ही देखते 8 लाख मीट्रिक टन चीनी देश से बाहर भेज दी. मई 2026 के अंत में जब पेराई सत्र पूरी तरह खत्म हो गया और गोदाम खाली दिखने लगे, तब जाकर अफसरों की नींद खुली और आनन-फानन में एक्सपोर्ट पर कम्पलीट बैन लगाया गया. लेकिन तब तक तीर कमान से छूट चुका था. जिस चीनी को देश के त्योहारों के लिए बचाकर रखना था, उसे बाहर भेज दिया गया और आज उसी की भरपाई करने के लिए सरकार को 10 लाख टन रॉ शुगर बिना किसी टैक्स के यानी ड्यूटी-फ्री आयात करनी पड़ रही है.

ईथेनॉल का मिसकैलकुलेशन

इस विफलता की एक और परत खुलती है सरकार की ईथेनॉल नीति पर ढीली निगरानी से. सप्लाई सीजन की शुरुआत में जब मिलें मुनाफे के चक्कर में गन्ने के रस को सीधे पेट्रोल में मिलाने वाले ईथेनॉल में डाइवर्ट कर रही थीं, तब मंत्रालय के सलाहकारों ने इस पर कोई कैपिंग या सख्त सीमा नहीं लगाई. जब चीनी का कोटा कम पड़ गया, तो अब मंत्रालय के अफसर कह रहे हैं कि ईथेनॉल तो अब मक्के और खराब अनाजों से बन रहा है. सवाल यह है कि जब शुरुआत में चीनी का स्टॉक स्वाहा हो रहा था, तब इन सलाहकारों के ट्रैकिंग मॉडल और इकोनॉमिक फॉरकास्टिंग टूल्स क्या खर्राटे मार रहे थे?

इसके साथ ही, बाजार के बड़े सटोरियों और थोक व्यापारियों को मई और जून में ही अंदाजा हो गया था कि इस बार देश में चीनी की भारी किल्लत होने वाली है. थोक बाज़ार में जुलाई की शुरुआत से ही चीनी की जमाखोरी और होर्डिंग का गंदा खेल शुरू हो चुका था. व्यापारी बाजार में चीनी की सप्लाई को धीरे-धीरे रोक-रोक कर छोड़ रहे थे ताकि कृत्रिम कमी पैदा करके दाम बढ़ाए जा सकें. मंत्रालय का प्राइस मॉनिटरिंग सेल हर दिन कीमतों का ग्राफ मॉनिटर करता है. जब कीमतें 20 जुलाई को 48 से बढ़कर अगस्त की शुरुआत में ही 55 रुपये प्रति किलो को पार कर गईं, तब भी अफसरों की फाइलें सिर्फ एक मेज से दूसरी मेज पर घूमती रहीं. अधिकारियों ने मिलों की फिजिकल चेकिंग करने और 15 दिन से ज्यादा का स्टॉक न रखने का कड़ा प्रशासनिक आदेश कब जारी किया? जब सटोरिये और जमाखोर आम जनता की जेब से सैकड़ों करोड़ रुपये लूटकर किनारे हो गए, तब जाकर कागजी घोड़ों पर सवार हमारी नौकरशाही ने आदेश निकाला.

जनता कब तक भुगतेगी नाकामी का हर्जाना?

यह चीनी संकट किसी भी मायने में प्राकृतिक नहीं है, यह सीधे तौर पर प्रशासनिक, रणनीतिक और नीतिगत दिवालियापन का एक क्लासिक उदाहरण है. जब जनवरी में शुरुआती संकेत मिल गए थे और मई की शुरुआत में पेराई खत्म होते ही यह शीशे की तरह साफ हो चुका था कि वास्तविक चीनी उत्पादन अनुमान से 37 लाख टन कम रहने वाला है, तो देश के सीनियर इकोनॉमिक एडवाइजर्स और उपभोक्ता विभाग के प्रमुखों ने उसी वक्त, यानी मई या जून में ही, आयात के फैसले क्यों नहीं लिए? उन्होंने देश के थोक व्यापारियों पर जून में ही स्टॉक लिमिट क्यों नहीं लगाई? वे जून और जुलाई, पूरे दो महीने हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठे रहे?

जनता के टैक्स के पैसे से करोड़ों रुपये की सैलरी, आलीशान भत्ते और विदेशों में ट्रेनिंग पाने वाले इन आला अधिकारियों की इस अक्षमता ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जब तक हमारी नीतियां फाइलों के पन्नों से बाहर निकलकर खेतों की जमीनी हकीकत को नहीं देखेंगी, तब तक सिस्टम इसी तरह फ्लॉप होता रहेगा. कृषि वैज्ञानिकों की चुप्पी, मिल मालिकों का लालच और खाद्य विभाग के सलाहकारों के इसी निकम्मेपन के घालमेल ने त्योहारों की मिठास को कड़वा कर दिया है.

MORE NEWS

Read more!